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शाबास विनोद मेहता!

बात पते की

 

शाबास विनोद मेहता!

कनक तिवारी

अंगरेजी साप्ताहिक 'आउट लुक' के प्रधान संपादक और देश के ख्यातनाम पत्रकार विनोद मेहता ने अपनी पत्रिका के ताजा संस्करण में एक ऐतिहासिक चेतावनी मीडियाकर्मियों के लिए चुनौती की भाषा में चखचख बाजार में उछाल दी है. विनोद मेहता की साफगोई, तीखी प्रखर भाषा और समाज के ज्वलंत मुद्दों पर बेहद पारखी, संतुलित और समकालीन दृष्टि कभी भी अस्वाभाविक विवाद का विषय नहीं बनी. अखबारनवीसों की अनावश्यक रूप से उग आई बड़ी लेकिन अनुशासनहीन उच्छृंखल और धनउगाऊ भीड़ में जो पत्रकार अप्रतिहत खड़े हैं, उनमें विनोद मेहता का नाम महत्वपूर्ण ढंग से उल्लेखनीय है.

प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का काम वैसे तो रचनाधर्मिता की नस्ल का ही है. अखबारों और खबरिया चैनलों का मकसद केवल सूचनाएं देना, रिपोर्टें बनाना या अपनी राय थोपना नहीं है. प्रत्येक मीडिया-स्त्रोत की अपनी एक सोच, शब्दावली और अभिव्यक्ति की शैली सहित समाज के प्रति प्रतिबद्धता होती है. मुक्तिबोध के शब्दों में इसमें कई बार अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होते हैं. इंडियन एक्सप्रेस समूह ने आपातकाल के दौरान अपने मालिक रामनाथ गोयनका के नेतृत्व में साहसी पत्रकारिता का नायाब उदाहरण प्रस्तुत किया था.

आजादी की लड़ाई के दौरान गणेश शंकर विद्यार्थी का 'प्रताप' महाराणा प्रताप की तरह यौद्धिक के बदले बौद्धिक मुकाबला कर रहा था. पत्रकारिता के इलाके में भी अंतत: गांधी ही श्लाका पुरुष बनते दिखाई देते हैं. मध्यप्रदेश के पत्रकारों राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी ने खुद को निष्पक्ष, साहसी और प्रयोगमूलक पत्रकारिता का आंदोलन बना लिया था. पी साईनाथ भी ऐसे ही साहसिक प्रयोग करते रहते हैं. यह सूची लंबी हो सकती है और कई बेहद महत्वपूर्ण पत्रकार इस सूची में उल्लिखित नहीं होने पर भी शामिल समझे जा सकते हैं.

समाचार पत्र 'हिन्दू' स्वतंत्रता के आंदोलन के समय से आज तक साहसिक पत्रकारिता का नमूना है. उसके संपादक एन.राम ने तो सुप्रीम कोर्ट तक की कानूनी स्थितियों में अपनी बात पारदर्शिता और साफगोई के साथ रखी है. 'इकॉनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली' एक शोध पत्रिका के रूप में यदि ख्यातनाम है तो कालम वीर एज़ी नूरानी समझदार पाठकों और समाज के लिए एक कीर्तिस्तंभ बने हुए हैं.

हाल के वर्षों में मीडिया कर्म में बेहद गिरावट आई है. संवाददाता के स्तर पर कम, मालिकों के स्तर पर बहुत ज्यादा. पहले तो विज्ञापन लेना और अनुकूल समाचार छापना गणित के समीकरण की तरह था. यह तो अब बीते जमाने की बात है. अब तो संवाददाता और संपादक की विज्ञापनकबाड़ू या इच्छाधारी भूमिका ही नहीं रही. अब तो महाप्रबंधक सीधे चुनाव के उम्मीदवारों और उद्योगपतियों और नौकरशाहों वगैरह से थोक में डील करते हैं. बने बनाए समाचार संवाददाताओं के मत्थे कलंक की तरह मढ़ दिये जाते हैं.

समाचार पत्रों को पढ़ने और दूरर्दशन के चैनलों को देखने से चटखारे ले लेकर चाट खाने का मजा आता है जबकि उसे समाज का सुपाच्य और विटामिन युक्त भोजन होना चाहिए

जिन पार्टियों और उम्मीदवारों को लेकर जीतने की गारंटीशुदा भविष्यवाणियां की जाती हैं, वे औंधे मुंह या चारों खाने चित होते हैं. संबंधित मीडिया अपनी मिथ्या रिपोर्टिंग के लिए खेद तक प्रकट नहीं करता बल्कि अगले ही दिन से विजयी पार्टियों और उम्मीदवारों का खैरख्वाह बन जाता है. अखबार या टेलिविजन चैनल चलाने की आड़ में खदानों वगैरह की लीज और कारखानों वगैरह के अनुबंध बांट जोहते हैं. मुख्य काम तिजारत करना होता है और ब्याज के रूप में मीडिया का उद्योग हो जाता है. ऐसे उद्योग दिनदूनी रात चौगनी गति से आगे बढ़ते हैं. कोई भी सरकारी विभाग उन पर हाथ नहीं डाल सकता क्योंकि काजल की कोठरी में सब कुछ काला ही काला होता है. सीबीआई, इनकम टैक्स, सेन्ट्रल एक्साइज़, प्रवर्तन निदेशालय और पुलिस वगैरह के दांत और विष यदि निकल जाएं तो उनकी नकली फुफकार से भला क्या बिगाड़ हो सकता है.

ऐसे आत्मघाती समय में विनोद मेहता का छोटा सा आत्मप्रवंचक लेख रोशनी की किरण की तरह है. वे मय सबूत कहते हैं कि भूपिंदर सिंह हुड्डा, संदीप दीक्षित, लालजी टंडन, सुधाकर रेड्डी, योगी आदित्यनाथ, कोदंडा रामाराव और अखिलेश दास जैसे राजनेताओं ने उनसे साफ कहा है कि बिना लेन देन के उनसे संबंधित खबरें तक मीडिया में प्रकाशित नहीं होती थीं. कोई खंडन करेगा?

विनोद मेहता ने केवल दूसरों के कहने पर आरोप नहीं लगाये. उनका आत्म संबोधित उद्बोधन एक विश्वसनीय हलफनामा है. इसलिए वह सम्मान के योग्य वस्तु है. आज के संकुल समय में जब सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीश, देश के प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री और समाज के लगभग सभी वर्गों के शीर्ष व्यक्ति भ्रष्टाचार के पुख्ता आरोपों से घिरे हों और फिर भी झूठ बोल रहे हों, तब एक शीर्ष पत्रकार का अपनी बिरादरी में खड़े होकर समाज के सामने अपनी ओढ़ी हुई नैतिकता को निर्वस्त्र करना एक संत-प्रकृति का कार्य है.

दूरर्दशन की बहसों में भी विनोद मेहता को इसी साफगोई और गंभीरता से सुना जाता है जबकि उनके साथ बहुत से नामधारी वाचाल पत्रकार सहकर्मी बैठे होते हैं. चंदन मित्रा को सुनकर कभी भी विश्वास करने को जी नहीं चाहता और विनोद मेहता पर अविश्वास करने का कारण प्रतीत नहीं होता. मीडिया प्रताड़ित व्यक्ति समाज की निगाहों से गिर जाता है. दूसरों के खिलाफ लिखना और खुद के लिए मौन रहना मीडिया की तलवार और ढाल है. आदि मीडिया पुरुषों का चरित्र एक खुली किताब की तरह रहा है. उन्हें शराब पीते, रंगरेलियां मनाते, घूस ग्रहण करते, पांच सितारा जीवन जीते कभी देखा सुना नहीं गया.

अब तो पैकेज डील होता है. कुछ मुख्यमंत्री देश में नंबर एक बता दिए जाते हैं. कुछ सच्चे व्यक्तियों की चरित्र हत्या या चरित्र दुर्घटना कर दी जाती है. अमेरिका और यूरोप जैसे शोषक देशों की संस्कृति को अप्रत्यक्ष बढ़ावा मिलता रहता है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया स्टंट फिल्मों की किस्म के समाचार दिखाता रहता है और समाचार पत्रों में एक साथ त्रासदी, हास्य-प्रहसन और धारावाहिक सड़ी गली खबरों का पाठ होता रहता है. देश के किसानों, पीड़ित महिलाओं, शोषित बच्चों, बहादुर सैनिकों, चरित्रवान वरिष्ठ नागरिकों, वास्तविक स्वयंसेवी संस्थाओं और प्रचार तथा निंदा से दूर रहकर काम करने वाले समाज सेवकों को समाचारों के योग्य नहीं समझा जाता.

समाचार पत्रों को पढ़ने और दूरर्दशन के चैनलों को देखने से चटखारे ले लेकर चाट खाने का मजा आता है जबकि उसे समाज का सुपाच्य और विटामिन युक्त भोजन होना चाहिए. सत्रहवीं शताब्दी के इंग्लैंड से लेकर बीसवीं सदी के मध्य वाले भारत में साहित्य और पत्रकारिता की धूमिल दूरियां खत्म हो गई थीं. अज्ञेय, निर्मल वर्मा, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, नरेश मेहता, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, विष्णु खरे, हरिवंश, मंगलेश डबराल जैसे बीसियों लेखकों की रोजी रोटी पत्रकारिता से भी आई है. उन्होंने नैतिकता के नमक का महत्व समझा है. विनोद मेहता भी ऐसे ही पांक्तेय हैं.

चेलापति राव, फ्रैंक मोरेस, खुशवंत सिंह, कुलदीप नैय्यर, एनज़े नानपोरिया, गिरिलाल जैन, बीज़ी वर्गीस, शामलाल वगैरह का जमाना यदि लद भी गया हो तो भी ये सब पत्रकारिता इसलिए समाज इसलिए समय के आसमान पर सितारों की तरह टंके रहेंगे. विनोद मेहता का झकझोरना इस गौरवमयी परिपाटी का अगला ताजा, समयानुकूल और समय-सापेक्ष ऐलान है. उम्मीद तो यही करनी चाहिए कि मीडिया परिवार उन बहरों की तरह आचरण नहीं करेगा जिनके कानों पर सुनने की मशीन लगी होती है और वे दूसरों को बहरा समझ कर जोर-जोर से बोलते हैं, लेकिन लोग उनके बहरेपन तथा वाचालता के तिलिस्म पर मुस्कराने लगते हैं.

12.12.2009, 00.05 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

anoop gupta (drishtant.india@gmail.com) lucknow

 
 आपकी राय बिल्कुल सही है, क्योंकि पत्रकार दलाल हैं. 
   
 

jitendra (jjitanshu@yahoo.com) kalkatta

 
 हम सबको अपने स्तर से इस मुहिम में शामिल हो जाना चाहिए. हमने पत्रिका सदीनामा का जनवरी अंक इसी मुद्दे को समर्पित किया है. 
   
 

Neeraj Pasvaan (neerajdada2007@gmail.com)

 
 It seems that here is strong censorship in favor of Brahmanism. protest and say hell with you! 
   
 

Neeraj Pasvaan New Delhi

 
 It's a funny article. It argues that if a journalist intends to be 'ethical'. he has to have a big financial support like Vinod Mehta, Harivansh, Dabral,Girilal Jain....
Mr. Tiwari would have spared Nirmal Verma and Agyey from the list..
 
   
 

Vibhash Kumar Jha (vibhashjha@gmail.com) Raipur Chhattisgarh

 
 कनक तिवारी जी नमस्कार,

आपकी टिप्पणी एकदम सही है. हम लोग अकसर इस स्थिति पर चर्चा करते रहते हैं. आज ही अपने एक सम्मानीय गुरुदेव से काफ्का के साहित्य पर चर्चा के दौरान यही मुद्दा उठा था कि मीडिया में जो भी सड़ा-गला छप रहा है और आम आदमी सीधे सीधे गायब किया जा रहा है - इस निराशाजनक हालात में, यदि किसी तरह गांव की घटनाएं या ग्रामीणों की उम्मीदों को ही छपने का अवसर मिल जाये तो यही किसी बड़े समाचार से कम नहीं है.

मुझे बेहद संतोष और खुशी भी है कि किसी ना किसी बहाने बीच-बीच में बस्तर, कोरबा, राजनाँदगांव,कवर्धा या बिलासपुर के गांव में जाने का मौका मिल जाता है और जब मैं वहां के गामीणों से मिलता हूं तो वे भी आज के अखबारों और टीवी चैनलों से नाराज़ दिखाई देते हैं. अधिकांश मीडियाकर्मी बेचारे रोज़ी रोटी के चक्कर में ही उलझे रहते है और मालिकों के मुँह में भी खून लग गया है ऐसे में पत्रकारिता तो तेल लेने ही जाएगी.

फिर भी गिने-चुने लोगों के बीच कहीं ना कहीं गांव की पत्रकारिता भी चलती रहेगी ऐसा मेरा विश्वास है. कम से कम मेरा कॉलेज के पत्रकारिता के विद्यार्थियों में से हर साल 4 या 5 छात्र तो निकल ही रहे हैं जो वाकई कुछ अच्छा और सार्थक करने चाहते हैं. उनके साथ मुझे भी जो लिखने का मौका मिलता है वह भी हम सब के लिए संतुष्टी पूर्ण कार्य है. तथा कथित मुख्यधारा में ना सही नाव जर्जर ही सही लहरों से टकराती तो है.
 
   
 

अभय लोकरे (abhaylokre@gmail.com) बालाघाट

 
 राम कुमार देवबंद की प्रतिक्रिया एवं आपके लेख में जो विरोधाभास है उसका समाधान कैसे होगा ? आज के इस समय स्थितियां कुछ इस तरह की हो गई हैं क्या सच है और क्या झठ है इसका फर्क करना मुश्किल हो गया है| विनोद मेहता के बारे में आप का लिखा, मन को प्रफुल्लित करता है तो इसके ठीक विपरीत अगर देओबंद सच है तो मन उतना ही निराश भी होता है | 
   
 

rohit pandey (aboutrohit@gmail.com) gorakhpur

 
 आपने विनोद मेहता के लेख के बहाने बिल्कुल प्रासंगिक बात कही है. पैसे लेकर खबरें बेच कर अखबारों ने आत्मघाती कदम ही उठाया है. अखबारों ने अपनी साख दांव पर लगा दी. मैं आपसे इस पर विस्तार से बातचीत करना चाहता हूं. कृपया अपना contact no. और mail बताएं.
रोहित - 09811586622
 
   
 

Ramkumar Deoband

 
 Amusing

wasnt he the man who carried a cover page about sahara chairman, speculating that the man had vanished gone missing, when in fact the real reason was the congress trying to screw mulayam in UP. And all the while the chairman was in medical treatment...

when the congress brought out the OBC reservation issue, this is the man who carried a issue which sang peans to affirmative action...all the while refusing to go into the divisive and kneejerk action of the congress...


isnt this the man who openly professes his contempt for the BJP due to the raid on the outlook and other Raheja offices during NDA regime...which is clearly reflected in his bias towards the congress and its agenda...

isnt this the man who did not report on Election commisionner vinod chawla's 'loo' leakages to congress on EC meetings...

isnt this the man who has not only ignored the scores of scandals and misdeeds of the UPA while continuing to attack the BJP?

this man, who sucks on a lollipop on which is written 'sonia ka joota', now talks about journalistic ethics
 
   
 

Akil Bangalore, India

 
 Corruption has percolated every aspect of Indian life and how can journalism be any different. But why is OUTLOOK lamenting about corruption rather than suggesting remedy??? Now a days, most banks give ATM-cum-DEBIT card to all it's customers. Why can't GOVT make it mandatory to make payment for all purchases for Rs5000/- and above using DEBIT/CREDIT card??? Presently it is absolutely easy for anyone to walk into a GOLD SHOP, Car dealership, SILK SAREE shop, FIVE STAR HOTELS, REAL ESTATE DEALER etc etc with a bag full of currency and buy goods worth LAKHS, even CRORES, the transaction which is difficult to be traced. But if the all the above are compulsorily made payable using DEBIT/CREDIT cards the source of transaction can be easily traced leading to unearthing of "corruption generated money". Essentially MAKE IT DIFFICULT TO USE THE CORRUPTION GENERATED "MOOLAH". Govt can easily amend the rules and make it mandatory the use DEBIT/CARD for high value transactions.

Immediate question- what about the poor who doesn't have a bank account???? The mode of payment suggested above is NOT for buying "DAL, CHAVAL, SUBZI". How much money can be expended by even the super rich/ super corrupt in buying VEGITABLES/Chicken/Dal for his household????? Most people who indulge in corruption and buy expensive GOODS/ SERVICES would have a bank account and DEBIT CARD. Then again the success rate may not be 100% but even 75-80% wouldn't be a bad deal.
 
   

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