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शशि थरुर का नेहरु राग

बहस

 

शशि थरुर का नेहरु राग

राम पुनियानी


हाल में ''इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेन अफेयर्स'' की बैठक में बोलते हुए, भारत के विदेश राज्य मंत्री श्री शशि थरूर ने नेहरू की विदेश नीति के बारे में लार्ड भिखू पारेख की टिप्पणी का समर्थन किया. लार्ड पारेख ने कहा था कि नेहरू की विदेश नीति, नैतिक सिद्धांतो पर आधारित थी और थरूर ने कहा कि वह नैतिक धारावाहिक थी.

भारत की नीतियों की नींव रखने वाले नेहरू की निष्पक्ष और बिना किसी पूर्वाग्रह के की जाने वाली आलोचना का स्वागत किया जाना चाहिए. इससे हमें कुछ सीखने को मिलेगा और हम भविष्य में उन्हीं गलतियों को दोहराने से बच सकेंगे. हम किसी भी व्यक्ति को आलोचना या समीक्षा की परिधि से बाहर नहीं रख सकते.

इस मामले में अपनी पार्टी के अप्रसन्नता व्यक्त करते ही थरूर ने अपनी टिप्पणी के लिए माफी माँगने में ही अपनी खैर समझी. काँग्रेस में आज भी गाँधीजी और पंडित नेहरू के प्रति अंधश्रद्धा है परंतु थरूर को केवल इस आधार पर कठघरे में खड़ा करना अनुचित होगा कि उन्होंने नेहरू की आलोचना की.

इसके साथ ही, हमें यह भी जानने-समझने की कोशिश करनी होगी कि पंडित नेहरू की विदेश नीति की, उसके नैतिक सिद्धांतो पर आधारित होने के नाम पर, आलोचना कितनी जायज है. कहीं यह उन नैतिक सिद्धांतों और मानदंड़ों का मखौल उड़ाना तो नहीं है, जो हमारे स्वतंत्रता संग्राम का आधार थे और जो आगे चलकर हमारी विदेश नीति की नींव बने. थरूर के वक्तव्य की मात्र इस आधार पर आलोचना की गई कि उसमें पंड़ित नेहरू के प्रति असम्मान झलकता था परंतु मूल मुद्दों पर कोई चर्चा नहीं हुई.

हमें यह ध्यान रखना होगा कि थरूर और पारेख जिन मूल्यों पर जोर दे रहे हैं, वे सन् 1940 के दशक में उभरते हुए भारतीय राष्ट्र-राज्य के हितों के विरूद्ध थे. हमें इसमें संदेह है कि थरूर-पारेख और उन जैसे अन्य महानुभावों को तत्कालीन परिस्थितियों और समस्याओं की समझ है. शायद उन्हें नहीं मालूम कि गाँधी और नेहरू के समक्ष कितनी कठिन चुनौतियाँ थी. नेहरू और गाँधी को न केवल यह सुनिश्चित करना था कि भारत, साम्राज्यवाद की जंजीरों से मुक्त हो वरन् उन्हें ऐसी विदेश नीति अपनानी थी, जिससे भारतीयों के अलावा, आजाद हो रहे एशिया और अफ्रीका के अन्य देशों के निवासियों के लिए भी दुनिया एक बेहतर जगह बन सके.

भाजपा ने बिना किसी देरी के थरूर और पारेख के विचारों का समर्थन कर डाला. पार्टी ने यह भी कहा कि नेहरू ने कश्मीर मसले को उलझा दिया, उनकी गुटनिरपेक्षता की नीति ने कई समस्याएं पैदा की और यह भी कि चीन के प्रति उनकी नीति पूरी तरह असफल रही.

यह आरोप पूरी तरह बेबुनियाद है कि नेहरू के गलत कदमों की वजह से भारत को कश्मीर के एक-तिहाई हिस्से से हाथ धोना पड़ा. यह, असली घटनाक्रम की जानकारी का अभाव दर्शाता है.

थरूर के इस कथन से कि नेहरू की विदेश नीति नैतिक धारावाहिक थी, ऐसा प्रतीत होता है कि नैतिकता के लिए अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में कोई स्थान ही नहीं होना चाहिए! और यह भी कि नैतिकता हमेशा राष्ट्रहित के विरूद्ध होती है! इसके विपरीत, तथ्य यह है कि पूरी दुनिया के साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलनों की नींव नैतिकता पर ही रखी गई थी. ये आंदोलन लोगों के उनके नैतिक अधिकार हासिल करने के प्रयासों का नतीजा थे.

व्यक्ति के रूप में और राष्ट्र के रूप में अपने नैतिक अधिकारों को पाने के इसी संघर्ष ने करोड़ों मानवों को साम्राज्यवादी व औपनिवेशिक ताकतों के शोषण व दमन से मुक्ति दिलाई. इंग्लैंड़ और युरोप के अन्य औपनिवेशिक देश व उनका उत्तराधिकारी अमरीका, दुनिया की मुख्य दमनकारी ताकते रहीं हैं. जब वियतनाम पर अमरीका अनवरत बम वर्षा कर रहा था तब नैतिक सिद्धांतों ने ही वियतनाम के नागरिकों को इस क्रूर हमले से मुकाबला करने और अमरीका को घुटने टेकने पर मजबूर करने की ताकत दी थी. नैतिक बल के कारण ही भारत के लोग अंग्रेज़ों की सत्ता को उखाड़ फेंक सके थे.

जहाँ तक महात्मा गाँधी का प्रश्न है, जिस समय देश की विदेश नीति ठोस स्वरूप ले रही थी, उस वक्त तक वे दुनिया से जा चुके थे. भारतीय विदेश नीति के निर्माण में उनका एक महत्वपूर्ण योगदान था, उन फिलिस्तीनी नागरिकों के अधिकारों के बारे में उनका वक्तव्य, जिन्हें इजराइल ने उनके घरों से बाहर कर दिया था. अपने समय से आगे सोचने वाले गाँधीजी ने इजराइल की नीतियों को ''यहूदी आतंकवाद'' की संज्ञा दी थी. फिलिस्तीनी ग्रामीणों को आतंकित कर रहे हथियाराबंद यहूदी उनकी चिंता का विषय थे. उन्होंने यह भी कहा था कि फिलिस्तीन पर यहूदी कानून लादना अनुचित है. यह महात्मा गाँधी का भारत की इजराइल नीति के निर्माण में योगदान था. अन्याय के शिकार का साथ देने से उच्च नैतिकता आखिर क्या हो सकती है?

कुछ वर्ष पहले तक, भारत ने इजराइल से पर्याप्त दूरी बनाए रखी थी. हाल के कुछ सालों में भारत ने इजराइल का हाथ थामा है. इजराइल से दोस्ती को बढ़ावा देने में सबसे आगे रही एनडीए सरकार, जिसने न केवल कई मौकों पर इजराइल की प्रशंसा की वरन् उसके साथ सहयोग की पेशकश भी की.

जहाँ तक कश्मीर का प्रश्न है, यह आरोप पूरी तरह बेबुनियाद है कि नेहरू के गलत कदमों की वजह से भारत को कश्मीर के एक-तिहाई हिस्से से हाथ धोना पड़ा. यह, असली घटनाक्रम की जानकारी का अभाव दर्शाता है. तथ्य यह है कि स्वतंत्रता के बाद, कश्मीर ने भारत और पाकिस्तान, दोनों में शामिल होने से इंकार कर दिया था और स्वतंत्र रहने का निर्णय किया था. सन् 1948 में, कबाईलियों और पठानों ने पाकिस्तान की सेना के सहयोग से कश्मीर पर जब हमला किया, तब वह एक स्वतंत्र राष्ट्र था. इसलिए यह कहना अनुचित होगा कि भारत ने कश्मीर का एक-तिहाई हिस्सा खो दिया.

कश्मीर के साथ विलय की संधि पर हस्ताक्षर के बाद, भारत ने पाकिस्तानी हमलावरों को पीछे ढ़केलने के लिए अपनी सेना भेजी पंरतु तब तक ये हमलावर कश्मीर के एक-तिहाई हिस्से पर कब्जा कर चुके थे. इन हालातों में युद्ध जारी रखने का मतलब होता बड़ी संख्या में नागरिकों के मारे जाने का खतरा मोल लेना.

उस समय, संयुक्त राष्ट्रसंघ दुनिया में मध्यस्थ की भूमिका निभाता था और विवादों को सुलझाने के लिए विभिन्न राष्ट्रों को उसकी मदद लेनी पड़ती थी. चूंकि अमरीका इस क्षेत्र में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अपनी उपस्थिति बनाए रखना चाहता था, इसलिए उसने कश्मीर मुद्दे पर हमेशा पाकिस्तान का साथ दिया. संयुक्त राष्ट्रसंघ में रूस के वीटो के कारण कश्मीर में यथास्थिति बनी रह सकी. कश्मीर के लोगों का मत जानने के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा प्रस्तावित जनमत संग्रह आज तक नहीं हो सका.
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