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देवता उदास हैं

देवता उदास हैं

राजेंद्र मिश्र

पिछले कुछ दिनों से मैं एक दिलचस्प काम में जुटा हूं- नगर में प्रतिष्ठित देव-मूर्तियों की गिनती का काम. यह काम निरापद तो है नहीं. कभी महर्षि व्यास ने कालातीत को काल और देशातीत को देश में बांधने के लिए पाश्चाताप किया था. गणनातीत को गणना में जानने के लिए आरंभ से मैं उनसे क्षमा-प्रार्थी हूं. अब क्या किया जाए ? पढ़ने देखने की लोकप्रिय और आधुनिक पद्धति यही है कि पहले हम आँकड़े बटोरें और फिर उनके आधार पर वांछित विश्लेषण आदि की दिशा में आगे बढ़ें.

लगभग छ: लाख की आबादी वाले हमारे नगर में मित्रों के सहयोग और सक्रियता से अब तक तीन हजार पांच सौ साठ के करीब प्रतिष्ठित देवताओं की जानकारी मिली है. जाहिर है कि यह गिनती अधूरी है. हम अधूरी गिनतियों में ही तो मनुष्य और उसके संसार को छूने-बूझने के आदी हैं. अधूरे आंकड़े के इस घेरे में घरों में विराजे देवता शामिल नहीं हैं. हम केवल उन्हीं मूर्तियों को गिन रहें हैं जो छोटे-बड़े मंदिरों में, जलाशयों के किनारे, सड़कों और गलियों के दाएं-बाएं, बरगद और पीपल के विशाल वृक्षों के नीचे और चौराहों के आसपास हैं.

अधूरेपन में संसार को बूझने की कोशिश

राजेंद्र मिश्र

हजारों मूर्तियों की उपस्थिति के बावजूद पवित्रता का अवकाश धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है.

 

पुराने मंदिरों के साथ शहर के इतिहास की मार्मिक स्मृतियां हैं. उनकी संरचना पर मध्यकालीन स्थापत्य का गहरा असर है. वह बस्ती जहां पुरानी देव-प्रतिमाएं हैं, अब भी ‘पुरानी-बस्ती’ कही जाती है. और लगातार अपने सिकुड़ते भूगोल के बावजूद उनके पास का तालाब कम-से-कम नाम से तो अब भी बूढ़ा तालाब है. नए बने मंदिर, आधुनिक समृद्धि के उजले वृत्तांत हैं : उनकी प्रसन्न मूर्तियां अनिमेष दृष्टि से मनुष्य की लीला को चुपचाप देख रही हैं. सबसे अधिक संख्या उन प्रतिमाओं की है जो सड़क के आजू-बाजू स्थापित हैं. वे जहां भी हैं, जैसे भी हैं, देवभूमि में हैं. उन पर भला मनुष्य के बनाए विधि-विधान कैसे लागू हो सकते हैं ?

हमारी इस देव-गणना से पता चलता है कि सबसे अधिक मूर्तियां हनुमानजी की हैं- लगभग दो हजार. वे पवनसुत हैं, महावीर हैं, आंजनेय हैं. सबसे बड़ी बात तो यह है कि वे राम और शिव से जुड़ी अनगिनत कथाओं-उपकथाओं के बीच आज भी अपने भक्तों के संकट-मोचन हैं. भीड़ भरी सड़कों से गुजरता राहगीर-चाहे वह कितना भी गतिशील-प्रगतिशील क्यों न हो-कुछ देर ठहरकर या मन ही मन उन्हें प्रणाम कर ही आगे जाता है. दिन दूने, रात चौगुने संकटों से घिरी दुनिया में सर्वसुलभ हनुमान सबका संकट दूर करते हैं. दूर करते-से दीखते हैं.

 

फाउस्ट और हेलमेट को पश्चिमी सभ्यता के केंद्रीय प्रतीक-पात्रों के रूप में प्रस्तुत करते हुए वात्स्यायनजी के एक विदेशी बंधु ने कभी उनसे इस तरह के भारतीय पात्रों को लेकर जिज्ञासा व्यक्त की थी. वात्स्यायन ने तुरंत हनुमान और नारद का नाम लिया था. आराध्य के प्रति अशेष समर्पण और विनय के निष्कंप बोध ने ही तो राम से अधिक गौरव राम के इस दास को दिया है !

हनुमान के बाद, हमारी गिनती में आशुतोष, महाकालेश्वर, नटराज, नीलकंठ, महादेव आदि नामों से पुकारे जाने वाले शिव हैं. छोटे बड़े मंदिरों में या फिर खुले चबूतरों में लोहे की तिपाई पर टिका घड़ा और शिवलिंग पर उससे बूंद-बूंद टपकता जल शिव- उपासना का पवित्र हिस्सा है. यहां के मारवाड़ी श्मशान में शिव अपने अदृश्य गुणों के साथ, जलती चिता में जैसे मृत्यु को जीवन के उत्सव के रूप में देखते हैं. महादेव घाट के शिवालय में भक्तों की भीड़ रहती है. आशुतोष बिना बोले बहुत कुछ देते हैं. नारायण, नर की व्यथा जानते हैं, लेकिन यह भी सच है कि नर की अनझिप आंखों में ‘नारायण की व्यथा’ भी जब-तब डोलती है.

तीसरे देवता शनि महाराज हैं. गोलबाजार के बीच उनका एक मंदिर है, लेकिन आप चाहें तो वहां भी न जाएं. शनिवार के दिन विभिन्न सार्वजनिक जगहों में ही नहीं, मुहल्ले-मुहल्ले में छोटी-सी तेल-भरी पीतल की बाल्टी में डूबे शनि महाराज को लेकर घूमने वाले बाबाओं की तो कोई कमी नहीं है. हमारे घर में पिछले बारह बरसों से शनिवार को नियत समय में शनिबाबा, शनि महाराज को लेकर आते हैं. संस्कार और अभ्यासवश अर्चना एक-दो सिक्के बाल्टी में जरूर डालती हैं. पहले बाबा पैदल आते थे. बाद में साइकिल-सवार हो गए. शनि महाराज की कृपा से अब उन्हें लूना मिल गई है.


इधर दो महीनों से उनका कोई अता-पता नहीं.

कल अचानक एक युवक आया. बिलकुल उसी सजधज के साथ.


उससे पता चला कि बाबा अब कभी नहीं आएंगे. उन्होंने परचून की एक दुकान खोल ली है. इस युवक को उन्होंने एवजी शनिबाबा बनाकर अपने वार्ड को उसी के सुपुर्द कर दिया. अपनी साढ़े साती दूसरे पर उतार दी है !


हजारों मूर्तियों में पूजित इन तीनों देवताओं के अलावा हमारी सूची के देव-मंडल में अभी कई प्रतिष्ठित देवता और देवियां हैं. अचरज तो यह है कि इनकी उपस्थिति के बावजूद पवित्रता का अवकाश धीरे-धीरे सिमटता जा रहा है. जलहरी सूख रही है. देवता उदास हैं. आपके शहर में भी शायद ऐसा कुछ हो रहा हो.

 

19.04.2008, 00.48 (GMT+05:30) पर प्रकाशित