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हमारी हिम्मत उनकी हार

बहस

 

हमारी हिम्मत उनकी हार

प्रीतीश नंदी



अपनी असफलताओं पर मातम मनाने की जरूरत नहीं है. महत्वपूर्ण है भविष्य के लिए तैयार होना, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है जिंदगी का प्रवाह. दुनिया को यह दिखा देना कि हम भयभीत नहीं हैं. 26/11 जैसा आतंक हमारी आत्मा को नहीं तोड़ सकता. यही है हमारी हिम्मत, हमारा विवेक और हमारा राष्ट्र और इसी में छिपी है उनकी हार, जो आतंकवाद को अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं.

आतंकवाद का इकलौता मकसद हमें आतंकित करना है. आतंकवाद होता है डर पैदा करने के लिए. चारों ओर रीढ़ को कंपा देने वाला भय और आतंक फैलाने के लिए. अगर आतंकवादी यही काम ठीक से न कर पाएं, जितना वह चाहते हैं, उतना आतंक और सदमा न फैला पाएं तो उनका पूरा मकसद ही असफल हो जाता है.

इतने सारे खून-खराबे, असंख्य मौतों से कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है. लोग इस दुर्घटना को भी उतनी ही जल्दी भुला देते हैं, जितनी जल्दी वे किसी बस के घाटी में गिर जाने या तेज गति से आ रही ट्रेन के टकरा जाने की दुर्घटना को भुला देते हैं. मृत्यु के आंकड़े हमें नहीं डराते. जो चीज डराती है, वह यह कि मौत हुई कैसे.

यही फर्क है एक दुर्घटना और एक आतंकी हमले में. दुर्घटना ईश्वरीय नियति होती है. हालांकि कुछ कट्टरपंथी हमें यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि आतंकी हमले भी दरअसल ईश्वरीय कृत्य हैं. ऐसा नहीं है. आतंकवाद दूसरे अपराधी कृत्यों की तरह ही एक अपराध है.

अपराधी ही आतंकवाद की योजनाएं बनाते और उसे अंजाम दिया करते हैं और अकसर कुछ मूर्ख, गुमराह युवक, जिनके मन में अपनी जिंदगी और इस समाज के प्रति गहरा आक्रोश है, ऐसे षड्यंत्रों की वजह बन जाते हैं. एक वक्त ऐसा भी था, जब मैं ऐसे लोगों के साथ एक शब्द गरीब भी जोड़ देता, लेकिन अब नहीं. आज जिस तरह के लोग आतंकवाद का षड्यंत्र रचते हैं, योजनाएं बनाते हैं और उसे सरंजाम तक पहुंचाते हैं, वे कतई मुफलिसी के शिकार नहीं हैं.

वे गरीब, अशिक्षित और मूर्ख लोग नहीं हैं, जो धार्मिक और सियासी लीडरों के छद्म वेष में छिपे अपराधियों द्वारा गुमराह किए गए हों. जैसे कि कसाब ने न्यायालय के सामने कहा था कि जब वह छोटा बच्चा था, तभी उसके पिता ने उसे लश्कर को बेच दिया था. वह उन्हीं विचारों के साए में बड़ा हुआ. बचपन से उसे वही घोंट-घोंटकर पिलाया गया था.

आज के आतंकवादी इससे बिल्कुल अलहदा हैं. वे खासे चतुर, तेज-तर्रार और पढ़े-लिखे हैं. वे ऐसे युवा मर्द और औरतें हैं, जिनकी बेहतरीन परवरिश हुई है. उन्होंने अपनी मर्जी और खुशी से अपने अधिकारों की खातिर लड़ने के लिए आतंकवाद का रास्ता चुना है.

वे अधिकार, जिसके बारे में उनका यकीन है कि वे उनसे जुड़े हैं. उन्हें हराना आसान नहीं है और जैस-जैसे वक्त गुजरता जाएगा, यह काम और भी मुश्किल होता जाएगा क्योंकि वे ऐसे लोग नहीं हैं, जिनकी आसानी से शिनाख्त की जा सके, जिनके बारे में आसानी से ये अंदाजा लगा लिया जाए कि वे खतरनाक आतंकवादी हैं.

अपनी असफलताओं और गलतियों पर मातम मनाने की कोई जरूरत नहीं है. महत्वपूर्ण है भविष्य के लिए तैयार होना. उतना मुस्तैद, जितना कि हम हो सकते हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है जिंदगी का प्रवाह.

उनमें से बहुत से गोरी चमड़ी वाले हैं. कुछ पश्चिम के बहुत रसूख वाले परिवारों से ताल्लुक रखते हैं. नहीं, वे तीसरी दुनिया के गरीब देशों से नहीं आते. आज आतंकवादी अरमानी सूट पहनते हैं, दुनिया की बेहतरीन यूनिवर्सिटी का तमगा उनके कपड़ों पर सजा होता है.

चौंकाना उनका गुप्त हथियार है. इसलिए दुनिया के सामने उनका पहला खुलासा अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब होता है, वह रीढ़ों को कंपा देने वाला आतंक फैलाने में कामयाब होता है. इसीलिए वे सुर्खियां भी बटोरते हैं.

सुर्खियां ही तो वह चीज है, जिसे पाने के लिए आतंकवादी मरते रहते हैं. सुर्खियों में नाम और टेलीविजन पर बिना रुके लगातार उनकी खबरें. इसीलिए तो 9/11 उनकी इतनी बड़ी सफलता थी. इसीलिए बाली में 12/10, लंदन में 7/7, मुंबई में 26/11 के धमाके इतना असर छोड़ गए.

अभी हाल ही में पेशावर और रावलपिंडी में हुए बम धमाकों की इससे कोई तुलना ही नहीं है. यह आईएसआई के लिए एक संदेश था कि जब तक पाकिस्तान अरबों डॉलर की एवज में अमेरिकी सेना के लिए किराए के टट्टू की तरह काम करता रहेगा, तब तक वे लोग उसे चैन से नहीं जीने देंगे.

यह संदेश उन्हीं लोगों की तरफ से था, जो कभी खुद आईएसआई के गुर्गे रह चुके हैं. एक बार दैत्य की लगाम हाथ से छूट जाए तो उसे फिर से कब्जे में लेना आसान नहीं है. लोग इन आतंकवादी हमलों में मर रहे हैं. जाने कितना खून-खराबा हो रहा है. औरतें, बच्चे, साधारण लोग हिंसा के इस भयानक बवंडर में बहे जा रहे हैं, लेकिन इनमें से कोई भी चीज उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी कि सुर्खियां. सुर्खियां भय, पीड़ा और आतंक बुनती हैं. आतंकवादियों के लिए सुर्खियां ही सबकुछ हैं.

इसलिए हरेक बार, जब भी हम 26/11 की स्मृतियों को तरोताजा करते हैं, उन्हें फिर से याद करते हैं, घंटों-घंटों टीवी पर खबरें आती रहती हैं, लंबे-लंबे भयभीत करने वाले लेख लिखे जाते हैं कि कैसे आतंकवाद ने हमारी जिंदगियों और हमारी आजादी को ध्वस्त करके रख दिया है तो ऐसा करके हम दरअसल आतंकवादियों को ही बढ़ावा दे रहे होते हैं.

आतंक का जो बुर्ज वह खड़ा करना चाहते हैं, हम इस काम में उनकी मदद कर रहे होते हैं. आतंकवादियों को 9/11 की सफलता का जश्न मनाने की जरूरत नहीं है. हम उनकी तरफ से यह काम किए दे रहे हैं. यहां तक कि जब हम आतंकवाद का शिकार हुए लोगों के लिए आंसू बहाते हैं और दुनिया को यह बताते हैं कि अब हम भविष्य के लिए और ज्यादा मुस्तैद हो गए हैं तो हम उनकी मदद ही कर रहे होते हैं.

अपने आप को ही उल्लू बनाने की जरूरत नहीं है. आतंकवाद हमारे समय का सबसे बड़ा दुख और त्रासदी है और कोई भी सरकार या पुलिस इसका मुकाबला करने के लिए पूरी तरह से सक्षम और तैयार नहीं है. दुख और आतंक के बारे में और इन हिला देने वाली घटनाओं के बारे में हम जितनी ज्यादा बात करते हैं, अपराधी उतना ही जश्न मनाते हैं.

उतना ही वे इतिहास में खलनायक या नायक के रूप में प्रसिद्ध होते जाते हैं. बेशक यह देश-काल और संदर्भो पर निर्भर करता है. पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में जहां तालिबान अपने भर्ती लोगों को प्रशिक्षण देते हैं, उनके लिए कसाब हीरो है और मारे गए आतंकी शहीद.

इसलिए जरूरी है कि ऐसी बरसियों के साथ थोड़ी सावधानी और सजगता बरती जाए. दरअसल हमें अपने राष्ट्र के दिल को पीड़ा के भार से लाद देने की कोई जरूरत नहीं है. 26/11 बहुत भयानक हादसा था. लेकिन साथ ही यह कल्पनातीत शौर्य का भी एक क्षण था. हमने अपने कई शानदार पुलिस अफसरों और भोले-भाले लोगों को खो दिया, जिनके मरने की कोई वजह नहीं थी.

लेकिन हमारा भविष्य इसमें है कि हम उसे याद न करें. अपनी असफलताओं और गलतियों पर मातम मनाने की कोई जरूरत नहीं है. महत्वपूर्ण है भविष्य के लिए तैयार होना. उतना मुस्तैद, जितना कि हम हो सकते हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है जिंदगी का प्रवाह.

दुनिया को यह दिखा देना कि हम भयभीत नहीं हैं. हो सकता है आतंकवाद हमें तकलीफ पहुंचाए, लेकिन वह हमारी आत्मा को नहीं तोड़ सकता. यही है हमारी हिम्मत, हमारा विवेक और हमारा राष्ट्र. और इसी में छिपी है उनकी हार, जो आतंकवाद को अपने हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं

26.11.2009, 00.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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