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थोड़े में कहने की कला

विचार

 

थोड़े में कहने की कला

प्रीतीश नंदी



मुझे याद है, कई साल पहले एक बार राजीव गांधी ने कुछ अधीरता से मुझसे एक नोट बनाने के लिए कहा था कि मीडिया की स्वतंत्रता की रक्षा कैसे की जा सकती है और पत्रकारों में एक किस्म का दायित्वबोध कैसे पैदा किया जा सकता है. मुझे याद नहीं है कि मैंने क्या लिखा था और वह मैंने उन्हें कभी भेजा भी या नहीं, लेकिन उनकी कही बातों में सबसे महत्वपूर्ण बात मुझे आज भी स्पष्ट याद है – “ जितने चाहे ब्यौरे दो, लेकिन एक पन्ने में निपटा दो.”

प्रकारांतर से आप अतिश्योक्ति के साथ विषयों की प्रासंगिकता को लेकर कतिपय व्यंजनात्मक और ध्वन्यात्मक बहुल शब्दों का अव्यवहारिक प्रयोग करते हैं.


उस समय मैं एक पत्रकार था और मुझे आशंका हुई कि राजीव गांधी अधिक ध्यानाकर्षण चाहते थे. एक प्रज्ञावान और समझदार व्यक्ति के बतौर आज मुझे इस बात का एहसास है कि वह वास्तव में कितने भविष्यद्रष्टा और अपने समय से कितने आगे थे.

राजीव गांधी की सलाह मेरे साथ रही. इस स्तंभ में मैं अपने विचारों के थोड़े विस्तार और गहराई में जाने की कोशिश करता हूं, लेकिन इसके अलावा मैं जो कुछ भी लिखता हूं, वह बहुत संक्षिप्त, ठोस और मुख्य मुद्दे पर ही केंद्रित होता है. संप्रेषण के लिए जिस माध्यम को मैं सबसे ज्यादा वरीयता देता हूं, वह है एसएमएस. चूंकि मैं अपना फोन नंबर बाहर किसी को नहीं देता, इसलिए ज्यादातर लोग मुझे ई-मेल करते हैं. अगर निजी मेल है तो सीधे मुझे भेजते हैं, वरना प्रीतीश नंदी कम्यूनिकेशंस में मारिया के मार्फत मेल मुझ तक आती है.

लंबी-लंबी ई-मेल हमेशा ही बिना पढ़े इकट्ठा होती रहती हैं. छोटी ई-मेल फटाफट पढ़ी जाती हैं और उन पर कार्रवाई होती है. और जब मुझे दुनिया से बात करने का मन होता है तो मैं ट्विटर पर चला जाता हूं, जहां सारे संदेश 140 कैरेक्टर के भीतर ही भेजने होते हैं. अरे नहीं-नहीं, अक्षर नहीं, कैरेक्टर. उसमें शब्दों के बीच के विराम-चिन्ह और खाली स्थान भी शामिल होते हैं. क्या ये कुछ हास्यास्पद लग रहा है?

कोशिश करके देखिए. लोग बिना कोई मेहनत किए सबसे ज्यादा जटिल, उलझे हुए विचार इन 140 कैरेक्टर के माध्यम से दूसरों तक पहुंचाते रहते हैं. इसके लिए आपको सिर्फ और सिर्फ संप्रेषण कला का उस्ताद होने की जरूरत है.

एसएमएस की तरह ट्विटर पर भी लोग बेसिर-पैर की बातों से बहुत चिढ़ते हैं. वहां किसी के पास ऐसा संदेश पढ़ने का धर्य नहीं होता है, जो अपने आप में पूरा न हो. अभी किशोरावस्था तक भी नहीं पहुंचे बच्चों और सेवानिवृत्त हो चुके बूढ़ों के लिए भी ट्विटर बड़े काम का है. खुद को भद्र दिखाने वाले मूर्ख गंवार, जो सोचते हैं कि ट्विटर समय की बर्बादी है, उनके लिए भी यह बड़े काम की चीज है.

जरूरत से ज्यादा शब्दों का इस्तेमाल आज के समय में बहुत घटिया समझा जाता है. मुझे लगता है कि मुख्य रूप से इसकी वजह हैं- हमारे दिखावेबाज और निरर्थक बोलते रहने वाले बड़बोले नेता, बक-बक करने वाले चैट शो के बातूनी मेजबान, आडंबरपूर्ण बड़े-बड़े शब्दों का इस्तेमाल करने वाले पत्रकार, कभी न चुप होने वाले अकादमिक, अपने अतिरेकपूर्ण शब्दों से उकताहट पैदा करने वाले ब्लॉगर, वाचाल गुरु और चपर-चपर करने वाले सेलिब्रिटी, जिनके पास अपनी शोहरत भरी उबाऊ, थकाऊ जिंदगी के बारे में बक-बक करने के सिवा और कुछ नहीं होता. उनके प्रति हमारी तीव्र और गहरी चिढ़ की वजह से ही ऐसा होता है. इस भय से कि कहीं उनको सुनना न पड़ जाए, हम अपने कानों में हेडफोन लगाकर ‘ब्लैक आइड पीस’ सुनना ज्यादा पसंद करते हैं.

फिदेल कास्त्रो ने 33 घंटे लगातार भाषण देकर पूरी दुनिया को चकित कर दिया. यह भाषण गिनीज बुक में भी दर्ज है. उनके भाषण के दौरान पुलिस ने सुनने वालों को जाने भी नहीं दिया.


शब्दों का आतंक भारी होता है. गनीमत है कि आदमी जो बिगाड़ता है, टेक्नालॉजी प्राय: उसे संवार देती है. इसलिए बहुत चुपचाप, लगभग अदृश्य रूप से हम विवेक की ओर लौट रहे हैं और सीधे, संक्षिप्त तरीके से थोड़े में अपनी बात कहने की कला सीख रहे हैं. बढ़-चढ़कर बात करने के दिखावटी समय में संक्षिप्तता मर गई. कविता नरक में चली गई. चुप्पी को मूर्खता का पर्याय मान लिया गया. लोगों की तारीफ इसलिए नहीं होती कि उन्होंने क्या कहा, बल्कि इसलिए होती कि उन्होंने कितना लंबा और कितनी बार कहा.

इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री बंग सुकर्णो के बारे में कहा जाता है कि किसी चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने एक ही भाषण एक ही अंदाज में 342 बार दिया. ख्रुश्चेव यूएन में लगभग तीन घंटे तक बोले और उससे भी संतुष्ट नहीं हुए. हमारे कृष्ण मेनन भी कम नहीं हैं. वे सुरक्षा परिषद में कश्मीर पर आठ घंटे लगातार बोलते रहे और फिर भी हमारे पक्ष में माहौल नहीं बना सके. वे तब तक बोलते रहे, जब तक कि अर्कादी सोबोलेव आहिस्ता से खड़े नहीं हुए और उन्होंने सोवियत संघ के 79वें वीटो का इस्तेमाल करते हुए दृढ़ता से कहा, ‘ना’ और इस तरह कश्मीर मसले पर संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप पर भी विराम लगा दिया.

लेकिन इस मामले में कोई भी फिदेल कास्त्रो का मुकाबला नहीं कर सकता, जिन्होंने 33 घंटे लगातार भाषण देकर पूरी दुनिया को चकित कर दिया. यह भाषण गिनीज बुक में भी दर्ज है. उनके भाषण के दौरान पुलिस ने सुनने वालों को जाने भी नहीं दिया.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ राजनीति ही इतनी शब्दमय हो गई है. इसके ठीक उलट जरा बिजनेस को ही देख लीजिए. 8 साल पहले फिल्म बनाने से पहले हम एक पन्ने का अनुबंध करते थे और उस पर शायद ही कभी कोई विवाद होता था. अब 120 पन्ने का अनुबंध किया जाता है. आलसी और वाचाल कानूनी भाषा ने ठोस, संक्षिप्त अंग्रेजी की जगह ले ली है. हम जो नहीं देख पाते, वह यह है कि अकसर भाषा का आडंबर इरादों की दुष्टता को छिपाने का हथियार होता है. लाखों शब्दों के बीच में कोई ऐसा चोर-फंदा हो सकता है, जो नजरों से रह जाए.

दांव-पेंची भाषा जो छिपा देती है, प्रेम उसे दिखा देता है. मेरे लिए सबसे ज्यादा भयानक वे लंबे, तकलीफदेह प्रेम पत्र रहे, जो टूटे हुए दिल से लिखकर भेजे गए. शुक्र है कि अब ऐसे खत आने धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं. इसकी क्या वजह हो सकती है? कुछ तो मेरी उम्र के कारण और कुछ शायद इसलिए क्योंकि लोग जानते हैं कि मैं अतिशयोक्तिपूर्ण शब्दों के प्रति जरा भी सहनशील नहीं हूं. मेरा हमेशा से यह विश्वास रहा है कि एक सीधा-सादा, तरीके से दिया गया चुंबन हजारों थके हुए शब्दों से कहीं ज्यादा मूल्यवान है.

क्या मैं शब्दों की तनिक भी कमी महसूस करता हूं? हां कभी-कभी. लेकिन चूंकि ऐसे दिन बहुत कम होते हैं, इसलिए मैं दुरुस्त हूं. शब्दों के हमले से मुझे डर लगता है. शब्दों का अतिरेक मेरा स्वभाव नहीं है. मैं सीधी, सरल और इशारों में कही गई बातों का सम्मान करता हूं. कल्पना का खेल मुझे पसंद है. मुझे लगता है कि यह सदी कल्पना की सदी होने वाली है. इसलिए मेरी पसंद बिलकुल साफ है. युद्ध और शांति से बेहतर ट्विटर, जेम्स जॉयस से बेहतर हाइकू, स्टार वॉर्स से बेहतर सिनेमा पैराडिसो और डराने वाली महाभारत से बेहतर गीता.

 

03.09.2009, 06.32(GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Dr. Ratna verma (drratna.verma) Raipur

 
 कम शब्दों में बहुत कुछ कहना एक कला है। शब्दों के महारथी ही ऐसा कर पाते हैं। प्रीतिश नंदी का यह लेख अच्छा लगा। बधाई 
   
 

m.l.pandia (mlpandia@gmail.com) churu

 
 बहुत अच्छा मैं इसका पूरा समर्थन करता हूं.  
   
 

रंगनाथ सिंह (rangnathsingh@gmail.com) new delhi

 
 अब प्रीतीश भी आत्म-प्रशंसा से ग्रस्त लेखन करने लगे हैं.  
   
 

एम. अखलाक (analhaque2007@gmail.com) मुजफ्फरपुर

 
 शानदार। उदाहरण याद रखने वाला है।  
   
 

कौशल किशोर शुक्ला (kaushal.shukla1967@gmail.com) मुजफ्फरपुर

 
 बहुत दिनों के बाद एक अच्छा आलेख पढ़ा और बहुत सारी बात सीखी।  
   
 

Raghav kumar tiwari (raghavcnb@gmail.com) Kanpur nagar

 
 आपका लेख अच्छा लगा. कम शब्दों में प्रेषण की कला हमारी संस्कृति की पहचान रही है. रामायण के दोहे, वेद मंत्र, सूक्ति, कम शब्दों में विषय का संपूर्ण प्रेषण करते हैं. 
   
 

mihirgoswami (mgmihirgoswami @ gmail.com) bilaspur c. g

 
 कविताएं नहीं मिल रही थीं. रविवार से पता चला कि इस दिखावटी समय में कविता नरक में चली गई है. नरक जाउंगा. वहीं रचूंगा कविता, वहीं पढ़ूंगा कविता. 
   

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