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बदलाव से हिचकिचाहट

विचार

 

बदलाव से हिचकिचाहट

प्रीतीश नंदी

 

महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव नतीजों से क्या आपको आश्चर्य हुआ? मैं जिन लोगों को जानता हूं, उनमें करीब 50 फीसदी लोगों ने कहा- हां, हमें आश्चर्य हुआ. क्यों? क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि मतदाता उस बिल्कुल नाकारा और अक्षम सरकार को उखाड़ फेंकेंगे जिसने किसी भी मोर्चे पर कुछ भी नहीं किया. राज्य में बुनियादी ढांचा ढह रहा है. शहरों में चाहे बिजली हो या पानी, ट्रेन सुविधा हो या सड़क, हर मामले में हालत खराब है. इससे भी बदतर मंदी (जिससे कि सरकार इनकार करती आई है) ने आम लोगों का जीना दूभर कर रखा है.

वेतन में कटौती हो रही है, नौकरियां खत्म हो रही हैं, जरूरी वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं और निवेश में सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं रह गई है. साथ ही आतंकी हमलों और बम धमाकों के रूप में बीच-बीच में होने वाली हिंसात्मक घटनाएं लोगों को हमेशा भयभीत किए रहती हैं. ग्रामीण महाराष्ट्र में तो हालत और भी खस्ता है. वहां किसान इस कदर खुदकुशी कर रहे हैं कि जल्दी ही यह आंकड़ा मुंबई की सड़कों पर टक्कर मारकर भाग जाने वाले वाहनों की संख्या से ऊपर निकल जाएगा.

उधर दूसरी ओर मेरे जानने वाले 50 फीसदी लोगों ने कहा- हमें इसमें कोई आश्चर्य नहीं हुआ. आप चाहते क्या हैं? जब सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा हो तो आप क्या यह चाहते हैं कि लोग जोखिम उठाएं और बदलाव के लिए वोट करें? हमने जब भी बदलाव के लिए वोट दिए हैं, हालात और भी बदतर हुए हैं. अब हमने स्थिरता और निरंतरता के लिए वोट दिए तो इसमें आश्चर्य क्यों? ठीक है, अभी कुछ भी अच्छा होता नजर नहीं आ रहा, लेकिन हम एक और पीड़ादायक राजनीतिक उथल-पुथल झेलने के लिए तैयार नहीं हैं. एक बार स्थितियां ठीक हो जाएं तो फिर हम बदलाव के लिए सोचेंगे.

यह समय तो उन चीजों को संभालकर रखने का है जो पहले से ही हमारे पास हैं. क्यों न हम इन लोगों को एक और मौका दें. हो सकता है कि वे कुछ अच्छा काम करें. यदि तब भी वे कुछ काम नहीं करते हैं तो हम उन्हें बाद में बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं. संक्षेप में कहें तो ये लोग मौजूदा स्थिति से खुश और संतुष्ट तो कतई नहीं हैं, लेकिन वे तब तक बदलाव को टालते रहेंगे, जब तक कि स्थिति में सुधार नहीं होता.

दिलचस्प है ना? जिस देश में 40 फीसदी लोगों को रात को भूखे ही सो जाना पड़ता है, वहां हम अब भी बदलाव से हिचकिचा रहे हैं. इसलिए मुंबई और महाराष्ट्र की स्थिति से नाखुश तो हर व्यक्ति है, लेकिन बदलाव के अभिलाषी चंद गिने-चुने लोग ही हैं. बाकी लोग अभी इंतजार करेंगे.

चुनावी बदलाव का गणित भी रोचक है. प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में यथास्थिति का प्रतिनिधित्व करने वाला एक ही व्यक्ति होता है. उस एक व्यक्ति के खिलाफ बदलाव के लिए आपके पास कई विकल्प होते हैं. आप उनमें से किसी एक को चुन सकते हैं. आप मुख्यधारा की किसी विपक्षी पार्टी के उम्मीदवार को चुन सकते हैं, आप चाहें तो किसी बागी उम्मीदवार को या फिर किसी निर्दलीय व्यक्ति को भी चुन सकते हैं. निर्दलीयों में कुछ निश्चित ही बेदाग छवि के ऐसे विश्वसनीय लोग होते हैं, जिन्हें एनजीओ का समर्थन हासिल रहता है. कुल मिलाकर तथ्य यह है कि हमारे समक्ष बदलाव के लिए इतने सारे विकल्प रहते हैं कि वोट हमेशा कई लोगों में बंट जाते हैं. इसी वजह से स्थिरता को साफ बढ़त मिल जाती है.

हमें अपनी हताशा, अपने गुस्से को अभिव्यक्त करने का मौका हर पल, हर दिन मिलता है. हम कभी भी बदलाव की मांग कर सकते हैं और हमें ऐसा जरूर करना चाहिए

प्रत्येक चुनाव में एक दूसरा अहम कारक वोट देने की प्रेरणा से संबंधित है. इस बात पर जोर देना निहायत बकवास होगा कि प्रत्येक समझदार भारतीय को वोट जरूर देना चाहिए. वोट नहीं देना भी उतना ही वैध राजनीतिक निर्णय है, जितना कि वोट देना. लोग इसलिए वोट देने घर से बाहर नहीं निकलते कि वे आलसी हैं, बल्कि इसलिए कि वे निराश हैं. मतदाता कहता है, मैं इन सभी ठगों से नफरत करता हूं और इनमें से किसी को भी वोट नहीं दूंगा. मुझे कोई अच्छा विकल्प दीजिए.

हम जितना कम मतदान करेंगे, राजनीतिक दल कहीं बेहतर उम्मीदवार उतारने को विवश होंगे. अभी दल जिस तरह के लोगों को मैदान में उतारते हैं, वे हमें शर्मिदा करने वाले होते हैं. हर चुनाव के साथ यह स्थिति बद से बदतर होती गई है. दरअसल, यदि हम चाहते हैं कि अधिक से अधिक लोग वोट दें तो हमें अपनी वोटिंग प्रणाली में ‘एनओटीए’ बटन को भी शामिल करना होगा (एनओटीए : नन ऑफ द अबव यानी ऊपर में से कोई भी नहीं). इससे मतदाता के पास एक विकल्प और बढ़ जाएगा. वह मतदान तो करेगा, लेकिन उसका वोट चुनाव मैदान में खड़े किसी भी उम्मीदवार के पक्ष में नहीं होगा. यदि एनओटीए के पक्ष में सर्वाधिक वोट पड़ते हैं तो हम नए उम्मीदवारों के साथ वहां पुनर्मतदान की मांग कर सकते हैं.

स्थिरता बनाम बदलाव के इस गणित में सबसे बचकानी बात यह है कि विपक्षी पार्टियों को एकजुटता के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है, ताकि बदलाव के लिए चुनाव मैदान में खड़े होने वाले उम्मीदवारों की संख्या को कम किया जा सके. लेकिन जो लोग सत्ता में बैठे हैं, उन्हें बस यही करना है कि विपक्ष में दिक्कतें खड़ी करते रहें. आप विपक्षी दलों में जितने असंतुष्ट और बागी पैदा कर सकेंगे, उन्हें हराना उतना ही आसान हो जाएगा. राजनीतिक मुद्दों को छोड़ दें, पैसा भी यह काम आसानी से कर सकता है. आप पैसा देकर अधिक से अधिक लोगों को चुनाव मैदान में उतार दीजिए. इससे सत्ता में बैठे लोगों के लिए जीत और आसान हो जाएगी.

अब जबकि जनादेश स्थिरता के पक्ष में आया है और कांग्रेस एक बार फिर से अगले पांच साल के लिए सत्ता में आ गई है तो वक्त इस बात पर ध्यान केंद्रित करने का है कि सरकार को कार्य करने के लिए कैसे मजबूर किया जाए. हममें से अधिकांश लोगों का मानना है कि हमें सरकार बदलने का मौका पांच साल में एक बार ही मिलता है, लेकिन यह सच नहीं है. हमें अपनी हताशा, अपने गुस्से को अभिव्यक्त करने का मौका हर पल, हर दिन मिलता है. हम कभी भी बदलाव की मांग कर सकते हैं और हमें ऐसा जरूर करना चाहिए. यह हमारा लोकतांत्रिक अधिकार है. सरकार काम करती रहे, इसका एकमात्र तरीका भी यही है.

किस्मत से मैं पत्रकार हूं जिससे अपनी हताशाओं को अभिव्यक्त कर सकता हूं. लेकिन हमारे समाज में ऐसे और भी कई लोग हैं जो अपनी आवाज बुलंद करते हैं. इनमें विचारक, कवि, सामाजिक कार्यकर्ता, नाटककार, चित्रकार, राजनीतिज्ञ इत्यादि शामिल हैं. ये ही लोग भारतीय लोकतंत्र को इतना जीवंत बनाते हैं. इस अधिकार और अवसर का सम्मान कीजिए. इसका इस्तेमाल कीजिए.


29.10.2009, 11.22(GMT+05:30) पर प्रकाशित