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विनोबा और इस्लाम

विचार

 

विनोबा और इस्लाम

डॉ. असगर अली इंजीनियर

 


मेरे एक मित्र श्री डेनियल मझगांवकर ने हाल में मुझे विनोबा भावे की इस्लाम पर लिखी हिन्दी पुस्तक की एक प्रति भेंट की. वे यह जानना चाहते थे कि पुस्तक में कुरान की आयतों और हदीस के उध्दरण सही हैं या नहीं. मैं अभी पुस्तक के उन हिस्सों को पढ़ रहा हूं जिनमें विनोबाजी ने कुरान और हदीस को उध्दत किया है. मैंने अभी पूरी पुस्तक नहीं पढ़ी है परंतु जो कुछ मैंने पढ़ा है, उसके बारे में अपने विचार मैं पाठकों से बांटना चाहता हूं.

जो लोग विनोबा भावे से परिचित नहीं हैं, उन्हें मैं बता दूं कि वे गांधीजी के प्रमुख अनुयायियों में से एक थे. उन्होंने गांधीवादी विचारधारा के अनुरूप एक अभियान चलाया था जिसके अन्तर्गत जमींदारों से उनकी सहमति से जमीन लेकर भूमिहीन किसानों में बांटी जाती थी. इस आंदोलन का नाम भूदान आंदोलन था. यह आंदोलन, कानून के जरिये जमींदारों की अतिशेष भूमि छीनकर उसे भूमिहीनों को देने का गांधीवादी विकल्प था. यह आंदोलन असफल हो गया क्योंकि जमींदारों ने या तो भूमि दान की ही नहीं और यदि की भी तो ऐसी भूमि जो बंजर थी. सरकार का ऐसा ही प्रयत्न भी सफल न हो सका.

इस लेख में हमें केवल विनोबा भावे के इस्लाम के बारे में विचारों से वास्ता है. मैंने सुना था कि विनोबा भावे अरबी सहित कई भाषाएं जानते थे और उन्होंने कुरान मूल अरबी में पढ़ी थी. मैं उनके अनुयायियों के इस दावे की सत्यता के बारे में तो कुछ नहीं कह सकता परंतु इतना अवश्य कहूंगा कि उन्हें कुरान की गहरी समझ थी और अपनी पुस्तक में उन्होंने हिन्दू धर्म और इस्लाम का जो तुलनात्मक अध्ययन किया है, वह अत्यंत विद्वतापूर्ण है और उसका स्तर दारा शिकोह की पुस्तक ‘मजमा-अल्-बह्रेन’ (दो महासागरों का मिलन-इस्लाम और हिन्दू धर्म) से कहीं कम नहीं है.

हमारे देश में प्रजातांत्रिक राजनीति, सत्ता की राजनीति बन गई है. सत्ता की खातिर राजनेता अपने स्वयं के धर्म को नुकसान पहुंचाने से भी हिचकिचाते नहीं हैं.


मेरी राय में जब यह पुस्तक प्रकाशित होकर बाजार में आयेगी, तब यह हिन्दुओं और मुसलमानों की आपसी समझ को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी. वर्तमान में तो शिक्षाविद्, मीडिया और अध्येता, इस्लाम और हिन्दू धर्म की अत्यंत सतही जानकारी के आधार पर तरह-तरह की गलतफहमियां फैला रहे हैं. दारा शिकोह के बाद, हमारे देश के धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन करने वाले सबसे महान विचारक थे मौलाना आजाद. कुरान पर उनकी टीका (तर्जुमन अल् कुरान) ने इस्लाम और हिन्दू धर्म सहित अन्य धर्मों के संदेश की सही व्याख्या आम लोगों तक पहुंचाकर देश की बड़ी सेवा की है.

मेरा विचार है कि मौलाना आजाद के बाद, हिन्दुओं में विनोबा जी एक ऐसे व्यक्ति हैं, जो इस्लाम और अन्य धर्मों की मूल आत्मा को पकड़ सके हैं. दुर्भाग्यवश, इन दिनों धार्मिक विषयों के विद्वान-चाहे वे किसी भी धर्म के हों-धार्मिक मसलों का राजनीति से घालमेल कर देते हैं. वे केवल धर्म के अध्ययन और विवेचन तक स्वयं को सीमित नहीं रखते. इस्लाम के खिलाफ और उसके समर्थन में इन दिनों बहुत कुछ लिखा जा रहा है पर दोनों ही प्रकार के लेखन का कोई न कोई राजनैतिक एजेन्डा है. कहना न होगा कि इस तरह के लेखन में कभी भी धर्म की संतुलित और सटीक व्याख्या नहीं हो सकती.

यह अतिआवश्यक है कि इस्लाम और हिन्दू धर्म की मूल आत्मा से आमजनों को परिचित कराया जाए. जो ऐसा करेगा वह धार्मिक विवादों से छलनी हमारे देश की एक बहुत बड़ी सेवा करेगा. हमारे देश में प्रजातांत्रिक राजनीति, सत्ता की राजनीति बन गई है. सत्ता की खातिर राजनेता अपने स्वयं के धर्म को नुकसान पहुंचाने से भी हिचकिचाते नहीं हैं. हिन्दुत्ववादी अपने ही धर्म के संदेश को तोड़ते-मरोड़ते हैं और मुस्लिम अतिवादी, इस्लाम के साथ ऐसा ही करते हैं.

अपनी पुस्तक के छठवें अध्याय में विनोबा भावे, हिन्दू धर्म और इस्लाम की मूल आत्मा को पकड़ने की कोशिश करते हैं. इसके पहले कि मैं विनोबा जी के इस्लाम के बारे में विचार प्रस्तुत करूं, मैं उनके द्वारा की गई एक बड़ी गलती की ओर ध्यान आकृष्ट कराना चाहता हूं. अध्याय की शुरूआत में ही वे कहते हैं कि मोहम्मद को 'रसूलुल्लाह'' (अल्लाह का संदेशवाहक) उनके अनुयायियों ने कहा था और उन्होंने स्वयं कभी यह दावा नहीं किया कि वे रसूलुल्लाह हैं. इस गलती को पुस्तक के संपादकों को फुटनोट के जरिये ठीक कर लेना चाहिए. कुरान, जो कि दैवीय है, ने ही मोहम्मद को रसूलुल्लाह कहा है.


परंतु जब विनोबा जी कहते हैं कि मोहम्मद ने कभी अल्लाह का स्थान लेने का दावा नहीं किया तो वे बिल्कुल ठीक कहते हैं. कुरान स्वयं मोहम्मद को अबीद-वा-रसूलुल्लाहू (ईश्वर के दास व संदेशवाहक) कहती है. विनोबा जी ठीक कहते हैं कि पैगम्बर मोहम्मद ने फरमाया था कि वे कोई नई बात नहीं कर रहे हैं. वे उसी सच को दोहरा रहे हैं जिसे पहले के पैगम्बरों ने फरमाया था. शायद इस मामले में इस्लाम, हिन्दू धर्म के करीब है. हिन्दू धर्म भी यह मानता है कि सत्य सर्वव्यापी है और ऋगवेद में कहा गया है कि ''सत्य एक है परंतु ज्ञानी उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं.''

इसके बाद विनोबा जी दोहराते हैं कि मोहम्मद साहब का केवल यह दावा था कि वे अल्लाह के संदेशवाहक और अल्लाह के दास हैं. वे अल्लाह नहीं हैं. वे केवल अल्लाह के संदेश को पहुंचाने आए हैं. विनोबा जी यह भी कहते हैं कि कुरान के अनुसार राष्ट्रों के लिए कोई न कोई पथ प्रदर्शक (संदेशवाहक) होता है.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

JASBIR CHAWLA (chawla.jasbir@gmail.com) INDORE

 
 विनोबा जी के अनुयायी सर्वोदयी भी इसका प्रचार नहीं कर सके. असगर अली जी को धन्यवाद. 
   
 

डॉ.लाल रत्नाकर (ratnakarlal@gmail.com) गाजियाबाद

 
 मुसलिम हो या हिन्दू इन पर धार्मिक कब्जो के जो मालिक है, वह दोनों धर्मो के मौलवी और पोंगे पंडितों ने इतना घुमा फिराकर चलन में लाये है जिससे आम आदमी धार्मिक कम, पाखंडी ज्यादा है. यदि इस पर आज़ाद भारत में बिनोवा सरीखे और लोंगो ने कम किया होता तो धर्म की इतनी दयनीय दशा न होती. असगर अली साहब ने बिनोवा जी के इसलाम की समझ के बारे में उस पुस्तक में जितना भी पढ़ा हो, कही न कही बिनोवा जी इन दोनों कौमों के बारे में चिंतित तो थे ही जो उस ज़माने के जमींदार और सरकार में बैठे लोंगों को अच्छा नहीं लग रहा था. जो किसी न किसी रूप में आज भी हो ही रहा है.

 
   
 

Dr.Abdul Rashid (Journalist) (aabdul_rashid@rediffmail.com) Singrauli

 
 A very good story but it will be better when INDIAN will think about it.It will be best when INDIAN will use it in daily life. 
   

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