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बन सकता है भारत-पाक महासंघ

बात पते की

 

बन सकता है भारत-पाक महासंघ

डॉ. असगर अली इंजीनियर



भारत का विभाजन एक बहुत गंभीर त्रासदी थी. इससे जितनी समस्याएं सुलझीं, उससे कहीं ज्यादा खड़ी हो गईं. भारत को विभाजित करने का निर्णय कुछ भारतीय नेताओं ने जिस समय लिया था वह बहुत तनावपूर्ण दौर था. उन्होंने विभाजन के नतीजों पर गंभीरतापूर्वक विचार नहीं किया. साथ ही, हमारे ब्रिटिश शासक भारत के दो टुकड़े करने पर आमादा थे क्योंकि उन्हें भारतीय उपमहाद्वीप में अपने सामरिक हितों की रक्षा करनी थी. उन्होंने बड़ी चतुराई से हमारे नेताओं को विभाजन के लिए राज़ी कर लिया.

विभाजन हुए साठ वर्ष बीत चुके हैं और अब हम विभाजन के नतीजों की वस्तुपरक विवेचना करने की स्थिति में हैं. जिन्ना तक को अपनी मृत्यु के पहिले यह समझ में आ गया था कि विभाजन, भारत की समस्याओं का सबसे बेहतर हल नहीं था और वे विभाजन पर पुनर्विचार चाहते थे. उन्होंने अपने डॉक्टर से कहा था कि अगर वे जिन्दा बचे तो वे नेहरू से मिलकर विभाजन के बारे में एक बार फिर चर्चा करना चाहेंगे. विभाजन से कोई समस्या नहीं सुलझी थी.

विभाजन के नतीजों की विवेचना करने से पहिले हमें यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि विभाजन के निर्णय को पलटने का अब कोई प्रश्न नहीं है. पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश की सार्वभौमिकता बनी रहना चाहिए. ‘अखंड भारत’ का नारा एक खतरनाक नारा है और इससे तीनों देशों में आपसी बैर और दुश्मनियां बढ़ेंगी ही. जो हो सकता है, वह यह है कि भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश का एक महासंघ (कॉनफेडरेशन) बनाया जाए. यदि संभव हो तो इस महासंघ में नेपाल और श्रीलंका को भी शामिल किया जा सकता है और इसे संपूर्ण दक्षिण एशिया के महासंघ का स्वरूप दिया जा सकता है.

यह स्पष्ट है कि धर्म किसी राष्ट्र को एक रखने के लिए काफी नहीं है. पाकिस्तान के नेताओं ने सोचा था कि सभी उनके देश में सभी मुसलमान मिलजुल कर रहेंगे परंतु ऐसा नहीं हो सका. बंगाली मुसलमानों को अपनी भाषा और संस्कृति पर बहुत गर्व है और उन्होंने अपनी सांस्कृतिक और भाषाई स्वायत्ता से कोई समझौता करने से इंकार कर दिया. विभाजन के पहिले ही पठान नेता खान अब्दुल गफ्फार खान ने विभाजन का इस आधार पर कड़ा विरोध किया था कि इससे पठानों और पख्तूनों की अलग पहचान समाप्त हो जाएगी. कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में विभाजन के खिलाफ मत देने वाले वे एकमात्र सदस्य थे.

पाकिस्तान किसी प्रजातांत्रिक आंदोलन के जरिए नहीं बल्कि दोनों समुदायों की साम्प्रदायिक राजनीति के चलते अस्तित्व में आया था, इसलिए वहां भारत की तरह प्रजातांत्रिक राजनैतिक संस्कृति विकसित नहीं हो सकी.


मौलाना आज़ाद भी यह अच्छी तरह से समझते थे कि इस्लामिक पाकिस्तान, भावनात्मक दृष्टि से एक नहीं होगा. बंगाली, बलूची, पख्तून, सिंधी और पंजाबी मुसलमान एक-दूसरे से लड़ेंगे. मौलाना ने उत्तरप्रदेश के मुस्लिम लीग नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल से बात करते हुए कहा था कि जब तुम लोगों के साझा दुश्मन (हिन्दू) नहीं रहेंगे तो तुम लोग आपस में लड़ मरोगे.

जिस तरह भारत में उच्च जाति के हिन्दू, राष्ट्रवाद के नाम पर देश पर अपना वर्चस्व कायम करना चाहते हैं, उसी तरह पाकिस्तान में सामंती पंजाबी मुसलमानों ने देश पर अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश की और इससे देश में तनाव और अव्यवस्था फैल गई. भारत के अनुभव से यह स्पष्ट है कि धर्मनिरपेक्ष-प्रजातंत्र देश को जोड़े रखने में सिर्फ धर्म की तुलना में कहीं अधिक कारगर है. सन् 1947 के समय हुए धार्मिक ध्रुवीकरण के माहौल में जरूर ऐसा लग रहा था कि धर्म, पाकिस्तान को मजबूत और एक बनाए रखेगा परंतु ज्योंही यह उबाल ठंडा पड़ा, यथार्थ सामने आ गया.

पाकिस्तान के निर्माण के बाद से भारत को कई समस्याओं का सामना करना पड़ा. चूंकि पाकिस्तान किसी प्रजातांत्रिक आंदोलन के जरिए नहीं बल्कि दोनों समुदायों की साम्प्रदायिक राजनीति के चलते अस्तित्व में आया था, इसलिए वहां भारत की तरह प्रजातांत्रिक राजनैतिक संस्कृति विकसित नहीं हो सकी. जल्दी ही सेना और अन्य निहित स्वार्थी तत्वों ने सत्ता पर कब्जा जमा लिया और सामंती वर्ग ने देश पर अपनी मजबूत पकड़ बना ली. पाकिस्तान की सेना ने भारत को देश के सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर प्रस्तुत किया और देश की रक्षा के नाम पर पाकिस्तान पर लंबे समय तक राज करती रही.

कश्मीर दोनों देशों के बीच विवाद का विषय बन गया. भारत ने सन् 1953 के नेहरू-अब्दुल्ला समझौते का पालन नहीं किया और कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच दो युध्दों का कारण बना. भारत को अपने उत्तरपूर्वी सीमांत इलाके में भी नस्लीय संघर्ष के कारण गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है परंतु कश्मीर समस्या कहीं अधिक जटिल इसलिए बन गई है क्योंकि उसमें साम्प्रदायिकता घुस गई है और पाकिस्तान इस विवाद को हवा दे रहा है. विभाजन के कारण दोनों देशों में हथियारों की दौड़ शुरू हो गई. पाकिस्तान के सैनिक शासक नए-नए हथियार खरीदते गए. उनका तर्क यह था कि पाकिस्तान, सैनिक ताकत में भारत के समकक्ष होना चाहिए.

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भारत भी अपनी सेना को इस आधार पर मंहगे और आधुनिक हथियारों से लैस करता गया कि पाकिस्तान के पास उससे ज्यादा और बेहतर हथियार हैं. आज हमारे देश का रक्षा बजट 1,40,000 करोड़ रूपये है और पाकिस्तान अपने बजट का एक-तिहाई से भी अधिक हिस्सा सेना पर खर्च कर रहा है. यह स्थिति सीमित संसाधनों वाले दोनों ही देशों के लिए हितकर नहीं है. दोनों देशों ने आण्विक हथियार बनाने की क्षमता हासिल कर ली है और दोनों एक-दूसरे के पास आण्विक हथियार होने के आरोप लगाते रहते हैं. दोनों देश सेना पर जो अकूत धन खर्च कर रहे हैं, उसे लोगों की भलाई पर खर्च किया जा सकता था.

पाकिस्तान, अमरीका और दूसरी पश्चिमी ताकतों का पिट्ठू बन गया है. अमरीका का हथियार उद्योग भारत और पाकिस्तान के दम पर जमकर मुनाफा कमा रहा है. पाकिस्तान का इस्तेमाल अमरीका, अफगानिस्तान पर अपने हमले के लिए अड्डे के बतौर कर रहा है. अमरीका के अफगानिस्तान और पश्चिम एशिया में अपने सामरिक हित हैं और दुर्भाग्यवश, पाकिस्तान इन हितों की रक्षा करने में अमरीका की मदद कर रहा है. पाकिस्तान भी अफगानिस्तान पर अपनी पकड़ बनाए रखना चाहता है.

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