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सामान जैसे सम्मान

बात निकलेगी तो...

 

सामान जैसे सम्मान

प्रीतीश नंदी


मैं बराक ओबामा को काफी पसंद करता हूं. यद्यपि उनके पूर्ववर्ती और भारत में अत्यधिक नापसंद किए जाने वाले जॉर्ज बुश का व्यवहार भारत के प्रति काफी मैत्रीपूर्ण था. मुझे आश्चर्य होता है कि भारतीय बुश को इतना नापसंद करते हैं. यद्यपि उन्होंने भारत के लिए इस हद तक जाकर और इतना कुछ किया कि अब तक और किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने इतना नहीं किया था. इसमें हमें सर्वाधिक प्रिय राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भी शामिल हैं.

ओबामा क्लिंटन की तरह हैं, बहुत मैत्रीपूर्ण, खुशदिल, लेकिन हमारे साथ कभी भी शांत न रहने वाले. इसलिए अब फिर से पाकिस्तान को करोड़ों डॉलर की मदद और नए अत्याधुनिक हथियार मिलने लगे हैं, जबकि भारत इस बात के लिए ही संघर्ष करता है कि कैपिटल हिल में उसकी बात सुनी जाए. और यह सब इसके बावजूद है कि भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने परमाणु संधि को सफल बनाने के लिए अपनी सरकार तक को दांव पर लगा दिया.

लेकिन नहीं, यह स्तंभ ओबामा और इस उपमहाद्वीप की राजनीति के बारे में नहीं है. यह स्तंभ ओबामा के अद्भुत गुणों के बारे में है. बहुत बड़े पैमाने पर ऐसे गुण, जो अभी तक उजागर भी नहीं हुए हैं और उन्हीं गुणों ने अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के मात्र 37 सप्ताह के भीतर उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार का हकदार बना दिया. जब बराक ओबामा ने व्हाइट हाउस में प्रवेश किया, उसके एक हफ्ते के भीतर ही नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकन बंद हो गए. मैं यह बिलकुल समझ नहीं पाता कि ज्यूरी ने ओबामा का किस आधार पर चयन किया और क्यों, जब तक कि निर्णायक समिति के शानदार सदस्य इतने दूरदर्शी और भविष्यद्रष्टा न हों कि वह पहले से ही यह अनुमान लगा लें कि ओबामा एक दिन इतिहास रचेंगे. सच तो यह है कि बेचारे ओबामा ने अब तक कोई ऐसा काम नहीं किया है, जिससे इस पुरस्कार के लिए उनकी पात्रता सिद्ध होती हो. इराक और अफगानिस्तान में युद्ध अब तक जारी है. उन्होंने पाकिस्तान में सबकुछ उलझाकर रख दिया है, बल्कि उसे और बिगाड़ दिया है. फिर यह अवॉर्ड उन्हें किसलिए दिया गया है?

आपको यह भी पता होना चाहिए कि ओस्लो में बैठे हुए लोग बड़ी बारीकी से सबकुछ पर नजर रखने वाले लोग हैं. महात्मा गांधी को विगत सदी का सबसे ताकतवर शांतिदूत कहा जाता है, इसके बावजूद ओस्लो के लोगों को यह नहीं लगा कि वे नोबेल शांति पुरस्कार के सही पात्र हैं. महात्मा गांधी ने वास्तव में कुछ ऐसे काम किए, जो बिलकुल अलग हटकर थे. उन्होंने हमारी आजादी की लड़ाई में अहिंसा को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया और उस संघर्ष को सफलतापूर्वक उसकी परिणति तक पहुंचाया. इसके बावजूद उन्हें इस पुरस्कार के लिए पर्याप्त योग्य नहीं पाया गया तो मैं यह अनुमान करता हूं कि कमेटी के मानदंड बड़े बारीक और शुद्धतावादी होंगे. इसलिए मैं यह जानने के लिए और भी ज्यादा उत्सुक हूं कि एक हफ्ते से भी कम समय के भीतर ओबामा ने ऐसा क्या कर दिया कि वे इस पुरस्कार के नामांकन के योग्य हो गए.

यह पूरा प्रकरण मुझे उस सवाल की ओर लेकर जाता है, जो अकसर मुझे परेशान करता है. शोहरत या प्रसिद्धि किन चीजों से मिलकर बनती है? लोग क्यों प्रसिद्ध होते हैं? उनकी उपलब्धियां क्या होती हैं, जो हमें प्रेरित करती हैं कि हम उन्हें याद रखें? आखिरकार बहुत से ऐसे अच्छे स्त्री-पुरुष हैं, जिन्हें हमने इतनी आसानी से भुला दिया है, इसके बावजूद कि उनकी सफलताएं इतनी मामूली नहीं थीं. ऐसे सौ लोगों के नाम मैं गिना सकता हूं. ऐसे लोग, जिन्हें हमने उनके जीवन काल में ही भुला दिया. मैं ऐसे भी सौ लोगों को जानता हूं, जो शोहरत की बुलंदी पर चढ़े रहे, लेकिन उनकी शोहरत का कोई एक कारण भी मेरी समझ में नहीं आता. नहीं, डरिए मत. मैं एंडी वेरहोल और उनका १५ मिनट में शोहरत वाला प्रसिद्ध चुटकुला नहीं सुनाने जा रहा हूं. मेरा सवाल ज्यादा आसान और सीधा है- शोहरत का मतलब क्या है? हम सब इसके पीछे क्यों इतना हाथ-पैर मारते रहते हैं?

आज लोग अपनी वास्तविक उपलब्धियों की वजह से प्रसिद्ध नहीं होते हैं. आज कुछ सफलताएं तो ऐसी हैं, जो खरीदी जा सकती हैं.


ऐसे लोग होते हैं, जो बहुत महान काम करते हैं और प्रसिद्ध हो जाते हैं. ऐसे भी लोग होते हैं, जो बदनामी वाले काम करते हैं और उनका नाम हो जाता है. एक तीसरी किस्म के भी लोग होते हैं, जो कुछ भी नहीं करते हैं और प्रसिद्ध हो जाते हैं. वे लोग पेरिस हिल्टन की तरह होते हैं, जो सिर्फ प्रसिद्ध होने के लिए प्रसिद्ध होते हैं. पिछले एक दशक में पद्मश्री सम्मान पाने वालों की सूची पर जरा गौर फरमाइए. उनमें से कितने लोगों को आप पहचान पाते हैं, जिन्होंने कुछ ऐसा काम किया, जिसका आप सम्मान करते हैं. हमारे समय में प्रसिद्धि और शोहरत बहुत तेज गति से दौड़ने वाली चीज बन गई है. पिछले हफ्ते जो प्रसिद्ध था, इस हफ्ते कचरे के डिब्बे में होगा. इसकी एक वजह हमारी एकाग्रता का अभाव भी है. आज किसी के भी पास कुछ भी याद रखने का धर्य नहीं है.

इसकी एक वजह यह भी है कि आज लोग अपनी वास्तविक उपलब्धियों की वजह से प्रसिद्ध नहीं होते हैं. वे प्रसिद्ध हैं, क्योंकि ऐसे कुशल विशेषज्ञों को इस काम में लगा रखा है, जो उनकी शोहरत और सार्वजनिक छवि का प्रबंधन संभालते हैं. आज कुछ सफलताएं तो ऐसी हैं, जो खरीदी जा सकती हैं. आज कुछ प्रतिष्ठित संस्थानों से सम्मानित डॉक्टरेट धारकों को नियुक्त किया जा सकता है. आपको सिर्फ इतना ही करना है कि सही जगह सही जोड़ बिठाना है, पैसा देना है और बस हो गया आपका काम. मैं जानता हूं कि यह अच्छी बात नहीं है. लेकिन आज यही हो रहा है. क्या आप लोगों पर यह आरोप लगा सकते हैं कि वे सनकी हैं? आज कुछ भी खरीदा जा सकता है.

समीक्षा, रेटिंग, अवॉर्ड, इनाम, सम्मान कुछ भी. आपको चाहिए कि बस सही खरीदने वाले से संपर्क साधें . जो योग्य हैं, उन्हें भी प्रसिद्ध होने के लिए मेहनत करनी पड़ती है. मैं ऐसे लोगों को जानता हूं, जो पहचान पाने के लिए भूखे हैं, लेकिन इसके लिए कुछ करते नहीं. मैं उन पर आरोप नहीं लगाता. इतना घालमेल है कि जब तक उनकी पहचान बने, उनका किया काम, चाहे वह कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न हो, गायब हो जाता है. इसलिए छवि लगातार हवा में गुम होती जा रही है. चेहरे नकली हैं. कॉस्मेटिक से शरीर को हर कुछ दिनों पर नया आकार दिया जाता है, वैसे ही जैसे हम कपड़े बदलते हैं. लेखक, संगीतकार, दार्शनिक, टीवी एंकर, योग गुरु, गायक, चित्रकार, बिजनेसमैन और आध्यात्मिक गुरु, सब एक ही जगह एक साथ बेचे जा रहे हैं, जैसे हम फिल्मी सितारों, क्रिकेटरों और फुटबॉल सितारों को बेचते हैं. इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि हमने प्रसिद्धि को गंभीरता से लेना छोड़ दिया है और मजेदार बात यह कि हम इसके बगैर रह भी नहीं सकते. प्रसिद्ध लोगों और उनकी अप्रसिद्ध जुगत के बिना यह दुनिया कितनी नीरस हो जाती.

जहां तक ओबामा की बात है, वह सचमुच काफी शर्मिदा हुए होंगे. आखिर पर्दे के पीछे किसी ने तो इसके लिए काम किया ही होगा.

15.10.2009, 00.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

anwar suhail (anwarsuhail_09@yahoo.co.in) bijuri, anuppur mp

 
 प्रीतीश नंदी और असगर अली इंजीनिय़र के आलेख इस अंक की जान हैं. 
   
 

sahespuriya (sahespuriya@gmail.com) india

 
 समझ नहीं पा रहा हूं ओबामा को नोबल क्यों दिया गया. ओबामा ने अमन के लिए कौन सा तीर मारा है? कोई हमें भी बताए. 
   

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