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जनक्षेत्र में धर्म

मुद्दा

 

जनक्षेत्र में धर्म

प्रो. के.एन. पणिक्कर

अनुवाद: भारत भूषण तिवारी


15 मार्च 2007 को नेदर्लंड्स के टिलबर्ग विश्वविद्यालय में युगन हाबेमास (Jurgen Habermas) ने 'जनक्षेत्र (पब्लिक स्फ़िअर) में धर्म' इस विषय पर व्याख्यान दिया था. इस व्याख्यान का विस्तारित रूप उनकी नवीनतम कृति 'बिटवीन नॅचुरलिज़म एंड रिलिजन' में एक अध्याय के तौर पर संकलित है. इस व्याख्यान के बाद चली बहस में जो सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा उठाया गया वह आधुनिकीकरण (मॉडर्नाइज़ेशन)और धर्मनिरपेक्षीकरण (सेकुलराइज़ेशन) के सम्बन्ध से जुड़ा था.

लम्बे समय तक यह मान्यता रही कि समाज के आधुनिकीकरण और आबादी के धर्मनिरपेक्षीकरण के बीच करीबी नाता है. इसलिए यह दलील दी गई कि उत्तर-प्रबोधन (पोस्ट-एनलाइटनमेन्ट) समाज में धर्म का प्रभाव घटा है. प्रो. हाबेमास के अनुसार यह धारणा तीन तर्कों पर आधारित थी. पहला तर्क यह कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास ने कारण-सम्बन्धी स्पष्टीकरण को मुमकिन बनाया; ख़ास तौर पर यह कि विज्ञान- प्रबुद्ध मस्तिष्क के लिए धर्माधारित और पारलौकिक विश्व-दृष्टियों के साथ ताल मेल बिठाना मुश्किल है.

दूसरा तर्क यह कि चर्च और अन्य धार्मिक संगठनों ने कानून, राजनीति, जन कल्याण, शिक्षा और विज्ञान पर अपना नियंत्रण खो दिया. और अंततः यह कि आर्थिक रूपांतरण से अधिक कल्याणकारी परिस्थितियाँ और ज़्यादा सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध हुई. तर्क यह दिया जाता है कि इन घटनाओं के असर से धर्म के औचित्य और प्रभाव में कमी आई है.

आधुनिकीकरण-धर्मनिरपेक्षीकरण पैराडाइम के विरुद्ध एक मान्यता यह है कि जनक्षेत्र में धर्म का प्रभाव कम तो हुआ ही नहीं,बल्कि वास्तव में बढ़ गया है. कई विद्वानों का विचार है कि आधुनिकीकरण की थीसिस ने समकालीन विश्व में अपनी वैधता खो दी है. ऐसा इसलिए क्योंकि कई प्रवृत्तियां हैं जो संकेत करती हैं कि धर्म का वैश्विक पुनरूत्थान हो रहा है. यह धारणा तीन कारकों पर आधारित है: मिशनरी विस्तार, कट्टरवादी रॅडिकलाइज़ेशन और हिंसा की संभाव्यता का राजनीतिक क्रियान्वयन.

धार्मिक संस्थानों की संख्या में बढ़ोतरी भी समाज पर धर्म की व्यापक पकड़ की ओर इशारा करती है. भारत में प्रबोधन और आधुनिकता के चलते धार्मिकता के प्रभाव में कमी नहीं आई, बल्कि वृद्धि ही हुई है.


कुल मिलाकर, भले ही " दुनिया भर से जुटाए गए आँकड़े आश्चर्यजनक तौर पर अब भी धर्मनिरपेक्षीकरण थीसिस का पुरज़ोर समर्थन करते हैं", प्रो. हाबेमास धर्मनिरपेक्ष समाजों को 'उत्तर-धर्मनिरपेक्ष (पोस्ट-सेकुलर)' की संज्ञा देते हैं जिनमें "धर्म अपना सार्वजनिक प्रभाव और औचित्य बनाए रखता है". साथ ही वे यह भी मानते हैं कि " यह धर्मनिरपेक्ष निश्चितता अपना आधार खो रही है कि आधुनिकीकरण के प्रवाह में दुनिया भर से धर्म लुप्त हो जायेगा". यह अपेक्षा मात्र फलीभूत ही नहीं हुई, बल्कि विश्व भर में धर्म जनक्षेत्र में एक शक्तिशाली प्रभाव के तौर पर उभरा है. भारत में तो ख़ासकर ऐसा हुआ है.

सेण्टर फॉर डेवलपिंग सोसाइटीज़, नई दिल्ली द्वारा कराया गया एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण भारतीय समाज में धर्म के बढ़ते प्रभाव की गवाही देता है. इस सर्वेक्षण के अनुसार दस में से चार व्यक्ति अति धार्मिक हैं और दस में से पांच व्यक्ति धार्मिक हैं. कहने का तात्पर्य है कि नब्बे प्रतिशत उत्तरदाताओं ने अपने धार्मिक होने का दावा किया है - अर्थात कर्मकांड करने वाले, पूजा स्थलों पर जाने वाले और तीर्थयात्राएं करने वाले. उनमें से तीस प्रतिशत लोगों ने यह कहा कि वे पिछले पांच वर्षों में ज़्यादा धार्मिक बने हैं. धार्मिक संस्थानों की संख्या में बढ़ोतरी भी समाज पर धर्म की व्यापक पकड़ की ओर इशारा करती है. भारत में प्रबोधन और आधुनिकता के चलते धार्मिकता के प्रभाव में कमी नहीं आई, बल्कि वृद्धि ही हुई है.

अठारहवीं सदी में योरप में जनक्षेत्र बुर्जुआ समाज के अन्तर्गत एक ऐसी तर्कनिष्ठ स्पेस के तौर पर उभरा जहाँ व्यक्ति जनहित के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए इकठ्ठा होते थे. राज्य और चर्च के अधिकारों के पृथक्करण, तर्क और मानवतावाद के प्रबोधनकारी गुणों, और औद्योगिक क्रांति द्वारा आये आर्थिक परिवर्तनों का जनक्षेत्र के निर्माण में और उसके अन्तर्गत होने वाले क्रियाकलापों को आकार देने में योगदान रहा. कानून-व्यवस्था तक सभी नागरिकों की पैठ और उसी कानून-व्यवस्था द्वारा वैयक्तिक अधिकारों की रक्षा पर इस जनक्षेत्र का अस्तित्व टिका हुआ था. अठारहवीं सदी में योरप में विकसित हुए जनक्षेत्र का चरित्र अनिवार्यतः धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक था.

उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के दौरान भारत में जनक्षेत्र की उत्पत्ति और विकास ने दूसरा ही मार्ग अपनाया. ऐसा मुख्यतः इसलिए हुआ क्योंकि भारत उपनिवेशीय शासन के अधीन था और भारतीय समाज के पास अपने प्रारब्ध को आकार देने के लिए ज़रूरी आज़ादी नहीं थी. भारत की राजनैतिक, आर्थिक और बौद्धिक परिस्थितियों में और जिन परिस्थितियों में योरप में जनक्षेत्र ने आकार लिया उनमें, गुणात्मक अंतर था. प्रबोधन और आधुनिकता की अबाधित अवस्था की ओर जाने वाला रास्ता इस अनुभव का हिस्सा नहीं था.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

PremRam Tripathi (prt9999@gmail.com)

 
 पणिक्कर जी ने एक बहुत सही बात कही है कि इतिहास आमजन का कभी नहीं रहा है, इतिहास तो हमेशा राजाओं और सामंतों का ही रहा है.

इतिहास में यदि कहीं धोखे से आमजन का जिक्र हुआ तो वह भी इसीलिए कि उस समय के तत्कालीन राजा को महान साबित करने के लिए, इसके बहुत से उदाहरण आपको मिल जाएंगे. जैसे

1. गुप्त काल में आमजन का वर्णन इसीलिए क्योंकि राजा को प्रजा का सेवक दिखलाने का प्रयास किया गया है.
2. तुकलक काल में जनता का वर्णन है तो तुकलक का विरोध करने के लिए

रघुनंदनजी बधाई के पात्र हैं जो उन्होंने अपना इतिहास जानने का प्रयास किया है. वर्तमान समय में ये नितांत आवश्यकता है कि इतिहास को सभी लोग जाने और उससे कुछ सीख प्राप्त करें.
 
   
 

Amol Vijay Muley (amol@liberationcoaches.com) Mumbai

 
 मैं प्रो. पणिक्कर के मत से सहमत हूं (और श्री भारतभूषण तिवारी का आभारी हूं इस लेख को इतनी निष्ठा से अनुवादित करने के लिए). जन-क्षेत्र के बारे में और उसकी घटती धर्म-निरपेक्षता के बारे में प्रो. पणिक्कर का ये भाष्य़ निश्चित रूप से चिंतनीय है. हालांकि ये कहना उचित नहीं होगा कि भारत में कभी जन-क्षेत्र ध्रमनिरपेक्ष था ही नहीं क्योंकि वैज्ञानिक क्रांति हमने उधार ली है.

अगर जन-क्षेत्र कभी धर्मनिरपेक्ष ही रहा होता, तो उसका घटना या बढ़ना प्रस्तुत लेखक के नज़र में कैसे आता. धार्मितचा बढ़ी है ये निश्चित है, और उसके बढ़ने से जन-क्षेत्र को निुकसान पहुँचा है ये भी निश्चित है. आशा है लेखक, जन-क्षेत्र में धर्मनिरपेक्षता को बढ़ाने के कुछ उपाय सुझाएंगे
 
   

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