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यह वैभव की अश्लीलता है

बात पते की

 

यह वैभव की अश्लीलता है

प्रीतीश नंदी



नहीं, हम लोग संयमी और मितव्ययी नहीं हैं. हमें अपनी संपत्ति और वैभव पर इतराना अच्छा लगता है. भारत में यह अकड़ ही ताकत और संपत्ति का जीता-जागता प्रतीक है. इस बात को साहिर से ज्यादा बेहतर तरीके से और किसी ने नहीं कहा है. साहिर की कविता ‘ताजमहल’ इस सामाजिक अलंकार का सबसे तीखा और धारदार हथियार है. साहिर ने ताज को अमर प्रेम के महान प्रतीक के रूप में नहीं देखा, जैसाकि दरबारी इतिहासकार हमेशा कहते रहे. साहिर की नजर में वह एक वैभवशाली बादशाह का अश्लील प्रदर्शन है, जिसके मन में प्रेम का एक विचार आया और उसने प्रेम को आम आदमी की पहुंच से दूर कर दिया.

शाहजहां ने अपनी पत्नी के प्रति अपने प्रेम को जीवित रखने के लिए सफेद चमचमाता हुआ एक मकबरा बनवाया. यह बात बड़ी झूठी और नकली लगती है, जबकि आप यह जानते हैं कि शाहजहां की 800 पत्नियां और थीं. उनमें से कुछ उनके पिता के हरम से लाई गई थीं. शाहजहां ने उन निर्धन कारीगरों के हाथ भी कटवा दिए थे, जिन्होंने ताजमहल का निर्माण किया था ताकि वे कभी उसकी नकल न कर सकें.

दरअसल महात्मा गांधी ही वह पहले व्यक्ति थे, जो राजनीतिक विमर्श में मितव्ययिता और संयम का विचार लेकर आए. वे बुद्धिमान व्यक्ति थे और उन्होंने संयम के हथियारों जैसे अहिंसा को एक भरोसेमंद राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया. उन्होंने सेविले रो का कीमती सूट पहनना छोड़कर साधारण वस्त्र धारण कर लिया. इस पर चर्चिल ने बड़ी अवमानना के साथ कहा था - नंगा फकीर. लेकिन यह वह नंगे फकीर ही थे, जिन्होंने उन हथियारों (अहिंसा, संयम, सहनशीलता और सादगी) का इस्तेमाल करते हुए हमें आजादी दिलाई, जिनका चर्चिल ने कभी मजाक उड़ाया था. गांधी के हाथों ये सारी चीजें परिवर्तन का ताकतवर रूपक बन गईं.

भारतीय राजनीति ने गांधी के इन आदर्शो का परित्याग कर दिया है. इसलिए अब प्रणब मुखर्जी को फिर से गांधी का गांडीव अस्त्र उठाकर मंत्रिमंडल के अपने सहयोगियों पर निशाना साधते देखना बड़ा रोचक है. बेशक एसएम कृष्णा और शशि थरूर अचानक हुए इस हमले से भौंचक रह गए. वर्षो से यह होता रहा है कि जब तक मंत्रियों के बंगले तड़क-भड़क वाले फैशनेबल डिजाइनर सजा रहे होते हैं, तब तक मंत्री पांच सितारा होटलों में रहते हैं. इसलिए उन्हें जरूर सदमा पहुंचा होगा, जब वित्त मंत्री ने उन्हें बुलवाया और ज्यादा सस्ती और साधारण जगह पर रहने के लिए कहा. किसी तरह की अनुचित छवि से बचने के मकसद से उन्होंने तत्काल सफाई दी कि होटल का बिल वे अपनी जेब से भर रहे थे.

लेकिन हमारे वित्त मंत्री का आशय यह नहीं था. यह गलत और अनुचित का सवाल बिल्कुल नहीं था. दरअसल, यह संवेदनशीलता का मसला था. क्या हमारे मंत्री अर्थव्यवस्था की वर्तमान दशा के प्रति इतने संवेदनहीन हैं कि वे आरामतलब पांच सितारा होटलों का लुत्फ उठाएं, जबकि लाखों भारतीय अपनी नौकरियां और रोजी-रोटी छिन जाने के तनाव से गुजर रहे हैं. वे नहीं जानते कि उन्हें मंदी से मुक्ति मिलेगी या नहीं. यही असली सवाल है. यह नहीं कि बिल कौन भर रहा है.

हमें यह कभी भी पता नहीं चल पाएगा कि मंत्रियों के साथ उनकी फाइलें पकड़ने के लिए जो लोग साथ चलते हैं, मंत्रियों पर होने वाले खर्च में उनका खर्चा भी शामिल रहता है अथवा नहीं.


आंकड़े बताते हैं कि हमारे केंद्रीय मंत्रियों द्वारा किया जाने वाला कुल खर्च 182 करोड़ रुपए है और इस राशि का 75 प्रतिशत हिस्सा उनके द्वारा की जाने वाली यात्राओं पर खर्च होता है. मंत्रियों की तनख्वाह इस खर्च का एक प्रतिशत होती है. इसी से पता चलता है कि वे इतना कम टैक्स क्यों देते हैं. लुटियंस दिल्ली में मंत्री गण जिन विशालकाय बंगलों में रहते हैं, अगर आप उनका वास्तविक किराया देखें तो यह उसका तीन गुना होता है. हमारे राष्ट्रपति का रहन-सहन तो और भी ज्यादा खर्चीला है. उनके ऊपर जितना पैसा खर्च होता है, उनकी तनख्वाह मुश्किल से उसका 0.3 प्रतिशत है. इसमें 360 कमरों वाले उस विशालकाय सामंती आवास का अतिरिक्त मूल्य शामिल नहीं है, जिसमें वह रहती हैं. राज्य के सर्वोच्च अधिकारी के लिए बना यह दुनिया का सबसे बड़ा आवास है. अकेले रोज गार्डन की कीमत पूरे नरीमन पॉइंट से ज्यादा है.

क्या हमारे देश की राष्ट्रपति और मंत्रियों को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए इतने ऐशोआराम और शानो-शौकत के साथ रहने की जरूरत है? यही वह सवाल है, जो वित्त मंत्री ने उठाया है. इसमें तो उनकी सुरक्षा पर होने वाला खर्च भी शामिल नहीं है, जो कभी-कभी वास्तविक जरूरतों से भी बहुत ज्यादा होता है. इसमें छिपी हुई कीमतें शामिल नहीं होती हैं जैसे एयर इंडिया में मुफ्त में मिलने वाली अपग्रेड, प्रथम श्रेणी में असीमित ट्रेन यात्राएं और साथ चलने वाले ढेर सारे नौकर-चाकर, संगी-साथी वगैरह.

शरद पवार और आनंद शर्मा ने कैबिनेट में इकोनॉमी बनाम बिजनेस क्लास में सफर को लेकर बहस की लेकिन मैं अभी भी एक मंत्री को बिजनेस क्लास में सफर करते हुए देख रहा हूं. मुझे पूरा भरोसा है कि मंत्री भले ही किसी भी क्लास में अपना टिकट बुक करें, उनके पीए यही कोशिश करते हैं कि सबसे पहले उन्हें अपग्रेड किया जाए, यहां तक कि किराया चुकाने वाले यात्रियों से भी पहले. उनके चाटुकार इकोनॉमी का टिकट लेकर बिजनेस क्लास में सफर करते हैं. हमें यह कभी भी पता नहीं चल पाएगा कि मंत्रियों के साथ उनकी फाइलें पकड़ने के लिए जो लोग साथ चलते हैं, मंत्रियों पर होने वाले खर्च में उनका खर्चा भी शामिल रहता है अथवा नहीं.

यहां मेरा इरादा उन सुविधाओं पर सवाल उठाने का कतई नहीं है, जो हमारे मंत्रियों को प्राप्त हैं. हमारी सामंती राजनीति उन्हें ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करती है. मैं तो जन-जीवन में अचानक उभरे इस संयम और मितव्ययिता की प्रशंसा कर रहा हूं. मैं जानता हूं कि आप में से कुछ को यह बात हास्यास्पद लग सकती है. अगर पवार एयर इंडिया का इकोनॉमी श्रेणी का टिकट खरीद भी लेते हैं तो भी वे इकोनॉमी श्रेणी में कभी बैठेंगे नहीं. अगर प्रफुल्ल पटेल अपनी नौकरी बचाए रखना चाहते हैं तो पवार अभी भी बिजनेस क्लास में ही सफर करेंगे. लेकिन फिर भी यह देखना रोचक है कि इस मुद्दे पर बहस हो रही है और ममता बनर्जी और एके एंथोनी की तरह प्रणब मुखर्जी अभी से इकोनॉमी क्लास में सफर कर रहे हैं. उसी तरह सोनिया और राहुल भी हवाई जहाज और ट्रेन में सफर कर रहे हैं.

अगर वित्त मंत्री को कांग्रेस अध्यक्ष और प्रधानमंत्री का मौन समर्थन हासिल नहीं होता तो वे उस सीमा से आगे कदापि नहीं जाते जिससे कि उनके सहयोगी नाराज हो जाएं. लेकिन इसका अर्थ यह भी है मंत्रियों का यह विशाल समूह जिसमें जल्द ही और भी मंत्री शामिल होंगे, उस टैक्स के बारे में बढ़-चढ़कर बोलने से पहले कम से कम दो बार सोचेगा जो इस मुश्किल समय में भी आप और हम अदा कर रहे हैं.

 

17.09.2009, 00.26 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

rohit pandey (aboutrohit@g mail.com) gorakhpur

 
 श्री प्रीतीश जी ने बिल्कुल सही बात कही है. वैभव के अश्लील प्रदर्शन की प्रवृत्ति भारतीय समाज में बढ़ी है. राजनेताओं की जीवनशैला सामांतो जैसी ही तो है. नंदीजी, समाज की नब्ज़ पकड़ने में माहिर हैं. उन्हें गांधी का उदाहरण दिया है. गांधी भी अपनी जेब से भुगतान कर सकते थे.

थुरूर और उन जैसे गांधी की राह पर नहीं चल सकते. कांग्रेस बदल चुकी है. थुरूर को थाली में परोसकर टिकट दिया फिर मंत्री बनाया. सादगी किसी से अपेक्षा की नहीं बल्कि खुद की निभाहने की बात है.
 
   
 

nirmal gupt (gupt.nirmal@gmail.com) meerut

 
 शशि थरूर का बयान इस सम्बन्ध में सबसे अधिक बेलाग तो था पर उनका यह कहना कि फाइव स्टार प्रवास का सारा खर्च वह अपनी जेब से उठा रहे थे तब तो उनकी जेब की नए सिरे से पैमाइश करनी होगी ,पड़ताल तो इस बात की भी करनी होगी कि उनकी जेब को इतना विस्तार देने में किस किस का अतीत में योगदान रहा है. 
   
 

PremRam Tripathi (prt9999@gmail.com) Bhopal

 
 हमारे वित्तमंत्री जी ने बहुत अच्छी शुरुआत की है, लेकिन अब देखना यह है कि इस शुरुआत का अंजाम क्या होगा? क्या मंत्रियों के भत्तों में कटौती होगी क्या जनता द्वारा दिए गए टैक्स का उपयोग जनकल्याण में हो पाएगा? मंत्रियों की अनावश्यक विदेश यात्राओं पर रोक लगेगी? क्या जिस उद्देश्य (मंदी को कम करने) को देखते हुए ये कार्य किए जा रहे हैं उसमें मंत्री लोग भी अपनी रूचि दिखाएंगे?

क्या प्रशासनिक अधिकारी भी इस मुहिम में शामिल होंगे? क्या स्विस बैंक में जमा काला धन सही समय पर (स्विस बैंक से गोपनीय तरीके से निकालने से पहले) वापस हो सकेगा? क्या जनता के पैसे का उपयोग जनता की बेरोजगारी दूर करने के लिए किया जा सकेगा? क्या जनता के पैसे का उपयोग विज्ञापन में कम करके जनकल्याण में ज्यादा किया जाएगा? ऐसे बहुत सारे सवाल इस देश की जनता के सामने हैं. कोई है इन सवालों का जवाब देने वाला?
 
   

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