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पद्म पुरस्कार या छद्म...

मुद्दा

 

पद्म पुरस्कार या छद्म...

प्रीतीश नंदी


आखिर हम काम क्यों करते हैं? पैसे के लिए? सफलता, ख्याति, सम्मान, खुद को जानने के लिए? अच्छी जिंदगी के लिए? हममें से प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग विवशताओं से संचालित होता है. लेकिन एक बात तय है. कुछ पेशे वाकई पैसा बनाने के लिए होते हैं और कुछ पेशे अपनी खोज करने के लिए.

शिक्षक निश्चित रूप से अपने पेशे में पैसा बनाने के लिए नहीं आते हैं, हालांकि यह भी सच है कि कुछ शिक्षक वाकई बहुत धनवान हैं. इसी तरह जुआरी कैसिनो में पैसा बनाने के लिए जाता है, लेकिन कैसिनो जाने वाले अधिकांश लोग लुटकर ही बाहर आते हैं. गणित का शौक भी दो अलग-अलग राहों पर ले जा सकता है. आप अपने समय के महान वैज्ञानिक बन सकते हैं. या फिर अगर आप दलाल स्ट्रीट पर अपनी किस्मत आजमाने के इच्छुक हैं तो अंकों के प्रति अपने जुनून से आप दूसरे कई लोगों से आगे निकल सकते हैं.

यदि आप अपने कार्यक्षेत्र में सफल रहते हैं तो उसके इनाम भिन्न हो सकते हैं. कुछ मुकेश अंबानी की तरह बन जाते हैं, जो देश के सबसे प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने के मालिक हैं. कुछ सचिन तेंडुलकर या शाहरुख खान की तरह बन जाते हैं, जो अपने-अपने पेशों के निर्विवाद बादशाह हैं. कुछ ऐसे भी हैं जैसे राहुल गांधी, जिन्हें राष्ट्र की नियति को बदलने का अवसर हासिल हुआ है. या फिर सुनील मित्तल जिन्होंने विशाल व्यक्तिगत साम्राज्य खड़ा करते हुए अपनी दूरसंचार संबंधी पहल से भारत को हमेशा के लिए बदल दिया है.

महत्वाकांक्षा की शुरुआत अक्सर एक सपने, एक मकसद के साथ होती है. भले ही पैसा इसका एक महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है, लेकिन साफ कहूं तो मुझे संदेह है कि यहां यह वाकई बहुत मायने रखता है. कई लोगों के पास पैसे के अलावा भी ऐसे कारण होते हैं जिनके लिए वे मेहनत करते हैं और श्रेष्ठता हासिल करते हैं. यह स्वयं को साबित करने की अभिलाषा होती है. यहां तक कि रामलिंगा राजू और लिंडा लवलेस जिनके नामों को सुनकर हम नाक-भौं सिकोड़ते हैं, भी अपने-अपने विशिष्ट तरीकों से इसी मकसद को पूरा करने में लगे हुए थे. लेकिन जो लोग कड़ी मेहनत करते हैं, क्या वे सभी सफल भी होते हैं? ऐसा कतई नहीं है और यहीं पर पुरस्कारों और सार्वजनिक पहचान की भूमिका सामने आती है.

पुरस्कार न केवल सफलता पर ठप्पा लगाते हैं, बल्कि कई अन्य विशेषताओं को भी मान्यता प्रदान करते हैं जैसे दक्षता, संघर्ष, प्रयास और इन सबसे ऊपर श्रेष्ठता. सफलता, धन, ख्याति और सम्मान हासिल करने वाले प्रत्येक शाहरुख खान के बरक्स सैकड़ों अभिनेता और भी होते हैं जिन्हें उतना ही वरदान हासिल होता है, लेकिन वे इतने सफल नहीं हो पाते हैं. इसका मतलब यह नहीं होता है कि वे कोई कम प्रतिभासंपन्न होते हैं, बल्कि ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जिंदगी की अन्याय करने की विचित्र आदत होती है, यहां तक कि हमारे बीच मौजूद सर्वश्रेष्ठ लोगों के साथ भी. भारी निराशाओं की वजह से गुरुदत्त ने स्वयं को खत्म कर लिया था.

इसी तरह प्रत्येक सचिन तेंडुलकर के बरक्स भारत में ऐसे सैकड़ों प्रतिभाशाली युवा खिलाड़ी होते हैं, जिन्हें न तो अपने को तराशने का कभी मौका मिल पाता है और न ही आगे बढ़ने का ऐसा कोई अवसर, जिसकी उन्हें जरूरत होती है. और जब वे कुछ करने की कोशिश करते हैं तो हमारा सिस्टम हर स्तर पर उनके आगे बाधा खड़ी कर देता है. प्रत्येक आरके पचौरी के बरक्स हजारों पर्यावरण कार्यकर्ता हैं, जो हमारे कस्बों और गांवों में पर्यावरण को बचाने के लिए अद्भुत काम कर रहे हैं और हमने उनका नाम भी नहीं सुना होता है. हम उनके बारे में तभी जान पाते हैं, जब उन्हें कोई पुरस्कार मिलता है और वे मीडिया के सामने आते हैं.

क्या हम कभी महाश्वेता देवी या अरुणा राय, एमसी मेहता या दीप जोशी के बारे में जान पाते, यदि उन्हें मैग्सेसे अवॉर्ड नहीं मिला होता? यदि किरण देसाई या अरविंद अडिगा को मैन बुकर अवॉर्ड नहीं मिला होता तो क्या हम कभी उनकी किताबें खरीदने के लिए बाजार जाते?

हम एक और संस्थान को भ्रष्ट होने की इजाजत नहीं दे सकते. इससे न केवल पुरस्कारों का महत्व खत्म हो जाएगा, बल्कि उन विलक्षण पुरुषों और महिलाओं की उपलब्धियों को भी क्षति पहुंचेगी जिन्हें इतने सालों में ये पुरस्कार मिले हैं

यहीं पर पुरस्कार अहम भूमिका निभाते हैं. हर कोई इतना किस्मतवाला नहीं होता कि अपनी योग्यतानुसार उसे पैसा और ख्याति मिल जाए. ऐसे लोग पुरस्कारों की बदौलत मिली प्रतिष्ठा व समर्थन से इसकी खानापूर्ति करते हैं. जब भी सिनेमा का इतिहास लिखा जाएगा, सत्यजीत रे को उनकी महान फिल्मों के लिए याद किया जाएगा, भले ही उन्होंने फिल्मों से पैसा नहीं कमाया हो. हो सकता है उनकी फिल्मों के निगेटिव बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए हों, लेकिन सत्यजीत रे को मिले सम्मान उन्हें सदी के महान फिल्म निर्माताओं में से एक के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं. हर साल कुछ सच्चे विलक्षण भारतीय विभिन्न पुरस्कारों के जरिए ख्याति अर्जित करते हैं.

ये पुरस्कार ही उन्हें अपना श्रेष्ठ कार्य दिखाने के लिए प्रोत्साहित भी करते हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण तीन राष्ट्रीय पुरस्कार हैं : पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण. मैं इनमें भारत रत्न को नही गिन रहा हूं. भारत रत्न प्राप्त केवल पांच व्यक्ति ही अभी हमारे बीच जीवित मौजूद हैं. इनमें दो गायक और एक-एक संगीतकार, वैज्ञानिक व अर्थशास्त्री शामिल हैं. इनकी औसत आयु 80 साल है.

यही कारण है कि हम राष्ट्रीय पुरस्कारों को इतना मान देते हैं. इसीलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि वे सावधानीपूर्वक और पारदर्शिता व समझदारी से चुने जाएं. हम एक और संस्थान को भ्रष्ट होने की इजाजत नहीं दे सकते. इससे न केवल पुरस्कारों का महत्व खत्म हो जाएगा, बल्कि उन विलक्षण पुरुषों और महिलाओं की उपलब्धियों को भी क्षति पहुंचेगी जिन्हें इतने सालों में ये पुरस्कार मिले हैं. ऐसे युग में जबकि मीडिया हमें आज जो घट रहा है, उसके अलावा और कुछ याद रखने ही नहीं देता, ये पुरस्कार ही उन्हें भावी पीढ़ियों में उनकी याद दिलाएंगे.

इसलिए जब भारत में बैंकों के साथ धोखाधड़ी करने के पांच सीबीआई मामलों का सामना करने वाले और अमेरिका में कई फर्जीवाड़ों के आरोपी संतसिंह चटवाल को पद्म भूषण देने की घोषणा की जाती है तो यह शर्म की बात है कि इससे उनका नाम वर्षो तक हमारे साथ रहेगा. मजेदार बात यह है कि वॉशिंगटन डीसी स्थित हमारे दूतावास से कहा गया था कि वह चटवाल के नाम की अनुशंसा पद्मश्री के लिए करे. लेकिन जब दूतावास ने ऐसा करने से इनकार कर दिया तो उनका पुरस्कार पद्म भूषण में क्रमोन्नत कर दिया गया.

अब सरकार द्वारा अपना चेहरा बचाने का एक ही रास्ता है कि चटवाल स्वयं ही चुपचाप इस पुरस्कार को लौटा दें और प्रत्येक व्यक्ति को लज्जित होने से बचा लें. लेकिन सवाल यह है कि क्या वे ऐसा करेंगे? और क्या हम कभी उसका नाम जान पाएंगे जिसने चटवाल के नाम की अनुशंसा पद्म भूषण के लिए की थी?

04.02.2010, 00.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sandeep Bhatt (sana_sho21@yahoo.co.in) Bhopal

 
 हिदुंस्तान जैसे मुल्क में ही ऐसा संभव है कि राष्ट्रीय पुरस्कारों में ऐसी मिलावट संभव है। इस देश को अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है। जो यहां है उसे बेहतर करने और गलत को तत्काल सही करने की जरूरत है। सैफअली का ही नहीं कई ऐसे मामले हैं जहां निरा अयोग्य लोगो को अपने फन और क्षेत्र में माहिर लोगों के साथ सम्मान के लिए बुलाया गया।

दुर्भाग्य है कि राजनीति इतनी हावी हो गई है कि आम आदमी के मन में यह गहरे से बैठ गया है कि राजनीतिक प्रभाव के बिना कुछ संभव नहीं है। इधर इसका स्पष्ट प्रभाव साफ दिखने लगा है ऐसे दौर में उम्मीद की रोशनी खोजने पर भी दिखती नहीं है।
 
   
 

अरुण देव (www.samvadi.blogspot.com) नजीबाबाद

 
 प्रीतीश नंदी हमारे समय के बहुत ही जरूरी समाज विज्ञानी हैं. उनको पढना दिलचस्प है- हर बार नए आयाम, नया विश्लेषण और आवश्यक मुद्दे. उनके सरोकार दिल और दिमाग को छूते हैं.




 
   
 

om prakash shukla (ops309@gmail.com) lucknow

 
 आप सैफ अली ख़ान को क्यों भूल रहे हैं. वह भी तो काले हिरणों के शिकार के अभियुक्त हैं और उनसे बहुप्रतिष्ठित लोग हैं, जिन्हें नज़रअंदाज किया गया है. ये तो सबको पता है कि उन लोगों की पैरवी कहां से होती है. 
   

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