पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > प्रीतीश नंदी Print | Send to Friend | Share This 

शिखर या फिर सिफर

बात पते की

 

शिखर या फिर सिफर

प्रीतीश नंदी

दुनिया एक धुरी से दूसरी धुरी पर स्थानांतरित हो गई है. एक समय में हमारे बेहतरीन और प्रतिभावान लोग उत्कृष्टता की तलाश से प्रेरित होकर काम करते थे. उस युग का अब अंत हो चुका है. अब हम जिस चीज का उत्सव मनाते हैं, वह है सफलता की खोज.

आज सफलता ही वह अद्भुत रोशनी है, जो खजाने की तलाश में निकले सौदागरों और दूसरों की कीमत पर लाभ कमाने वालों के स्वप्नों को ताकत देती है. नहीं, यह सिर्फ नैतिक विशिष्टता की ही बात नहीं है क्योंकि खजाने की तलाश में निकले सौदागरों (वास्कोडिगामा, कोलंबस) ने इतिहास भी रचा है, मनुष्य की नियति को आकार दिया है. जैसाकि गॉर्डन गेको (हॉलीवुड फिल्म वॉल स्ट्रीट का एक चरित्र) कहता है, लोभ अच्छा है. यह लोभ ही था, जो कोलंबस को भारत लेकर गया. भारत के बजाय उसने अमेरिका की खोज कर ली. यह लालच था, जो ईस्ट इंडिया कंपनी को हिंदुस्तान ले आया. उसी ने हमें वह राष्ट्र बनाया, जो आज हम हैं. यह लोभ ही था, जिसने चीन को ऐसी सफलता की ऊंचाई पर पहुंचाया और दुनिया के लिए एशिया के दरवाजे खुले. लेकिन फिर भी इस सबके बावजूद बेलगाम लालच से मुझे डर क्यों लगता है?

मुझे लगता है कि संभवत: ऐसा इसलिए है क्योंकि हम ‘उत्कृष्टता की तलाश’ के विचार के साथ बड़े हुए हैं. आज दुकानें ऐसी किताबों से अटी पड़ी हैं, जो आपको सिर्फ जीतना सिखाती हैं. ये किताबें आपको चेताती हैं कि जीत महज सबकुछ नहीं, बल्कि वही एकमात्र व संपूर्ण लक्ष्य है. अगर आप जीतते नहीं तो सबकुछ निर्थक और बेकार है, जो कुछ आपने सीखा, जो कुछ आपने किया, जिसके लिए आपने परिश्रम किया, उस सबका तब तक कोई अर्थ नहीं है, जब तक कि आप जीत नहीं जाते. जीत अब कोई प्रक्रिया नहीं है. जीत एक लक्ष्य है और वह एकमात्र लक्ष्य है. आप एक पूरी दौड़ के अगुआ हो सकते हैं, लेकिन अगर आपने आराम करने से पहले फीता नहीं छुआ, सबसे आगे नहीं हुए तो आपके एक कदम का भी कोई अर्थ नहीं रह जाएगा. दूसरी ओर ‘उत्कृष्टता’ एक ऐसी चीज है, जिसकी तलाश में आप पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं.

यह एक कला है, एक विश्वास. यह आपको सर्वश्रेष्ठ के साथ एकाकार होने की शिक्षा देती है. जबकि सफलता यह सिखाती है कि आपको जीतने के लिए सिर्फ एक मौका मिलता है. वह मौका फिसल गया और आप खत्म. इन दोनों चीजों का फर्क बिल्कुल साफ है. फिर भी हम सब असमंजस और उलझन की स्थिति में रहते हैं. उत्कृष्टता और सफलता को आज की दुनिया में एक-दूसरे का समानार्थी समझा जाता है. हम यह भूल जाते हैं कि जीतने वाला व्यक्ति हमेशा ही सर्वश्रेष्ठ नहीं होता है. हम यह भी भूल जाते हैं कि उत्कृष्टता हमेशा सफलता की गारंटी दे ही, यह जरूरी नहीं है. मैं ऐसे स्कूल में गया, जहां मुझे यह सिखाया गया कि अगर मैंने किसी खेल को बेहतर ढंग से खेला है तो अपनी हार से भयभीत होने की कोई वजह नहीं है. लेकिन उन दिनों कोई भी खेल ऐसा मरने-मारने की हद वाला नहीं हुआ करता था. यहां तक कि बॉक्सिंग में भी ऐसा नहीं होता था.

हमारे चारों ओर जो दबाव है, वह डराने वाला है. यहां किसी को भी न जीतने की इजाजत नहीं है. हार को इतना घृणित बताकर हम हारने वालों को अपना जीवन ही खत्म करने को मजबूर कर रहे हैं.

हमारे हीरो आंकड़ों के शिकारी नहीं, बल्कि खेल के कलाकार हुआ करते थे. खेलने का अंदाज और तरीका किसी खिलाड़ी की पहचान हुआ करता था. जीतना या हारना खेल का ही एक हिस्सा था. वस्तुत: हमें तो यहां तक सिखाया जाता था कि कैसे बेहतर तरीके से हारा जाए. आखिरकार हारने वाले लोगों को मजबूत करने और उनके साथ खड़े होने वाले ज्यादा लोग होते थे. उपेक्षित और पददलित लोग नायक होते थे. गर्व से भरा हुआ विजेता, जो आज रोल मॉडल है, तब वह सब लोगों की घृणा का पात्र होता था.

वह सब अब बदल चुका है. अब विजेता ही नायक है. वही एकमात्र हीरो है. अब हार शब्द बहुत सारी शर्म और ग्लानि से भरा हुआ है. अब यह शब्द खो देने के नायकत्व का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह हार के अपमान से भरा हुआ है. ऐसा मुश्किल से ही होता है कि 99 रन बनाकर पेवेलियन की ओर लौट रहे किसी बल्लेबाज की अगुआई में जोशीली तालियों की गड़गड़ाहट हो. खेल खत्म होने के बाद मैदान में सिर्फ एक ही टीम के लिए जगह होती है और वह है जीतने वाली टीम. अगर वह जीत बहुत मामूली हो तो भी हारने वाले शर्म से भरे हुए बाहर जाते हैं. मानो उन्होंने सभी का सिर नीचा कर दिया है.

यहां तक कि जहां जीत सिर्फ लोकप्रिय मतों का नतीजा होती है, सारी संभावनाएं पहले से तय होती हैं, वहां भी विजेता सारा श्रेय ले जाते हैं. दूसरे प्रतिभागियों को तुरंत भुला दिया जाता है. विजेता भी सिर्फ अगले मौसम तक ही याद रहता है, जब तक कोई दूसरा विजेता आकर सुर्खियों में नहीं छा जाता. हम अतीत के विजेताओं को कितनी आसानी से भुला देते हैं कि वे खुद भी यह भूल जाते हैं कि वे कभी विजेता थे. देवगौड़ा को देखिए. उनके साथ इतना बुरा व्यवहार किया गया कि कोई यह विश्वास नहीं कर सकता कि कभी वे प्रधानमंत्री थे. उनके बाद प्रधानमंत्री बनने वाले गुजराल इतने शर्मिदा हुए कि वे उस दौड़ से पूरी तरह बाहर हो गए और उन्होंने खुद को एक अंधेरे कोने में बंद कर लिया.

हम धीरे-धीरे इस बात को भूलते जा रहे हैं कि पराजितों और हारने वालों के बगैर यह दुनिया भयानक रूप से नीरस और उबाऊ हो सकती है. नकली दिखावा करने वाले और शेखी बघारने वाले दंभी विजेता ऐसे नहीं होते, जिनके साथ आसानी से रहा जा सके. किसी भी पत्रकार से पूछिए कि विधु विनोद चोपड़ाओं से भरे हुए संसार में रहना कैसा लगेगा. यही कारण है कि ‘उत्कृष्टता की तलाश’ इतनी जरूरी और महत्वपूर्ण है. यह आपको दूसरी समान प्रतिभाओं वाले लोगों के साथ जुड़ने और शामिल होने का मौका और अंतराल प्रदान करती है. हमारे चहुंओर सुबोध गुप्ता ही एकमात्र कलाकार नहीं हैं सिर्फ इसलिए क्योंकि उनका काम सबसे महंगे दामों में बिकता है.

आमिर खान इकलौते सितारे नहीं हैं क्योंकि उन्होंने हमें थ्री ईडियट्स जैसी फिल्म दी है. चेतन भगत एकमात्र लेखक नहीं क्योंकि उनकी किताब लाखों में बिकती है. सिर्फ हिट होना ही सफलता की परिभाषा नहीं है वरना डैन ब्राउन दांते से ज्यादा महान लेखक होते, डैमिअन हस्र्ट गोगां से ज्यादा बड़ा चित्रकार होता, हिमेश नुसरत फतेह अली खां से ज्यादा बड़ा गायक होता और जेम्स कैमरून सत्यजीत रे से ज्यादा बड़े फिल्मकार होते. सफलता की तलाश सड़कों को लाशों से भर देती है. दुनिया में किशोर आत्महत्याएं, वित्तीय घोटाले, सफेदपोश अपराध और परिवारों का टूटना जीतने की हवस के नतीजे हैं. हमारे चारों ओर जो दबाव है, वह डराने वाला है. किसी को भी न जीतने की इजाजत नहीं है. हार को इतना घृणित बताकर हम हारने वालों को अपना जीवन ही खत्म करने को मजबूर कर रहे हैं. साहस, नायकत्व, हार की गरिमा, अपनी गलतियों से सीखने की ताकत सब एक ही दिशा में गतिमान हैं.

21.01.2010, 16.45 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in