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प्रौद्योगिकी के गुलाम

बात पते की

 

प्रौद्योगिकी के गुलाम

प्रीतीश नंदी


ऐसा भी समय था जब मैं 196 में 832 का गुणा कर सकता था, अपने मित्रों, परिवार के सदस्यों और चाहने वालों को टेलीफोन पुस्तिका देखे बगैर फोन कर सकता था, उन लोगों के जन्मदिवस मुझे याद रहते थे, जो मेरे लिए बहुत खास थे, जिन शब्दों को मैं जानता था, उनके हिज्जे बगैर किसी हिचक के साथ बोल सकता था.

मेरे पास न तो कभी कोई शब्दकोष था और न ही कोई फोन बुक. हां, मेरी मेज पर एक कैलकुलेटर जरूर रखा रहता था, लेकिन वह जोड़-घटाव या गुणा-भाग के लिए कतई नहीं था. उसका इस्तेमाल मैं गणितीय पहेलियों को हल करने के दौरान काफी कठिन गणनाओं और बड़ी संख्याओं के वर्गमूल निकालने के लिए किया करता था. गणितीय पहेलियां मेरे मनोरंजन का पसंदीदा साधन हुआ करती थीं.

आज मैं जोड़-घटाव, फोन नंबर व चेहरे याद रखने और अपने खास लोगों के जन्मदिवस की तारीखों के स्मरण के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल करता हूं. मेरा लैपटॉप हिज्जे ठीक करने, भाषा व व्याकरण सुधारने की कवायद में लगा रहता है और कई बार वह स्वयं गलती कर बैठता है. मैं अब भी शतरंज के खेल में कंप्यूटर को हरा सकता हूं, लेकिन लंबे अर्से पहले ही मैं यह खेल खेलना छोड़ चुका हूं. अब मुझे कुछ भी याद रखने की जरूरत नहीं है.

गूगल तत्काल मेरी मदद कर देता है. टैगोर की अविस्मरणीय कहानी ‘क्षुधित पाषाण’ जिसका निर्देशन तपन सिन्हा ने किया था और जिसके लिए अली अकबर खान ने संगीत दिया था, में बड़े गुलाम अली ने कौन-सा गीत गाया था? एडवर्ड सिजरहैंड्स का निर्देशन किसने किया? राजीव गांधी के हत्यारे कब जेल से बाहर आएंगे? भारत का पहला शिक्षा मंत्री कौन था? क्या जेलहाउस रॉक द किंग्स पहला बड़ा हिट एलबम था? स्वतंत्र भारत में वह कौन सा बड़ा घोटाला था, जिसने पूरे देश को हिला दिया था? जब माउंटबेटन ने एडविना को पहली बार जवाहरलाल की बाहों में देखा तो उन्होंने क्या कहा था? मेलचीजेडेक का नागरिक कैसे बना जा सकता है?

गूगल के पास लगभग हर चीज का जवाब मौजूद है. मिसाल के तौर पर, आपकी बिल्ली के अतिसार का उपचार भी उसके पास मिल जाएगा तो यह जानकारी भी कि लोर्का की किताब लिब्रो डी पोएम्स के 1921 के संस्करण की प्रति लंदन की किस पुरानी बुकशॉप में मिल सकती है. अगर इसमें गूगल फेल हो जाए तो फिर ट्विटर है. जो सवाल आपको परेशान कर रहा है, उसका जवाब देने के लिए कोई न कोई कहीं न कहीं अवश्य मिल जाएगा. जरूरी नहीं है कि हर बार जवाब सही हो. हममें से कोई भी जिंदगी में सही जवाब की तलाश में नहीं रहता है. हम उन जवाबों की तलाश करते हैं, जो हमें राहत देते हैं. यह कुछ-कुछ ईश्वर को पाने जैसा है. यदि उसका अस्तित्व नहीं है तो हम उसका सृजन कर लेंगे.

नहीं, यह अल्जाइमर कतई नहीं है और न ही तनाव है जो मेरी याददाश्त की कोशिकाओं को खत्म कर रहा है. यह टेक्नोलॉजी के लगातार स्वीकरण का असर है, जो मांग करती है कि उसका इस्तेमाल किया जाए. मैं भले ही कैलकुलेटर जितना तेज नहीं हो सकता, लेकिन शब्दकोष या थिसॉरस से तो निश्चित ही बेहतर हूं. मैं भले ही रुबिक्स क्यूब को दो मिनट में नहीं सुलझा सकता जैसा कि आमिर खान करते हैं, लेकिन किसी के भी साथ ‘मेनसा टेस्ट’ देने को तैयार हूं. समस्या योग्यता को लेकर नहीं है.

असल समस्या टेक्नोलॉजी पर लगातार बढ़ती निर्भरता की है, वह टेक्नोलॉजी जिसकी मुझे कोई जरूरत नहीं है. मैं इस बात से शर्मिदा हूं कि मुझे अपने पिता की पुण्यतिथि को याद रखने के लिए अपने मोबाइल फोन पर अलार्म लगाना पड़ता है या फिर अपनी शादी की सालगिरह से दो दिन पहले कोई वेबसाइट याद दिलाएगी कि पत्नी को फूल भेजने हैं. मैं इस बात से भयभीत हूं कि मैं टेक्नोलॉजी का शिकार हो रहा हूं.

यह तो तय है कि मैं ऐसा अकेला नहीं हूं. मुझे साल में कम से कम चार बार अपने मित्रों और परिचितों से गुलदस्ते मिलते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि अलग-अलग वेबसाइटों ने मेरे जन्मदिवस की तारीख अलग-अलग दे रखी है और मेरे मित्र गूगल की याददाश्त पर ही भरोसा करते हैं. मुझे सालगिरह का केक गलत दिन ही मिलता है. मेरे कई जाने-माने मित्र एक साल में कई-कई बार जन्मदिवस और शादी की सालगिरह मनाते हैं, क्योंकि उन्हें पार्टियों में मजा आता है. लेकिन मैं ऐसा नहीं करता. इससे भी बदतर, मैं भ्रमित हो जाता हूं और अब तो इस स्थिति में पहुंच गया हूं कि मुझे तब तक अपना खुद का जन्मदिवस याद नहीं रहता है, जब तब कि मारिया एक शाम पहले एसएमएस से मुझे उसका स्मरण न करवा दें.

क्या हमें अपने जीवन में टेक्नोलॉजी की इतनी ही जरूरत है? क्या हमें वाकई ऐसे टेप की जरूरत है जो स्वयं ही चालू या बंद हो जाए या फिर ऐसी लाइट्स की, जो कमरे में कदम रखते ही खुद ब खुद चालू हो जाएं? क्या ये चीजें हम स्वयं करना नहीं चाहते? क्या हमें 11 अंकों के फोन नंबरों की जरूरत है जिन्हें बगैर किसी सहायता के कोई भी याद नहीं रख सकता?

क्या हमें सभी लोगों के जन्मदिवस मनाना इतना ही जरूरी है? हम क्यों सैकड़ों लोगों को जन्मदिन पर गुलदस्ते भेजें? क्यों न चुनिंदा २क् ऐसे लोगों के जन्मदिवस तक सीमित रहें, जो वास्तव में हमारे लिए मायने रखते हों? क्यों हमें वेलेंटाइन दिवस पर ग्रीटिंग कार्ड भेजना चाहिए, जबकि एक चुंबन ही वह काम कर सकता हो? आखिर मुझे जिम में दौड़ते समय अपने आईपोड में 8 जीबी संगीत की क्या जरूरत है? मेरी कल्पना दो ट्रेडमिल की दूरी पर खड़ी एक आकर्षक सुंदरी का पीछा क्यों नहीं कर सकती?

एक वास्तविक दुनिया या वास्तविक लोगों और वास्तविक भावनाओं के साथ बंधने के बजाय क्यों टेक्नोलॉजी द्वारा हमें अलग-थलग कर दिया जाना चाहिए? आखिर इंटरनेट सेक्स वास्तविक सेक्स का विकल्प कैसे हो सकता है, भले ही इंटरनेट पर पोर्न सबसे बड़ा व्यवसाय हो? कैसे ‘तामागोची’ (या कोई भी ई-पैट) एक वास्तविक पालतू पशु का स्थान ले सकता है? आखिर उस व्यक्ति के साथ मोबाइल पर की गई बातचीत (असंख्य कॉल ड्रॉप के साथ) आमने-सामने की गई बातचीत का विकल्प कैसे हो सकती है, जिसे आप बेहद प्यार करते हैं? हालांकि 70 करोड़ मोबाइल यूजर्स अपने सेल फोन पर प्यार-मोहब्बत की बातों में लगे रहते हैं.

अब जबकि यह साल खत्म होने जा रहा है, मैं स्वयं से एक वादा कर रहा हूं. मैं टेक्नोलॉजी को अपना गुलाम बनाऊंगा, न कि अपने जीवन को टेक्नोलॉजी का गुलाम बनने दूंगा.

24.12.2009, 11.49 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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ramesh kumar (rk140676@gmail.com) azamgarh

 
 प्रीतीश नंदी जी, आपने दिल को छू लेने वाले विषय को उठाया है. सचमुच इस बाज़ार संस्कृति ने आदमी और उसके रिश्तों के बीच एक दीवार खड़ी कर दी है. एक शेर याद आ रहा है - "अब इत्र भी मलो तो मोहब्बत की बू नहीं; वो दिन हवा हुए कि पसीना गुलाब था." 
   

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