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निशाने पर आदिवासी

मुद्दा

 

निशाने पर आदिवासी

संदीप पांडेय


अधिकांश भारतीयों की नजर में पाकिस्तान एक नाकारा राष्ट्र है. पाकिस्तान ने कबायली इलाकों में अपने लोगों के खिलाफ ही जंग छेड़ रखी है. और अब भारत भी अपने आदिवासी इलाकों में यही करने जा रहा है. हालांकि भारतीय और पाकिस्तानी आदिवासी इलाकों में फर्क है और दोनों देशों की समस्याओं की प्रकृति भी भिन्न हैं लेकिन दोनों सरकारें एक दूसरे के बजाए अपने खुद के लोगो के खिलाफ सेना के इस्तेमाल को लेकर उतावली हुई जा रही हैं, जबकि कुछ समय पूर्व तक वे एक दूसरे को ललकार रही थीं. पाकिस्तान जहां आतंकवाद के खिलाफ जंग लड़ रहा है, वहीं भारत नक्सलवाद के.

भारतीय आदिवासी क्षेत्रों के अधिकांश मुख्य हिस्से आज नक्सलवाद से प्रभावित हैं जो कि पूरी तरह से भ्रष्ट सरकारी मशीनरी के शोषण के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है. इन क्षेत्रों में सरकारी मशीनरी पर मानवाधिकार हनन के गंभीर आरोप हैं. छ्त्तीसगढ़ की दक्षिणपंथी भाजपा सरकार ने नक्सलवादियों को समर्थन देने के आरोपी आदिवासियों के खिलाफ सशस्त्र आदिवासी मिलिशिया खड़ा करने की रणनीति अपनाई है, जिसे सुप्रीम कोर्ट के साथ ही भारत के योजना आयोग ने भी खारिज कर दिया है. यह आदिवासियों के खिलाफ आदिवासियों को खड़ा करने की आत्मघाती रणनीति है.

इस हिंसा और उत्पात के बीच दंतेवाड़ा में गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार और उनका संगठन वनवासी चेतना आश्रम काम कर रहा है. अभी कुछ समय पहले तक जब वे विभिन्न तरह की सरकारी विकास और कल्याणकारी योजनाओं को लागू कर रहे थे, वे सरकार के प्रिय बने हुए थे. लेकिन सशस्त्र आदिवासी मिलिशिया सलवा जुड़ूम का प्रयोग शुरू होने और आदिवासियों का उत्पीड़न शुरू होने के बाद हिमांशु जब मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों को बेनकाब करने लगे तो वे सरकार को खटकने लगे.

हिमांशु ने सलवा जुड़ूम द्वारा आदिवासियों को जबरिया उनके गांवों से बेदखल करने और ऐसा न करने पर उनकी झोपड़ियां जलाने, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों सहित आदिवासियो को पीटने और महिलाओं के उत्पीड़न और बलात्कार से संबंधित मामले उठाए हैं. ऐसे कुछ मामलों में तो सुरक्षा बलों और एसपीओ सीधे संलिप्त रहे हैं. ऐसे मामले उठाकर हिमांशु कुमार ने सरकार की नाराजगी मोल ली है.

17 मई, 2009 को 7 एकड़ परिसर में फैले वनवासी चेतना आश्रम को ध्वस्त कर दिया गया. हिमांशु के दो महत्वपूर्ण आदिवासी सहयोगी सुखनाथ और कोपा कुंजाम फर्जी मामलों में जेल में हैं. यही नहीं, 10 दिसंबर, 2009 को कोपा कुंजाम के साथ पुलिस थाने पहुंचे आदिवासी वकील एल्बन टोप्पो की भी पिटाई कर दी गई थी.

इस क्षेत्र में हिमांशु इस तरह की अंतिम आवाज हैं. वे यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि सलवा जुड़ूम की वजह से अपने गांवों से विस्थापित होकर पड़ोस में स्थित आंध्र प्रदेश में शरण लेने वाले आदिवासियों को किस तरह से वापस बसाया जा सकता है.

दरअसल कोपा कुंजाम ने 8 जनवरी 2009 को सिंगाराम में 15 निर्दोष आदिवासियों की पुलिस और एसपीओ द्वारा की गई हत्याओं और 18 जून,2009 को माटवाड़ा पुलिस थाने के सामने 3 आदिवासियों की मौत के मामलों को बेनकाब किया था. हिमांशु के दूसरे साथियों पर उनका साथ छोड़ने के लिए भी दबाव बनाया जा रहा है. खुद उन पर उनके किराए का मकान छोड़ने के लिए दबाव डाला जा रहा है.

इसी साल 14 दिसंबर को उनकी पहले से प्रस्तावित पदयात्रा पर कलेक्टर ने इस आशंका में प्रतिबंधित कर दिया कि इसकी आड़ में नक्सली घुसपैठ कर सकते हैं. देश भर से आई 35 महिला कार्यकर्ता उन तक पहुंचने की कोशिश कर रहे थे लेकिन उन्हें पूरे रास्ते प्रताड़ित किया गया और उन्हें लौटने को मजबूर होना पड़ा. यही नहीं बलात्कार की चार पीड़ितों को 16 दिसंबर को आरोपी एसपीओ ने उनके गांवों में पीटा और उन्हें एक कागज पर अंगूठे के निशान लगाने को मजबूर किया जिसमें लिखा था कि उन्होंने हिमांशु के दबाव में मामले दर्ज किए थे.

14 दिसंबर,2009 को सलवा जुड़ूम के संस्थापक नेता महेंद्र कर्मा के पुत्र और दंतेवाड़ा जिला पंचायत अध्यक्ष छबींद्र कर्मा के नेतृत्व में भीड़ हिमांशु के अस्थायी आश्रम में पहुंची और उन पर बस्तर छोड़कर जाने का दबाव बनाया. सलवा जुड़ूम और इन्हीं लोगों द्वारा बनाया गया मां दंतेश्वरी स्वाभिमान मंच आदिवासी हितों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करता है और ये लोग हिमांशु पर बाहरी होने का ठप्पा लगाते हैं. हालांकि महेंद्र कर्मा ने संविधान की पांचवी अनुसूची को लागू किए जाने की खिलाफत की थी. इससे ही साबित होता है कि सलवा जुड़ूम आदिवासी हितों की वास्तव में रक्षा नहीं कर रहा है बल्कि यह राज्य को अपने निहित राजनीतिक हितों को पूरा करने में ही मदद कर रहा है.

हिमांशु ने भारत के गृहमंत्री को इस बात के लिए राजी किया है कि वे 7 जनवरी, 2010 को इलाके में आकर जन सुनवाई में राज्य के उत्पीड़न का शिकार लोगों की आपबीती सुनें. मगर छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ने गृहमंत्री को पत्र लिखकर उन्हें छत्तीसगढ़ न आने की सलाह दी है.

ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ सरकार सुरक्षा बलों द्वारा किए गए उत्पीड़न से जुड़े सच को सामने नहीं लाना चाहती. वह नहीं चाहती कि कोई भी बाहरी, विशेष रूप से मानवाधिकार कार्यकर्ता ऐसे मामलों की जांच करें. वास्तव में सलवा जुड़ूम का इस्तेमाल फासीवादी ताकतें अपने विरोधियों की आवाजों को खामोश करने के लिए कर रही हैं.

इस क्षेत्र में हिमांशु इस तरह की अंतिम आवाज हैं. वे यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि सलवा जुड़ूम की वजह से अपने गांवों से विस्थापित होकर पड़ोस में स्थित आंध्र प्रदेश में शरण लेने वाले आदिवासियों को किस तरह से वापस बसाया जा सकता है. इस समस्या का हल इस बात में निहित है कि आदिवासियों को राज्य के सुरक्षा बलों और नक्सलवादियों से समान दूरी पर रखा जाए. ऐसे समय जब ताकतवर बल हिंसा का सहारा ले रहे हैं उन्होंने शांति का रास्ता दिखाया है. लेकिन सरकार इलाके पर दोबारा कब्जे को लेकर बेताब है, वह भी बिना सोचे कि इन इलाकों में रहने वाले लोगों पर इसका क्या असर होगा. वास्तव में उनकी दिलचस्पी क्षेत्र के लोगों में नहीं बल्कि यहां के प्राकृतिक संसाधनों में है क्योंकि वहां समृद्ध खदानें हैं और व्यावसायिक निहित हितों की इन पर नजर है.

छत्तीसगढ़ सरकार चाहती है कि हिमांशु बस्तर से चले जाएं. इसके लिए उनके खिलाफ प्रतिहिंसा का सहारा लिया जा रहा है. आपरेशन ग्रीन हंट के रूप में चलाए जा रहे आपरेशन के निशाने पर यूं तो नक्सली हैं लेकिन ऐसा लगता है कि इसका इस्तेमाल आदिवासियों को गांवों से बेदखल करने के लिए किया जा रहा है. हिमांशु तकरीबन अकेले ही इसका विरोध कर रहे हैं और उन्हें बस्तर के भीतर और बाहर दोनों ओर से बहुत कम समर्थन मिल रहा है. वाकई में वे बड़ा संघर्ष कर रहे हैं लेकिन क्या वे राज्य के प्रकोप को सह पाएंगे, यह देखना बाकी है.

28.12.2009, 13.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

संपादक, रविवार

 
 

अब इस आलेख पर आने वाली प्रतिक्रिया को आप 'सभी प्रतिक्रियाएं पढ़ें' पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं-संपादक, www.raviwar.com

 
   
 

Rajni Singh (iilloovveeuu1975@gmail.com) Noida

 
 लगता है, महेश जी को किसी भी तरह के संवाद पर विश्वास नहीं है, वे चाहते हैं कि जैसा वो चाहें, वैसा सब कुछ छपता रहे. आपके ही तर्ज पर पूछ लिया जाये कि आपको कैसे पता चला कि रविवार में भेजी जाने वाली प्रतिक्रिया नहीं छपती ? मेरी तो सभी प्रतिक्रिया हमेशा छपती है ? और दूसरा ये कि मुद्दे पर बात करने के बजाय आप मुद्दे को बहकाने की कोशिश कर रहे हैं. आप संदीप पांडेय के लिखे पर बहस करते तो अच्छा होता. लेकिन लगता है कि आप हिटलर की तरह मुद्दों को बदलने की नियत पाल कर प्रतिक्रिया लिख रहे हैं. राजीव जी (जितना मैं उन्हें सृजनशिल्पी के माध्यम से जानती हूं) को आप जैसे प्रवक्ताओं की जरुरत नहीं है. वे सक्षम लेखक हैं और अपने लिखे की प्रतिक्रिया पर आपसे बेहतर लिख सकते हैं. उन्हें किसी भी भाड़े के लिक्खाड़ों की जरुरत नहीं है. 
   
 

पंकज झा. (jay7feb@gmail.com)

 
 जिन अभागों को भारत और पकिस्तान में फर्क नहीं दिखाई देता क्यू उनके पीछे अपना वक़्त बर्बाद कर रहे हैं राजीव जी. चिल्लाने दीजिये जितना चिल्लाना है इन लोगों को. नक्सलियों का सफाया अब अवश्यम्भावी है और हो कर रहेगा. 
   
 

डॉ महेश सिन्हा (sinhamahesh@gmail.com) रायपुर

 
 @रजनी जी
आपने ये कैसे मान लिया कि सबकी प्रतिक्रिया यहाँ लगाई जाती है
@ नेताम जी
अनिल पुसदकर जी के उसके बाद के लिखे पोस्ट पर भी आप नजर डाल लें-
...बिके हुये लोग मीडिया को बिकाऊ कह रहे हैं,हद हो गई बेशर्मी की और बर्दाश्त की भी!अब किसी ने कुछ कहा तो मुंह-तोड़ जवाब दिया जायेगा...

...खून की नदियां बहाना डेमोक्रेटिक और उनके समर्थकों का विरोध करने वाले अनडेमोक्रेटिक,वाट ए क्लासीफ़िकेशन सर जी!...
 
   
 

Rajni Singh (iilloovveeuu1975@gmail.com) Garima Enterprises, Shop No. G-4, S-3, Gamma Shopping Mall, Near Canara Bank, Jagat Farm, Greater Noida-201306

 
 लगता है, रविवार के कुछ पाठक व्यक्तिगत कुंठा निकालने लगे हैं. राजीव जी की राय पर जिस तरह की प्रतिक्रिया आयी, वह इसका परिचायक है. इसके बाद अब इसके संपादक के खिलाफ ही हल्ला बोल दिया गया है. रविवार जैसी साफ-सुथरी साइट को भुवनेश्वर राय जी जैसे लोगों की प्रतिक्रिया नहीं लगानी चाहिए, इससे कई बार लगता है कि इस तरह की प्रतिक्रिया छाप कर आप ऐसे छद्म पाठकों को महत्व दे रहे हैं. 
   
 

Rajesh Singh Sisodia (nangepaon@gmail.com) Ambikapur (Chhattisgarh)

 
 Sandeepji is befooling everyone through this article, he has seen from his own eyes that Himanshu has no support of tribals of Dantewada.Tribals are his opponents,even though he is bent upon misleading the Nation. 
   
 

भुवनेश्वर राय (bastercg@gmail.com) बस्तर

 
 रविवार के जो संपादक हैं या संचालन कर्ता है यानी कि श्री पुतुल वे ऐसी ही वितंडावाद की सामग्री परोसते रहते हैं, इनका काम केवल विवाद खड़ा करके अपनी लोकप्रियता बनाये रखना है आप लोग नाहक यहाँ अपना सिर खपा रहे हैं ? यह संपादक का काम भी होता है कि वे एक ही तरह की यानी विवादास्पद मुद्दों से हटकर कभी अच्छा विषय भी परोसे...  
   
 

विनोद कुमार नेताम दंतेवाड़ा

 
 आपकी राय का सम्मान करता हूं. हां 'विस्फोट' की भ्रामक खबर में एक संशोधन जरुर कर लें कि एसपी अमरेश मिश्रा से मेधा पाटकर ने ये कहा था कि जंगल में मोर नाचा किसने देखा, इसलिए हिमांशु कहीं और चले गये.
उन्हें अपने साथ दिल्ली ले जाने की बात मेधा पाटकर ने नहीं कही थी, यह बात झूठी है. अमरेश मिश्रा ने एक चैनल को इंटरव्यू में भी यह कहा था. अब विस्फोट को किसने ये कहा, ये तो वही जानें.
 
   
 

राजीव रंजन प्रसाद (rajeevnhpc102@gmail.com) बचेली, बस्तर

 
 विनोद कुमार नेताम जी बहुत अच्छा लगा कि आप बस्तर की आवाज बन कर बोले तो और आपकी बात को मैं उन आवाजों से अधिक तरजीह देना चाहूंगा जो बस्तर में बाहरी दूकाने हैं। आपके तर्क का उत्तर देने से पूर्व मैं कहना चाहूंगा कि मेरी टिप्पणी को आप तल्ख कह सकते हैं लेकिन "गाली" नहीं संज्ञापित कर सकते। जहां तक मेरा प्रश्न है मैं न केवल बचेली में पला बढा बल्कि 1972 से ले कर 2001 तक प्रत्यक्ष रूप से तथा अब अप्रत्यक्ष (चूंकि मेरा घर अभी भी वहीं है) और नौकरी के सिलसिले में बाहर रहता हूँ। लेकिन न तो मेरा घर आना छूटा है न बस्तर की मिट्टी के प्रति मेरा मोह। आप मुझसे अपनी मिट्टी से प्यार करने से नहीं रोक सकते और अपना दर्द तो मैं बेबाकी से कहता रहूंगा।

अब बात करते हैं आपकी आपत्ति की। आपने जो उद्धरण प्रस्तुत किया है वह घटना रायपुर प्रेस क्लंब की है जबकि जो बात मैं कह रहा हूँ वह घटना दंतेवाडा में ही घटी है हाँ यदि आप चश्मदीद की तरह उक्त घटना का खंडन करें तो मैं अपनी राय मानवाधिकार वादियों की हरकतों के बारे में न बदल कर भी उक्त पंक्तियों को अपनी टिप्पणी में शामिल करने के लिये खेद व्यक्त कर सकता हूँ...किंतु कौन नहीं जानता कि सत्य क्या है?

चलिये एक आलेख पर आप भी गौर फरमायें-
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रायपुर। दंतेवाड़ा स्थित वनवासी चेतना आश्रम के संचालक हिमांशु कुमार के समर्थन में वहां पहुंचे सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर व संदीप पांडेय के साथ बुधवार को स्थानीय ग्रामीणों ने बहस की और बदसलूकी करते हुए उन्हें वापस जाने कहा। उन पर अंडे, टमाटर भी फेंके गए। पुलिस ने इसे मंगलवार को हुई घटना की प्रतिक्रिया करार दिया है। इधर आश्रम संचालक हिमांशु कुमार गायब हैं और पुलिस उन्हें फरार बता रही है।

गौरतलब है कि आपरेशन ग्रीन हंट रोके जाने की मांग करते हुए हिमांशु हड़ताल पर बैठे हुए थे। पुलिस ने उन्हें कड़ी सुरक्षा भी मुहैया करवाई थी। उन्होंने 7 जनवरी को एक जनसुनवाई भी आयोजित की थी।

इस बीच मंगलवार को वे कड़ी सुरक्षा के बावजूद अचानक अपने आश्रम से गायब हो गए, इससे पहले उन्होंने इंटरनेट के माध्यम से जनसुनवाई स्थगित करने की सूचना जारी कर दी थी। मंगलवार को ही आश्रम में दिल्ली व अन्य कुछ स्थानों से आए मीडियाकर्मी व समाचार संकलन के लिए पहुंचे स्थानीय पत्रकारों के बीच बहस व झूमाझटकी हुई थी। मामला पुलिस तक पहुंच गया था और स्थानीय पत्रकारों ने पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई। इधर इस मामले में आज तब मोड़ आयाजब सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर व संदीप पांडेय पहुंचे। । उनके दंतेवाड़ा आगमन की खबर मिलने पर स्थानीय पत्रकार व ग्रामीणों ने उनका विरोध करते हुए उनसे वापस दिल्ली जाने कहा।
विरोध के दौरान ग्रामीण उन्हे नक्सली समर्थक भी बता रहे थे। विरोध इतना यादा था कि मेधा पाटकर व संदीप पांडेय ने उनसे शांत रहने के लिए कहा। इस बात पर ग्रामीण व पत्रकार नाराज हो गए और विरोध का स्वर बहस में बदल गया। इसी बहस के दौरान मेधा पाटकर व संदीप पांडेय के साथ बदसलूकी की खबर सामने आई है। दंतेवाड़ा एसपी अमरेश कुमार से इस संबंध में बताया कि स्थानीय पत्रकार व ग्रामीण मंगलवार को दिल्ली से आए मीडियाकर्मियों द्वारा की गई मारपीट से नाराज थे। सभी आज इसी विषय को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। इस बीच मेधा पाटकर, संदीप पांडेय के साथ सामान्य बहस हुई है जिसमें किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। उन्होंने आगे बताया कि अभी सब कुछ ठीक है और मेधा पाटकर व संदीप पांडेय वनवासी चेतना आश्रम में सुरक्षित हैं।

उधर एसपी अमरेश मिश्रा ने बताया कि हिमांशु कुमार फरार हैं। इस संदर्भ में मेधा पाटकर से अमरेश मिश्रा ने जब बातचीत की तो मेधा पाटकर ने कहा कि जंगल में मोर नाचा, किसने देखा, हम उन्हे दिल्ली ले जाएंगे।

(साभार - विस्फोट डाट काम)
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कुछ अखबारों की कतरने भी हैं कहियेगा तो आपको भेजूंगा। चलिये नेताम साहब जंगल में मोर नाचा किसने देखा। सच के चाहे जितने चेहरे बना दिये जायें लेकिन एक सच जिससे आप क्या कोई भी मुह नही मोड सकता वह यह कि बस्तर को बैसाखियों की नहीं सडक की आवश्यकता है। उसे अपने भीतर की आवाजों की ही आवश्यकता है। बाहरी भोंपू केवल सजी धजी दूकाने हैं।
 
   
 

विनोद कुमार नेताम दंतेवाड़ा

 
 राजीव जी, आप बहुत अच्छा लिखते हैं. लेकिन अपने लिखे में झूठे तथ्यों का घालमेल न करें. मैं दंतेवाड़ा का रहने वाला हूं और मेधा पाटकर वगैरह के साथ दंतेवाड़ा में किस तरह से प्रायोजित नौटंकी हुई थी, उसे आप दिल्ली में एसी कमरे में बैठ कर नहीं जान सकते. वरिष्ठ ब्लागर और रायपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष अनिल पुसदकर को ही पढ़ लेते तो आप ऐसा नहीं लिखते. अनिल पुसदकर ने अपने ब्लॉग में इसे पुलिस प्रायोजित बताया है. उनके लिखे पर जरा गौर फरमायें-
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मेधा पाटकर समेत आधा दर्ज़न मानवाधिकारवादी छत्तीसगढ के नक्सल प्रभावित बस्तर इलाके के दौर पर आये हुये थे।उनपर बस्तर के दन्तेवाड़ा मे अंडे फ़ेंके गये और धक्का-मुक्की भी की गई।वंहा पर मामला स्थानीय वर्सेस बाहरी पत्रकार बनाने मे पुलिस सफ़ल रही।और ऐसा ही कुछ प्रायोजित कार्यक्रम रायपुर मे भी होना था पर प्रायोजकों ने जगह गलत चुन ली।उन्होने प्रेस क्लब के सामने तमाशा खड़ा करना चाहा जिसका मुझे पहले ही अंदेशा था और इसलिये मैं घण्टे भर से ज्यादा समय वंही टिक कर बैठा रहा।पुलिस इस दौरान तमाशाई बनी खड़ी देखती रही और पुलिस का काम मुझे और मेरे साथियों को करना पड़ा।हम लोगों ने प्रदर्शनकारियों को जैसे तैसे हटाया और मानवाधिकारवादियों को उनके घेरे से निकाल कर रवाना किया।

मेधा पाटकर,संदीप पाण्डेय और अन्य लोगों की ओर से कल से ही प्रेस कान्फ़्रेंस की अनुमती मांगी गई थी जिसे न देने का आग्रह,अनुरोध से लेकर दबाव मुझपर पहले से बनाने की कोशिश हो रही थी।इससे पहले बस्तर मे मेधा के साथ दिल्ली से आई पत्रकार का दन्तेवाड़ा के पत्रकारों से विवाद हो चुका था और मामला पुलिस थाने तक़ पहुंच गया था।मानवाधिकारवादियों से परेशान पुलिस ने इस मामले को हवा दी और मानवाधिकारवादियों पर अंडे फ़िंकवाये और उन पर हमला करवा दिया।इस मामले को और तूल देने की कोशिश की गई।

इसी के तहत यंहा भी उनको बिना प्रेस कान्फ़्रेंस लिये विरोध करवा कर रवाना करने की योजना बनाई गई थी,जो मेरे प्रेस कान्फ़्रेंस की अनुमति देने से फ़ेल हो गई।इसके बाद प्रेस कान्फ़्रेंस लेने पहुंची मेधा पाटकर का विरोध करने के लिये प्रायोजित कार्यक्रम के तहत यंहा आश्रम मे रखे गये नक्सल वारदात मे मारे गये लोगों के बच्चों को सामने रखकर मेधा और उनके साथियों पर हमले की तैयारी थी जिसकी मुझे भनक लग गई थी।........उनके रवाना होने के बाद ही सबने चैन की सांस ली और क्लब आये मेहमान को एक प्रायोजित हमले का शिकार होने से बचा लिया।
(अमीर धरती, गरीब लोग से)
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केवल बस्तर में पढ़-लिख लेने भर से आपको ये हक नहीं हो जाता कि आप दूसरों को गाली बकें. आप भी दिल्ली वाले हैं, वहीं रहते हैं. ऐसे में आप पर भी बस्तर के लिए झुठा विलाप करने का आरोप अगर लगाया जाये तो कैसा होगा ? अपनी कलम को आप झूठ से बचायें.
 
   
 

राजीव रंजन प्रसाद (rajeevnhpc102@gmail.com) बचेली, बस्तर

 
 इस आलेख पर मैं टिप्पणी नहीं करना चाहता था लेकिन संजीत त्रिपाठी जी की टिप्पणी नें बाध्य कर दिया। आज की पत्रकारिता का यही सच होता जा रहा है कि बिना शोध किये और बिना वस्तुस्थिति जाने लोग कलमची हो जाते हैं।

कलम बेहद जिम्मेदारी है और इस लिये ऐसे लोग जो केवल अपनी विचारधारा परोसने के लिये अनाप-शनाप लिखते हैं, समाज के लिये घातक हैं। बस्तर में जिनके बोरिया-बिस्तर आज तक नहीं पहुँचे, उनमे से अधिकतर वहां की खबरों के पैरोकार बने हुए हैं और देश में झूठा जनमत तैयार करने में लगे हुए हैं। ऐसे लोगों को हीरो बनाना कुछ कलमों का स्वनियोजित कार्य हो गया है जो कि वास्तव में उस जमीन के इये स्वयं ही समस्या हैं। अगर ऐसा न होता तो आदिम समाज स्वयं नक्सलियों के खिलाफ कई मोर्चों पर खड़ा नही होता और यहाँ तक कि उनके समर्थकों के खिलाफ भी।

वैसे भी इस आलेख की परते बस्तर के आदिवासियों ने ही उस समय उडा दी थी, जब मेधा पाटकर और उनकी टीम को वहाँ से बाहर का रास्ता उन्होंने दिखाया। जले पर मरहम लगाया जाता है लेकिन बहुत से पत्रकार उसे नासूर ही बना देना चाहते हैं।

नक्सलवाद से प्रभावित बस्तर को न केवल आतंकवादियों से मुक्ति चाहिये बल्कि इस आतंकवाद के लिये जमीन बनाते लेखकों से भी मुक्ति चाहिये। और एक बात कि इस देश में मानवाधिकार "कितने नक्सली पकडे गये" या "कितने नक्सली मारे गये" से तय किया जा रहा है और हमे शर्म भी नहीं आती कि जिन आदिमों का मानवाधिकार नक्सलियों नें हराम कर रखा है उसके लिये बोलने के नाम पर नौटंकीबाजो को हवा दी जाती है।

बोधघाट परियोजना, मावली भाटा का स्टील प्लांट और भी अनेकों परियोजनायें व विकास के कार्यक्रम "मानवाधिकार वादियों" की कृपा से बंद हुए, जिन्हें बस्तर को मानव संग्रहालय बना देखना अच्छा लगता है फिर वही चिल्लाते हैं- आदिवासियों को आज़ादी के इतने साल बाद रोटी, कपड़ा, मकान नहीं दे पाये। सडक उडा दी जाती हैं, बिजली उखाड दी जाती है, स्कूल बंद हैं, बस्तर में नौकरी करना कालापानी के बराबर बना दिया गया है, पुलिस का मनोबल तोडने की निरंतर कोशिश की जा रही है, उसके बाद - "व्यवस्था के नाम पर उन्हें उजाड़ने पर उतारु" जैसे जुमले जडे जाते हैं। जो बस्तर की वास्तविक आवाज हैं, उनके मुख पर कपडा ठूंस कर दिल्ली से जो भोंपू बज रहे हैं, उन्होंने ही बस्तर को नर्क बना रखा है।
 
   
 

Sanjeet Tripathi (ved.sanju@gmail.com) Raipur

 
 माफ कीजिएगा, आप वही संदीप पांडेय हैं ना जिन्होंने कुछ दिन पहले प्रेस क्लब रायपुर में हिमांशु कुमार जी व पीयूसीएल के राजेंद्र सायल जी के साथ प्रेसवार्ता लेते हुए यह कहा था कि " चूंकि मैं तो अभी तक "वहां" गया नहीं हूं लेकिन जैसा कि हिमांशु जी बताते हैं…………" इस प्रेसवार्ता के फौरन बाद, कक्ष से बाहर आलोक पुतुल जी मिले थे तो उनसे चर्चा के दौरान मैने आपके इसी वक्तव्य का उल्लेख करते हुए उनसे बात की थी।
खैर…समय के साथ वक्तव्य बदलते रहते हैं, चाहे वो राजनेता हों या फिर सामाजिक(?) कार्यकर्ता।
इसी प्रेसवार्ता में अंत में मैने आपसे यह भी कहा था कि यह एक अफसोस की बात है कि संदीप पाण्डेय जी अपने जिस मूल कार्य के लिए जाने जाते हैं उसके इतर किसी और मुद्दे पर छत्तीसगढ़ आएं है, अगर वे अपने उसी मुद्दे पर यहां आकर काम करते तो हमें और भी ज्यादा खुशी होती।
शुभकामनाएं...धारणाएं व अवधारणाएं...

 
   
 

om prakash shukla (ops309@gmail.com) lucknow

 
 अगर सोनिया गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनने में कोई रोक नहीं है तो हिमांशु के बस्तर में रहने बोलने पर कैसे आवाज़ उठाई जा सकती है. इस देश में मानवाधिकार क्या पैसे से तय होगा, आखिर कितने प्रेस या चैनल ने आदिवासियों के खिलाफ गैरकानूनी हिंसा को दिखाया है ? आज ऑपरेशन ग्रीन हंट के नाम पर क्या हो रहा है, क्या कोई जान पा रहा है ? बस यही सूनने में आता है कि सफलता मिल रही है. इस सफलता की कीमत कौन चुका रहा है, यह भी हमें मालूम है.
हमें शर्म आनी चाहिए कि जिन आदिवासियों को आज़ादी के इतने साल बाद रोटी, कपड़ा, मकान नहीं दे पाये, स्वास्थ्य सुविघा क्या होता है, इसका अहसास नहीं करा पाये, उनकी जगह छिनने के लिए तमाम बहाने गढ़ रहे हैं. कभी विकास का पाखंड और कभी कानून व्यवस्था के नाम पर उन्हें उजाड़ने पर उतारु हैं. मतलब सिर्फ खदानों से है. ये लोग बुश की तरह वही कर रहे हैं, जो उसने इराक के साथ किया, आरोप लगा कर तेल पर कब्जा करने का काम.
 
   
 

neha indore

 
 When common people don't understand the problem of common people then it became impossible to spread awareness about any thing or any problem. I don't understand why these tribes are always treated like other poor world people.

Why these tribes are always kept devoid of facilities while other common people keep enjoying these facilities simultaneously? Why these people always tolerate such a partial behavior of our great system which always suppress Himanshu like person who really wants to improve condition of these people?

I think there will be no wonder if these people will become rebellious for their rights and their peaceful life and no wonder in future these people will called as naxalite by our system.
 
   
 

SANJAY VERMA (sv sanjayverma518gmail.com) RAIPUR

 
 My Dear Ms. Sen,

I read your letter that leads my view, you described about Rina Kangale and so..so. Just they were appointed by the Govt.and Mr. Himanshu does not occupy the relevant authority. He stands behind the Gandhism, as I heard. Only Gandhism can not provide any kind of facility to fulfill the human requirements. Can you tell me the original sources of income of Mr. Himanshu.
 
   
 

Sunanda Sen Bijapur, Chhattisgarh, India

 
 बहुत ही मूर्खतापूर्ण तरीके से जब ये कहा जाता है कि हिमांशु बस्तर के नहीं हैं, आदिवासी नहीं हैं, इसलिए उन्हें नहीं बोलना चाहिए तो पूछा जा सकता है कि दंतेवाड़ा की कलेक्टर रीना बाबा कंगाले भी महाराष्ट्र के और एसपी बिहार के हैं. उन्हें क्यों नहीं भगाने की शुरुवात की जाती. बस्तर के गांव-गांव में हमारे जैसे बंगाली भाषी से हुए हैं, और इस तरह की बातों से हमें दुख होता है. छत्तीसगढ़ को बाल ठाकरे की जरुरत नहीं है औऱ आप लोग तानाशाही लाने की कोशिश न करें.
बस्तर में कर्मा जी, नेताम जी, कश्यप जी, सोढ़ी जी को ही बोलने का हक है औऱ घोटाला करने का भी. मालिक मकबूजा कांड याद है आपको ? वह हिमांशु ने नहीं किया था, बस्तर के इन्हीं लोगों ने किया था. देश के किसी भी हिस्से में सबको बोलने का हक है, काम करने का हक है. उस पर सवाल खड़े कर के आप संविधान पर ही सवाल खड़े कर रहे हैं, नक्सलियों के लिए जगह बना रहे हैं. नक्सलियों से लड़ना है तो इस ठाकरेशाही से बाहर आएं.
 
   
 

SANJAY VERMA (www.svsanjay518@mail.com) RAIPUR

 
 Mr. Himanshu does not belong the tribe socity and not an one man of tribe socity would not invite him for the salvation so how does he think so much about the tribe? Please leave them. 
   
 

pragya (pandepragya30@yahoo.co.in ) lucknow

 
 सरकार यानी सत्ता! सत्ता खेलती है... छोटी छोटी बातें ही बड़े युद्ध का कारण बनती हैं.  
   
 

Durgesh Thakur (shatabditimes@rediffmail.com) Kawardha

 
 ये विचार बहुत ही वास्तविक है. अगर नक्सलवाद समस्या है तो इसे इसी नज़रिए से दूर किया जा सकता है. क्योंकि बस्तर में इस समस्या का कारण आदिवासियों का दमन ही है.  
   
 

Durgesh Thakur (shatabditimes@rediffmail.com) Kawardha

 
  सामयिक को साफ तौर पर देखने की दृष्टि का है ये लेख. लेखक को बधाई.  
   
 

अनिरुद्ध (ashrivastava175@gmail.com) जगदलपुर

 
 कोई नक्सलियों को आदिम जमीन से जाने की वकालत में क्यों खडा नहीं होता? नक्सली बस्तर के जंगल से बाहर चले जायेंगे तो स्वाभाविक है कि आदिवासी विस्थापन स्वाभाविक रूप से रुकेगा और उनका जीवन सुचारू हो सकेगा। सवाल यह भी है कि नक्सलियों का बस्तर के बाहर से बैठ कर समर्थन करने वाले लोग और नक्सलियों के मानवाधिकार के लिये काम करने वाले लोगों के भी बहुत से सच हैं।

मजेदार बात है संदीप जी कि यह लिखते हुए भी कि पाकिस्तान के लिये जैसे तालिंबान है वैसे ही भारत के लिये नक्सली आप अपने लेख में नक्सलवाद के समर्थन में ही खडे नजर आते हैं। अगर नक्सलवादी हिंसा जायज है तो आपको सलवा जुडुम को भी जायज ठ्हराना होगा। आतंक क्रांति नहीं है और आतंक फैलाने वालों के खिलाफ आवाज बुलंद करना अपराध भी नहीं है और इस सच को आप लोगों के झूठे प्रचार का भोपू दबा भी नहीं सकता। हाँ अपने आलेख का शीर्षक बदलिये "निशाने पर आदिवासी" की जगह "निशाने पर हिमांशु" रखिये। बस्तर की आवाज होने का हक महेन्द्र कर्मा, बलीराम कश्यप...नेताम, कुंजाम, सोढी को अधिक है। उनकी जमीन है उनकी आवाज है। महेन्द्र कर्मा की आवाज क्यों दबायी जाये क्या इस लिये कि बस्तर उनकी मिट्टी है और वे आदिवासी नेता हैं?
 
   
 

yashvendra (yash_lko2000@yahoo.com) lko

 
 हम आपके साथ हैं. 
   
 

dr.lakhan p singh (lakhan.78652@rediffmail.com) raipur

 
 जिस हिम्मत और हौसले के साथ हिमांशु जी आदिवासियों के हक़ में खड़े हैं, उनके हौसले को मैं सलाम करता हूं. ये संघर्ष ज़मीन की आख़री जद्दोज़हद है, यदि इसे हम हार गये तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा. 
   
 

kumar sauvir (kumarsauvir@yahoo.com) lucknow

 
 संदीप पांडेय का आखरी सवाल ही दरअसल बड़ा सवाल नहीं है. सवाल तो ये है कि हिमांशु को उनकी आदिवासियों के लिए छेड़ी गई लड़ाई के लिए वहीं पर पूरी मजबूती के साथ जमाये रखने के लिए हम लोग क्या कुछ कर सकते हैं. हिमांशु को वहीं पर अकेले छोड़ देना और उनके और सत्ता तथा उसके सरकारी आतंकवाद के बीच उत्पीड़न झेल रहे आदिवासियों को हमेशा-हमेशा के लिए तोड़ भी सकता है. आइए, हम सब इस बात पर सोचें. संदीप भाई ने ये रिपोर्ट डाली है तो वो भी इस बारे में हमें कुछ रास्ता बतायें. 
   
 

jeengar durga shankar gahlot (samacharsafar@yahoo.co.in) makbara bazar, kota-324006 [raj.]

 
 Thanks Sh Sandeep Pandey, for this article, your awareness & for spreading awareness to all Indian's.  
   

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