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ये सवाल पूछने वाले

बात पते की

 

ये सवाल पूछने वाले

प्रीतीश नंदी



मैं बारंबार पूछे जाने वाले जिस सवाल का सबसे ज्यादा सामना करता हूं, वह है: आप एक साथ एक समय में इतने काम कैसे कर लेते हैं? लोगों को लगता है कि मैं कुछ ज्यादा ही विनम्र हो रहा हूं, जब मैं यह कहता हूं कि मैं तो कुछ भी खास नहीं करता. लेकिन ऐसा ही है. मैं सचमुच यही महसूस करता हूं और ताउम्र ऐसा ही महसूस करता रहा हूं.

हां, मैं लिखता हूं. लेकिन मैं सुनने के लिए, किताबें-पत्रिकाएं-ब्लॉग-ट्वीट और अखबार पढ़ने के लिए भी वक्त निकाल लेता हूं. जो कुछ मेरी नजर के सामने से गुजरता है, मैं वह सब पढ़ता हूं. ई-मेल का जवाब देने में मैं बहुत आलसी हूं, लेकिन जितनी भारी संख्या में ई-मेल, एसएमएस और ट्वीट मेरे पास आती हैं, उसे देखते हुए यह कोई बहुत आश्चर्यजनक भी नहीं है. मुझे लिखने वालों से मैं निवेदन करता हूं कि अगर जवाब देने में देर हो जाए तो वे बहुत ज्यादा नाराज न हों. चूंकि मैं बहुत यात्राएं भी करता हूं, इसलिए ई-मेल पर मेरा ऑटोमैटिक जवाब लगातार उनसे निवेदन करता रहता है कि जिन्हें जल्दी है, वे कृपया मेरे दफ्तर में मारिया से संपर्क करें.

वहां से उन्हें मेरी तुलना में ज्यादा जल्दी जवाब मिलेगा. अगरचे ऐसे भी लोग हैं, जो मुझे पड़ोस की किसी किताब की दुकान पर चुपचाप किसी कोने में बैठकर किसी ग्राफिक नॉवेल में गहराई से डूबा हुआ देख सकते हैं या मेरे ऑफिस के नजदीक किसी सिनेमा हॉल में बिलकुल अकेले वॉन्टेड फिल्म देखते हुए पा सकते हैं. अगर वे विनम्र हैं तो मुझे अकेला छोड़ देते हैं और अगर नहीं हैं तो वे मेरे पास आते हैं और मुझसे लाखों सवाल पूछते हैं. मैं बड़े धैर्य से उन सवालों का जवाब देने की कोशिश करता हूं. जब मैं थक जाता हूं तो उनसे उनकी चटर-पटर को थोड़ा विश्राम देने का निवेदन करता हूं. ट्विट के 140 कैरेक्टर इन जिज्ञासाओं से कहीं ज्यादा आसान हैं.

सवाल भी ऐसे कि जिनकी आसानी से भविष्यवाणी की जा सकती है. मेरी अगली फिल्म कब आ रही है? उसमें कौन स्टार है? मैं अपने चित्रों की अगली प्रदर्शनी कब आयोजित करने वाला हूं? इस बीच इतना अंतराल क्यों हो गया. (कोई लंबा अंतराल नहीं हुआ है.) मैं संसद में वापस क्यों नहीं आया? मंदी कब खत्म होगी ? (जब मैं यह कहता हूं कि मुझे कोई आइडिया नहीं है कि मंदी कब खत्म होगी तो वे हंस देते हैं.) मैं अपनी आत्मकथा क्यों नहीं लिखता? मैं इलस्ट्रेटेड वीकली फिर से क्यों नहीं शुरू कर देता? मैं और ज्यादा क्यों नहीं लिखता? (गोया दो वीकली कॉलम और एक ब्लॉग पर्याप्त नहीं है.) क्या सचमुच उसके साथ कोई प्रेम संबंध था, अरे क्या नाम है उसका? मैं टेलीविजन से क्यों अलग-थलग रहता हूं?

अन्य निरंतर पूछे जाने वाले सवाल : क्या मैं कभी दोबारा कविता नहीं लिखूंगा? मैं प्रीतीश नंदी शो को फिर से क्यों नहीं शुरू करता? क्या इतना सब होने के बाद भी शशि थरूर को ट्विटर पर बने रहना चाहिए? मैं अपनी अगली फिल्म में शाहरुख को क्यों नहीं लेता? (तैयार जवाब: बड़ी खुशी से लूंगा शाहरुख को. आप उन्हें ले तो आइए.) क्या रंगीता सचमुच 19 साल की है? (नहीं, वह 30 साल की है. जब मैं यह कहता हूं तो वे खीसें निपोर देते हैं.) क्या मैं सचमुच शाकाहारी, सिगरेट नहीं पीने वाला और मदिरा से दूर रहने वाला व्यक्ति हूं? (मैं बुदबुदाकर कहता हूं, हां वर्जिन भी हूं. बातचीत बंद हो जाती है.)

सवाल आग की तरह दनदनाते मेरी ओर मुखातिब होते हैं. अगली मोक्ष कब आ रही है? क्या गोविंदा संसद में वापस आएंगे? क्या स्विस बैंकों में जमा काला धन भारत को वापस मिलेगा?


कल्पना कीजिए कि सफेद बालों वाले एक बूढ़े व्यक्ति, जो इतने बूढ़े हैं कि ठीक से सोच-समझ भी नहीं सकते, चलकर मेरे पास आते हैं और कहते हैं, हलो सर, मेरे पिताजी आपके साथ कॉलेज में पढ़ते थे. वे कहते हैं कि उस समय भी आप बहुत प्रखर थे. (मैं सिर्फ इतना ही बोल सकता हूं, माफ कीजिए, आपको कोई गलतफहमी हुई है. मैं कभी कॉलेज नहीं गया. इस पर वे इतनी जोर से हंसते हैं कि उनके नकली दांत बाहर आ जाते हैं.)

सबसे भयानक तो ये होता है कि जब कोई मेरे पास आता है और कहता है कि महेश भट्ट का दावा है कि जे. कृष्णमूर्ति के रास्ते से आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है. क्या आप इस बात का समर्थन करते हैं? (मेरा प्रत्युत्तर: मिस्टर भट्ट को शेखर कपूर की पूर्व पत्नी से दूर रहना चाहिए.) सबसे गहन जिज्ञासाओं का बुरा अंत होता है. लोगों ने मुझे सार्वजनिक जगहों पर रोककर कहा है कि वे मेरी फिल्म अंकुर को कितना पसंद करते हैं, लेकिन जब से मैंने सज्जनपुर जैसी मूर्खतापूर्ण कॉमेडी फिल्म बनानी शुरू की है, वे कितना बुरा महसूस कर रहे हैं. एक व्यक्ति ने तो मुझसे यहां तक पूछ डाला कि मैंने क्रिकेट की कमेंट्री क्यों बंद कर दी और उसकी जगह सुनने वाली मशीन का विज्ञापन कर रहा हूं.

सवाल, सवाल, सवाल. हम भारतीयों को सवाल पूछना बड़ा अच्छा लगता है. हम जहां भी जाते हैं, सवालों की बौछार शुरू कर देते हैं. प्रश्नों की झड़ी लगा देते हैं. कोई सेमिनार हो, राजनीतिक बैठक हो और चाहे कोई मॉल हो, जहां हम किसी ऐसे व्यक्ति से टकरा जाएं, जो हमें थोड़ा-थोड़ा जाना-पहचाना लगता है. बिलकुल ठेठ अजनबियों ने मेरे परिवार के सामने मुझसे यह सवाल पूछा है कि मैं प्रीतीश नंदी के गंजे सिर और दाढ़ी की नकल क्यों करता हूं?

मुझसे निरंतर पूछे जाने वाले सवालों में से एक यह भी है कि क्या सेंसेक्स 20,000 का आंकड़ा पार कर जाएगा, जिससे कि मैं अपने म्यूचुअल फंड के बचे हुए पैसे चुका सकूं या कि क्या मैं कभी किसी नाइटक्लब में अकेले में स्कारलेट जोहैन्सीन से टकराया हूं. मैं क्यों हमेशा सवालों को अपनी ओर खींचता रहने वाला चुंबक हूं?

मैं अभी भी स्वाइन फ्लू मास्क लगाकर घूमता हूं, जबकि दूसरे लोगों ने उसे लगाना कब का बंद कर दिया. मैं उन लोगों को न पहचानने का दिखावा करता हूं, जिनके लिए मुझे लगता है कि मैं उन्हें जानता हूं. अपने बॉलीवुड सितारों की तरह मैंने रात में नकली धूप का चश्मा लगाने की कोशिश की, लेकिन कुछ फायदा नहीं. सवाल आग की तरह दनदनाते मेरी ओर मुखातिब होते हैं. अगली मोक्ष कब आ रही है? क्या गोविंदा संसद में वापस आएंगे? क्या स्विस बैंकों में जमा काला धन भारत को वापस मिलेगा?

यह कभी न खत्म होने वाली जिज्ञासाएं हमें असहनीय रूप से प्रिय बनाती हैं. मैंने आज तक ऐसा कोई देश, ऐसे लोग नहीं देखे, जो जानने के लिए इतने बेताब हों. चैंप्स इलिसीस में मुझे यह जानने के लिए कोई नहीं रोकता कि कसाब को कब फांसी दी जाएगी. म्यूनिख के किसी कैफे में कोई अजनबी मेरे सामने यह पता करने के लिए आकर नहीं बैठ जाता कि कैफ कैटरीना का असली सरनेम है या नहीं.

जब मैं नेपल्स में बैठा कोई लोकल बैंड सुन रहा होता हूं तो कोई मेरे पास आकर यह नहीं पूछता कि क्या मैं तुला राशि में पैदा हुआ हूं. इसलिए जब मैं बाहर यात्रा करता हूं तो भारत को बहुत याद करता हूं. मैं जानकारी पाने के उस अदम्य उत्साह की कमी महसूस करता हूं, जो हम भारतीयों को दुनिया का सबसे जिज्ञासु मनुष्य बनाती है. कोई आश्चर्य नहीं कि हमें आरटीआई से इतना प्रेम है.

 

01.10.2009, 00.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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