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श्री रामकृष्ण देव का सर्वधर्म समभाव

स्मरण

 

श्री रामकृष्ण देव का सर्वधर्म समभाव

कनक तिवारी

अठारहवीं सदी की शुरुआत से उन्नीसवीं सदी के मध्य तक भारत राजनीतिक, आर्थिक और बौद्धिक दृष्टि से भी पूरी तौर पर एक पराजित देश बनता गया. देश में आर्थिक खुशहाली नहीं थी. शिक्षा में बदहाली थी और अंग्रेजियत ने भारत की काठी पर सवार होकर उसकी मुश्कंर कस ली थीं और मुश्किलें बढ़ा दी थीं. कुल मिलाकर देश बदहवास हो रहा था.

जब रात में गहरा अंधेरा उसके आसमान पर छा जाता है, तब ही बिजली भी कौंधती है. वह रोशनी देती है और वैचारिक आंदोलन की घनघोर बारिश होने की सूचना भी देती है. यही भारत में हुआ. अंग्रेजी हुकूमत के बहाने पश्चिमी जीवन पद्धति का हमला हुआ. उन्नीसवीं सदी का मध्य आते-आते आत्मविश्वास के कुछ भारतीय पुरोधा विचार के आकाश में नक्षत्रों की तरह टंग गये. अपना कालजयी यश लिये वे समकालीन इतिहास के प्रेरक बन गये. श्री रामकृष्ण देव उनमें से एक लेकिन सबसे पहले हैं.

उनका व्यक्तित्व सबसे अनोखा है. मोटे तौर पर वे सांसारिक दुनिया के नहीं हैं लेकिन जीवन और जगत को उन्होंने एक नयी दृष्टि से पुष्ट करने की कोशिश की है. उनके योग्यतम शिष्य स्वामी विवेकानंद सहित रामकृष्ण मठ और मिशन के असंख्य साधुओं ने मनुष्य की सेवा करने का अभियान निरंतर जारी रखा है.

इसमें कोई शक नहीं कि श्री रामकृष्ण देव मूलत: एक धार्मिक व्यक्ति और ईश्वर भक्त थे. एक गरीब ब्राम्हण परिवार में 18 फरवरी 1836 को कमार पुकुर गांव में गदाधर चटोपाध्याय का जन्म हुआ था. प्रकृति में कुछ अप्रत्यक्ष रहस्य ढूंढ़ने की उनमें बचपन से ही ललक रही है. धरती से लेकर आसमान तक कुदरत जितने रंगों की छटा उन्हें दिखाती थी, उसे देखकर वे एक तरह की समाधि में पहुंच जाते थे. उनमें गहरा कला बोध भी था. कुम्हार को बर्तन बनाता देख वे जिद करने लगते कि यह काम भी उन्हें सीखना है.

संगीत, कविता और चित्रकारी में भी उनकी गहरी रुचि उन्हें धीरे-धीरे वह कलाकार बनाती गयी, जो अंतत: पूरी मानवता के काम आया. धार्मिक परिवार से होने के कारण शिव, राम और कृष्ण की कथाएं पुराणों के प्रसंग और संस्कृत के श्लोक उन्हें रटाये जाते लेकिन श्री रामकृष्ण पाठशाला में ज्यादा दिन पढ़ नहीं सके. वे केवल रोटी कमाने वाली शिक्षा के गुलाम बनकर नहीं रह सकते थे. अपने बड़े भाई रामकुमार के पास उन्हें कलकत्ता भेजा गया, जिससे वे एक अच्छे संस्कृत शिक्षक बन सकें. संस्कृत शिक्षक तो वे नहीं बन सके लेकिन समकालीन भारत के सबसे बड़े संस्कृति शिक्षक बनकर श्री रामकृष्ण देव इतिहास में अपनी श्रेष्ठ जगह ढूंढ़ ही लेते हैं.

धर्म श्री रामकृष्ण देव के अस्तित्व का घर है. धर्म के बिना उनकी परिभाषा करना भी संभव नहीं है. उनका धर्म लेकिन औपचारिक, रस्मी या तिलिस्मी नहीं है. ईश्वर में उनकी अटूट भक्ति है. वे समाज या जीवन के कीचड़ में कमल की तरह रहकर ईश्वर की भक्ति के आराधक शुरुआती दौर में बने रहे. दक्षिणेश्वर के प्रसिद्ध काली मंदिर में उन्हें पुजारी नियुक्त कर दिया गया. यह श्री रामकृष्ण देव की यात्रा का पहला पड़ाव था.

उनमें एक गहरी व्यग्रता, करुणा और जिज्ञासा आग की तरह सुलग रही थी, जिस पर सांसारिकता की राख की परत प्रारंभ में दिखाई पड़ती है. जो सर्वशक्तिमान और अपरिभाषेय है-उससे परस्पर लीन हो जाना श्री रामकृष्ण देव के जीवन का मिशन बनता गया. वह ईश्वर किस काम का जो मनुष्य में समा नहीं जाये और धर्म रहित मनुष्य होना भी किस काम का? यह गुत्थी सुलझाने की निजी परेशानी श्री रामकृष्ण देव की थी लेकिन वह एक ऐतिहासिक अनिवार्यता बन गयी.

उनके जीवन में इसी दौर में कुछ साधु संतों और तांत्रिक साधकों का संयोग से आगमन हुआ और उन्होंने वह सब कुछ हासिल कर लिया जो असंभव तो है, लेकिन उन्होंने ही संभव किया.

एक तांत्रिक साधिका भैरवी ने तंत्र साधना के द्वारा उन्हें ईश्वर के दर्शन कराये. एक और साधु जटाधारी ने रामलला की धातु की मूर्ति की पूजा के जरिये श्री रामकृष्ण देव में शिशुराम के लिए पितृत्व भाव पैदा किया और उन्हें लगा कि वे राममय हो गये हैं. राधा कृष्ण के प्रेम प्रसंग के चश्मदीद गवाह बनने की जिद लिये श्री रामकृष्ण देव गोपियों का वस्त्र धारण किये ऐसी ही साधना में लीन होकर, उस मधुर भाव को हृदयंगम कर सके जिससे राधा ने उन्हें दर्शन दिये और उसके बाद कृष्ण ने भी.

उन्हें लगा कृष्ण के चरण कमल से रश्मि रेखाएं निकलकर भागवत तक और वहां से उनके हृदय तक लगातार चली आ रही हैं. भगवान, धर्म ग्रंथ और भक्त के एक हो जाने का यह प्रसंग उन्हें धर्मों के इतिहास में सबसे ज्यादा प्रासंगिक बनाता है क्योंकि इसके बाद ही श्री रामकृष्ण देव एक हिन्दू विचारक से ऊपर उठकर एक ऐसी दुनिया में कदम रखते हैं, जिसका समानांतर भारत तो क्या विश्व के इतिहास में अब तक उपलब्ध नहीं है.

यह रामकृष्ण देव थे, जिन्होंने एक कट्टर धार्मिक व्यक्ति और साधु होने के प्रयत्न में विश्व के कुछ अन्य धर्मों इस्लाम और ईसाईयत आदि में भी अपना आत्म साक्षात्कार करना चाहा. 1866 के अंत में एक धार्मिक मुसलमान को तन्मय होकर साधना करते श्री रामकृष्ण देव ने देखा. उन्होंने एक विद्यार्थी की तरह उनसे इस्लाम की शिक्षाओं से दीक्षित करने का आग्रह किया. जिस काली मंदिर में वे पुजारी थे, ठीक उसके बाहर मुसलमानों की तरह कपड़े पहनकर उन्हीं की तरह रहते, नमाज पढ़ते, खाना खाते वे तात्विक रूप से एक पारंपरिक मुसलमान दीखने लगे.
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