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कंत और प्रेम की स्त्रीवादी परिकल्पना

बहस

कंत और प्रेम की स्त्रीवादी परिकल्पना
गीताश्री

तो अब कबीर भी....!

इससे पहले कभी सोचने-विचारने का अवसर ही नहीं मिला कि कबीर भी उसी दायरे में थे. वरिष्ठ साहित्यकार पुरुषोत्तम अग्रवाल की राजकमल प्रकाशन से आई नई किताब ‘अकथ कहानी प्रेम की’ के सिर्फ दो अध्याय पढने के बाद एक संतकवि के पुरुषमार्गी होने का पता चलता है. इन दो अध्यायों में कबीर की स्त्रीत्व के प्रति जो धारणा है, उस पर विस्तार से लिखा, विचारा गया है और एक बार फिर कबीर सवालो के घेरे में हैं.

अकथ कहानी प्रेम की


कबीर की प्रशंसा और आलोचना के कई कारण रहे हैं लेकिन संभवतः पहली बार इतने विस्तार के साथ कबीर के इस पहलू को देखने और उस पर सवाल खड़े करने का किसी ने साहस किया है. कह सकते हैं कि ये किताब पुरुषोत्तम अग्रवाल के उसी साहस का परिणाम है. असहमतियां अपनी जगह, लेकिन कबीर की नारी संबंधी दृष्टि पर जिस तरह से वह विचार करते हैं, वह एक सर्वथा नया प्रस्थान जरूर है.

एक मध्यकालीन पुरुष संत जनाना कपड़े पहनकर, स्त्री की बोली में स्त्री का दुख बता रहा है या अपना वर्चस्व स्थापित करने का एक गुप्त रास्ता ढूंढ रहा है. कई बार दिखता है कि बेवजह स्त्री के बारे में स्त्री बनकर बोलने का स्वांग रचा जा रहा है...कबीर लिखते हैं-

कबीर प्रीतड़ी तो तुझ सौं बहु गुणियाले कंत,
जे हंसी बोलौं और सौं तो नील रंगाऊं दंत

इस कविता पर विलाप करने के अलावा और स्त्री क्या कर सकती है. स्त्री की सारी आजादी छीन ली क्योंकि उसका कंत बहुत गुणों वाला पहले ही घोषित कर दिया गया है. और बेगुणी, बेलच्छनी, बेशऊर स्त्री को अब उसे ही सर्वस्व मान लेना है. अब अगर उसने अपने चुनाव की कोशिश भी की, तो परिणाम अच्छा नहीं होने जा रहा है. उसे धमकी दी जा रही है.

विडंबना यह कि पुरुष, स्त्री बनकर सारी स्त्रियों को धमकी दे रहा है कि अगर तुमने अपनी आजादी या चुनाव या स्वेच्छा की बात सोची भी तो पीट-पीट कर नीली कर दी जाओगी. ऐसे प्रेम, ऐसे कंत और ऐसी प्रेमी के गुण गाने वालों को स्त्री, बहरुपिये से से अधिक कुछ नहीं समझने जा रही. स्त्री, सीमोन बोउआर की तरह सेकेंड सेक्स नहीं बनना चाहती, यह नियती उसे स्वीकार नहीं, वह पैरेलल सेक्स है और पैरेल सेक्स के रूप में बर्ताव करने वाले पुरुष से जरूर हंस-हंस कर बोलेगी. वह जरुर कहेगी, ‘एकमेक हवे सेज न सौवे, तब लगि कैसा नेह रे.’ यह स्त्री का अपना चुनाव है, चुनाव का लोकतांत्रिक अधिकार है.

कबीर लिखते हैं-
बिरह बुरा जिन कहौ विरहा है सुलतान
जिइ घर बिरह न संचरै, सो घर सदा मसान

क्या यह सारा बिरह का नाटक, स्त्री के माथे ही लिखा है? पुरुष को विरह क्यों नहीं व्यापता? क्या वह इसका स्थानापन्न चुनाव नहीं कर लेता? व्यावहारिक स्थितियों में ध्यान लगाकर कहूं तो व्यापार के लिए विदेश जाने, वैश्य के साथ जाने-रहने वाली स्त्रियां 'वेश्या’ के रूप में उपस्थित हैं, परंतु घर पड़ी स्त्री के लिए विरह के गीत हैं, आंसू है, फरियादें हैं,
संदेश हैं, और क्षण-क्षण चीरता इंतजार है.

यह वही कबीर हैं जो लिख रहे हैं-
नैन हमारे तुम को चाहें, रति न मानै हार
बिरह अगनि तन अधिक जरावै ऐसी लेहु बिचारि.

अब कोई स्त्री कबीर से पूछे या पुरुष समाज से पूछे कि क्या स्त्री देह पत्थर की बनी है? विरह मन से ज्यादा तन को जला रहा है. इस प्राकृतिक न्याय में भी पुरूष समाज अन्यायी हुआ खड़ा है और कह रहा है कि 'नारी की छाया पड़त अंधा होत भुजंग.’

पुरुषोत्तम जी ने भी कबीर को ऐसे मामलो में दोषी पाया है. वे लिखते हैं- ऐसे प्रसंगों में कबीर को याद नहीं रहता कि नारी की छाया मात्र से भुजंग अन्धे हो जाते हैं. … आगे वे इसे प्रेमालोक की स्थितियां बताते हुए लिखतें हैं कि- अपनी कमजोरियों को नारी पर थोपने वाले पुरुष दर्प के अंधकार को गला देने वाले प्रेमालोक की. यहां तक तो बात उचित है कि कबीर को स्त्री को असम्मानजनक पद से नहीं नवाजना चाहिए, पर यह प्रेमालोक क्या हुआ भला, इसमें पुरूष दर्प का अंधकार जरा भी नहीं गला है. पुरुष दर्प तो उसी अंधकार में फुफकार रहा है.

पुरूषोत्तम जी कहां और जाने क्यों प्रेममार्गी बनाने पर तुले हैं, स्त्री को तो वह सोलहों आने 'पुरूषमार्गी दिख रहे हैं.

स्त्री को न ऐसा मालिक प्रेमी चाहिए, न मालिक कंत. पुरूषोत्तम जी की ही भाषा में कहा जाए तो यह कि “ सभी परम्पराएं उस स्त्री से कमाबेश आतंकित लगती है जो देह और देवी की बजाय व्यक्ति होना चाहे. यही भय है जो नियंत्रण की मांग को पवित्रता के विमर्श में संवार कर पेश करता है. स्त्री की सेक्सुएलिटी को या तो देवीपन के जरिए हानिरहित-हार्मलेस बनाने की कोशिश करना है या फिर कामिनीपन के जरिए स्त्री की सेक्सुएलिटी को ऑबजेक्ट में तब्दील कर देता है. स्त्री अगर स्वयं अपनी सेक्सुएलिटी को- उसके उदात्त और और स्थूल आशयों की कर्ता स्वयं हो तो सभ्यता खतरे में पड़ जाती है, सांस्कृतिक मूल्यों का संकट खड़ा हो जाता है.”

स्त्री के लिए पुरूष का दिया ‘कामिनी ’ शब्द एक अपशब्द से अधिक कुछ नहीं है क्योंकि यह उसे मात्र देह के रूप में रिड्यूस करके एक 'प्रोडक्ट’ बना देता है. स्त्री पुरुष सत्ता और वर्चस्व के लिए इसी कामिनीपन की तर्ज पर ‘कमीनापन’ पद का चुनाव करती है. स्त्री कहे तो अपशब्द और पुरूष कहे तो आभूषण यह विरोधाभास ज्यादा दिन चलने वाला नहीं है. अच्छा वही है जो पुरुषोत्तम जी ने मिलान कुंडेरा के उपन्यास 'इम्मोरटेलिटी’ में आए एक कथन के माध्यम से कहा है. मैं उसे यथावत् दोहरा रही हूं- “स्त्री ही मनुष्य का भविष्य है- मतलब 'यह कि जो दुनिया पुरूष की छवि में रची गई थी, अब स्त्री की छवि में रुपांतरित होने को है. दुनिया जितनी तकनिकी यांत्रिक, ठंडी और धानुवत होती जाएगी, उस ऊष्मा की जरूरत उतनी ही बढ़ती जाएगी जो उष्मा केवल स्त्री दे सकती है. यदि हम दुनिया को बचाना चाहते हैं तो हमें स्त्रीत्व अपनाना होगा. स्त्री की अगुवाई स्वीकारनी होगी. शाश्वत स्त्रीत्व को अपने आप में व्यापने देना होगा.”
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

संपादक, रविवार

 
  इस आलेख पर आने वाली अन्य प्रतिक्रियाओं को आप 'सभी प्रतिक्रियाएं पढ़ें' को क्लिक कर के देख-पढ़ सकते हैं. 
   
 

krishnabiharai (krishnatbihari@yahoo.com) (abudhabi)

 
 मैने कुछ प्रतिक्रियायें देखीं. इंटरनेट के पाठकों के साथ ये सबसे बड़ी समस्या है कि ज़िंदगी में जह उन्हें पढ़ना था तब बहुत कम पढ़ा और जब तकनीक विकसित हुई तो वे अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी समझने लगे.

कबीर की हत्या आपके लेख या इन बेहूदे प्रतिक्रियाओं की जंग लगी तलवारों से वैसे ही नहीं होगी, जैसी कभी कर्ण ने देवेंद्र इंद्र को अर्जुन के लिए कहा था- जीत सकेगा मुझे नहीं वह और किसी विधि रण में, कर्ण-विजय की आस तड़प कर रह जायेगी मन में....और पार्थ यदि बिना लड़े ही जय के लिये विकल है, तो कहता हूँ, इस जय का भी एक उपाय सरल है, कहिए उसे, मोम की मेरी एक मूर्ति बनवाए, और काट कर उसे, जगत मे कर्णजयी कहलाए...
कबीर को दुत्कारोगे तो तुम्हारे हाथ में अंधेरा भविष्य होगा.
 
   
 

giriraj kiradoo

 
 गीताश्री से या किसी से भी यह अपेक्षा करना कि वो कविता/साहित्य को अधिक संवेदनशीलता से पढ़े ठीक ही है. लेकिन इस तर्क को अगर चरम तक ले जाया जाये तो साहित्य का पठन-आलोचन सिर्फ विशेषज्ञों का फील्ड रह जायेगा. जबकि साहित्य की अद्वितीयता ही यह है कि वह हर मनुष्य को अपने से सम्बन्ध बनाने देता है और हर मनुष्य से सम्बन्ध बनाता है. हम शायद हाइजेनबर्ग के अनिश्चितता सिद्धांत या क्वांटम थियरी के बारे में बिना विशेषज्ञ हुए बात नहीं कर सकते लेकिन साहित्य की सुंदरता उसकी वध्यता यही है कि उसके बारे में हम ऐसा कर सकते हैं. एक स्त्रीवादी एक्टिविस्ट और एक पत्रकार अगर कबीर से अपना कोई सम्बन्ध बना रही है, चाहे वह नेगेशन का हो, यह अच्छी बात होनी चाहिए कबीर-प्रेमियों के लिए. सबकी वाट लगाने वाले कबीर तो इस लड़की से खुश ही हुए होते. एक भारतीय परंपरा वह भी है जो कबीर और उनके जैसे लोगों ने बनाई है: जो अपने विवेक को समझ में आये वही कहो और उसे ही स्वीकार करो. गीता का लेख कबीर-जैसी परंपरा में ही है.  
   
 

सुधा दिल्ली

 
 यह जो चर्चा चल रही है इसमें सबसे मजेदार बात यह है कि किसी ने वह किताब पढ़ी ही नहीं है, जिसके बहाने चर्चा की जा रही है। स्वयं गीताश्री ने बस दो अध्याय 'अकथ कहानी प्रेम की' से पढ़े हैं, और उनकी बातों से जाहिर है कि न तो कबीर की कविता उनके पल्ले पड़ी है, और न पुरुषोत्तम अग्रवाल की किताब। यह किताब बेहद विचारोत्तेजक और महत्वपूर्ण किताब है, जिसे ध्यान से पढा जाना चाहिए। कबीर उपदेश के धरातल पर नारी निन्दा करते हैं, लेकिन संवेदना और साधना के धरातल पर स्वयं नारी का रूप धारण करते हैं,नारी की आवाज अपनाते हैं। पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कवि के इस सर्जनात्मक अंतर्विरोध पर बहुत ही संवेदनशील और तार्किक ढंग से विचार किया है, और बात को सभ्यता समीक्षा के व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखा है। वे लिखते हैं, "स्वयं को सभ्य कहने वाली परंपराएं उस स्त्री से कमोबेश भयभीत लगती हैं, जो देह और देवी की बजाय व्यक्ति होना चाहे।" इस के बरक्स, पुरुषोत्तमजी के शब्दों में, "कबीर की नारी संबधी दृष्टि में फाँक इसलिये सर्जनात्मक है कि यहाँ हम संस्कार का रूप ले चुकी विचारधारा के सामने सहज मानवीय संवेदना और बोध को पूरी तेजस्विता के साथ खड़ा होते देखते हैं। स्वयं साधना के धरातल पर द्वंद्व है--नारी निन्दा की रूढ़ि और नारी रूप धारण करने की युक्ति के बीच। यह द्वंद्व जो कबीर को परंपरा से ही प्राप्त है--कबीर की कविता में और भी रोमांचक बन जाता है--उनकी स्वाभाविक पारदर्शिता और अद्वितीय काव्य-क्षमता के कारण।"
निवेदन यही है कि पुरुषोत्तम अग्रवाल के काम के बारे में राय गीताश्री की बेहद सपाट और संवेदनहीन रीडिंग के आधार पर न बनाई जाए, दोनों की कबीर विषयक मान्यताओं, साहित्य को पढ़ने के ढंग में जमीन आसमान का फर्क है--यह पुरुषोत्तम की किताब स्वयं पढ़ने वाले किसी भी व्यक्ति को फौरन समझ आ जाएगा।
कबीर हों या पुरुषोत्तम किसी भी कवि या विचारक का इतना हक तो बनता है, कि उसके बारे में राय आप उसे पढ़ कर बनाएं, हवा में तलवार भाँजने से क्या फायदा?
अंत में, 'अकथ कहानी प्रेम की' से, पुरुषोत्तम का एक और उद्धरण जो इस चर्चा को पटरी पर लाने में बहुत मददगार साबित होगा--"कबीर की संवेदना से मनमाफिक टुकड़े खींच भागने की बजाय यदि उसे समग्रता में ग्रहण किया जाए, तो यह देखना मुश्किल नहीं है कि प्रेम ही उनका प्रस्थान है, और प्रेम ही उनका प्रतिमान। अपने प्रेम-संज्ञान से ही कबीर दुनिया को देखते-परखते हैं। उनका 'निज ब्रह्म विचार' हो या उनकी सामाजिक आलोचना, उनके अनुभव और अनभय प्रतिमानों की गंगा-जमुना को सींचने वाली अन्त:सलिला, कबीर की सरस्वती है--प्रेम।"
 
   
 

pragya (pandepragya30@yahoo.co.in ) lucknow

 
 आज तक कबीर को हमने जाने कितने विशेषणों का पर्यायवाची जाना था ....यह भी कबीर ने ही लिखा कि निंदक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय ! कबीर को बार बार नमन है!
 
   
 

PRASOON SINHA (prasan.sinha@gmail.com) MUMBAI

 
 कबीर को समझने के लिये उनके समय के सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता. कबीर के सारे व्यक्तिवाद को महज उनके द्वारा रचित चंद दोहों से अपने मन मुताबिक व्याख्या कर के कबीर के सारे किये कराये पर पानी फेर देने की तरह है, जो हिंदुस्तानी तहजीब का भी मजाक उड़ाने से अधिक कुछ नहीं है. कबीर के दोहों का विस्तार न देख, उसको संकीर्ण बताना, अपने को प्रगतिवादी कहना, मानसिक विकृति के सिवा कुछ नहीं है. आपलोग कुछ और देखें और लिखें. कबीर को जब तक कबीर की नज़र से न देखा जाये, तब तक बहस बेकार है. 
   
 

pranav saxena (pranyani@gmail.com) bhopal

 
 ये दुनिया क्षणभंगुर है हर पल भाव बदलते हैं और पुराने परिवर्तित हो जाते है, कबीर दास जी ने कुछ कहा फिर वो पल बीत गया अब वे भाव ही नहीं रहे जो कि पहले थे पर वे परिवर्तित भाव नहीं लिखे गये अब हम वो ही पुराने भाव पकड़ कर बैठ गये और कबीरदास जी हो गये पुरूषमार्गी, ये हास्यास्पद है ...।
 
   
 

जी.के. अवधिया रायपुर

 
 प्रेममार्ग में स्वयं को ईश्वर की कामना करने वाली नारी मानने की परम्परा रही है। इस दृष्टि से कबीर ने जो कुछ भी लिखा है वह सामान्य नारी के लिये नहीं बल्कि स्वयं के लिये है क्योंकि अपने इष्ट के विरह के कारण है।

अब यदि कोई अर्थ का अनर्थ निकालना चाहे तो क्या किया जा सकता है?
 
   
 

प्रियंकर कोलकाता

 
 पुरुषोत्तम जी तो ठीक ही समझे हैं . कन्‌फ्यूज़न आपके हिस्से आया है . उत्कट-विकट नारीवाद के घोड़े से उतर कर जरा इस पर भी विचार करिये कि कबीर ने पुरुष को संबोधित कर 'कामी नर को अंग' के अंतर्गत दर्ज़नों साखियां लिखी हैं . उन्होंने 'कामी नारी को अंग' जैसा कुछ क्यों नहीं लिखा ? क्या नारी में काम नहीं होता ? और क्या कबीर को यह नहीं पता था कि नारी में भी काम-वासना होती है ? और कबीर के यहां यह कंत कौन है ? कबीर को पता था कि वे क्या लिख रहे हैं और क्यों लिख रहे हैं. कबीर को पता था कि गड़बड़ कहां है और क्या है .

विद्वान समालोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल को भी पता है कि वे क्या लिख रहे हैं. वे अनावश्यक कबीर के पक्ष या बचाव में खड़े नहीं होते. वे पूरी विनम्रता से इसे कबीर के संस्कार और उनकी काव्य संवेदना के द्वंद्व के रूप में समझने का प्रयास करते हैं. रचनात्मक विवेक से भरे-पूरे उनके अध्ययन का अच्छा नारीवादी कुपाठ तैयार किया है आपने. भक्ति की परम्परा और काव्य रूढि के संबंध को समझे बिना कबीर को पुरुषवादी ठहरा देना एक किस्म का प्रायोजित अध्ययन है .

वैसे संत कवियों में नारी के बारे में सबसे साफ समझ दरिया(दरियाव) साहब की दिखाई देती है :

नारी जननी जगत की पाल पोष दे पोस।
मूरख राम बिसारि कै ताहि लगावै दोस।।

नारी आवै प्रीतिकर सतगुरु परसे आण।
जन दरिया उपदेस दै मांय बहन धी जाण।।

और ये दरिया साहब न केवल कबीर को बहुत सम्मान से याद करते हैं,बल्कि अपने को कबीर का अवतार भी घोषित करते हैं. भारत में परम्परा का शोधन इसी तरह होता है,पश्चिम के नारीवाद की तर्ज़ पर नहीं.
 
   
 

परमजीत बाली दिल्ली

 
 मीरा ने एक बार कहा था कि सिवाये कृष्ण के कोई दूसरा पुरूष नही है.....अब साधक की बात तो साधक ही जान सकता है....क्योकि हम शब्दो को पकड़ सकते हैं लेकिन शब्दो के भीतर छुपे भाव को पकड़ना शायद आज हमारे लिए मुश्किल हो गया है...इस विरोध के पीछे यही दीख रहा है.... 
   
 

अंशुमाली रस्तोगी (anshurstg@gmail.com) बरेली

 
 गीताश्रीजी, जरा बताइए, यह प्रयोजित लेख चर्चा पुरुषोतम अग्रवाल की प्रशंसा में लिखा गया है याकि कबीर की विचारधारा को नीचा दिखाने के लिए?
 
   
 

शशिभूषण (gshashibhooshan@gmail.com)

 
 आलोच्य किताब तो मुझे मिली नहीं सो मैं आपके हवाले से ही कहूँगा.पहली बात तो जो भी कबीर को स्थापित करने या उनकी आलोचना करने के प्रयास में हो वह यह नहीं भूले कि यह अकादमिक प्रयास है.इन प्रयासों से ज़्यादातर विद्वान लाभ उठाते हैं.कबीर हजारी प्रसाद द्विवेदी से भी बहुत पहले से लोक के साथी हैं.लोक को कबीर को अपनाने का अभ्यास है.तो पहली अकादमिक स्थापना संबंधी भूल सुधार की कबीर का रास्ता ज्ञान का है.वे ज्ञानमार्गी हैं.उनका प्रेम साधना से जुड़ा है.फिर उनकी स्त्री बनने संबंधी स्थितियाँ तत्कालीन योगपरक साधना से संबंध रखती है.कबीर सिद्धों नाथों के करीब हैं इस मामले में सो उनकी बहुत सी बातें रूपक है.

स्त्री के संबंध में कबीर अपने युग से बड़े नहीं हैं.किसी के भी बारे में ताल ठोककर कहा जाए कि पूरी तरह लिंग और युग का अतिक्रमण कर गए हैं तो समझिए इस उक्ति में कविताई है. स्त्रियाँ भी पुरुषों के बारे में राय बनाते हुए अपना अतिक्रमण नहीं कर पातीं.मीरा भी नहीं कर पाईं.वह मशहूर नृत्यांगना भी नहीं कर पाई जो कहती है कि जब तक दर्द रहित प्रसव की व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक सारी वैज्ञानिक उपलब्धियाँ झूठी हैं.

आपके लेखन में जो आक्रामकता है यह युग की ही देन है.मैं आपके लाख इंकार के बावजूद इसकी तुलना कबीर के अस्वीकार के साहस से ही करूँगा.कबीर गृहस्थ थे.अपनी बुनी हुई चादर ओढ़ते थे.उसे मलिन नहीं होने देते थे. गृहस्थी की चिंता करना अगर स्त्री विरोध समझा जाए तो मैं इसे दुरुस्त करने की सलाह दूँगा.

साईं इतना दीजिए जामें कुटुम समाय
मैं भी भूखा न रहूँ साधु न भूखा जाय

यहाँ से भी कबीर को देखिए.यह घर की चिंता है जिसमें स्त्री,बच्चे हैं.धन-गृह के प्रति कबीर का यह विचार उनका जीवन है लफ्फाजी नहीं.

मैं पुरुष हूँ.अब यह झूठ नहीं हो सकता.मुझे स्त्रियों का साथ पुरुषों से ज़्यादा भावात्मक लगता है.पर मुझे पता है स्त्री के साथ होना पूरी तरह होना होता है.उसकी याद,साथ सब ओर से खींच लेते हैं.कोई इमानदार आदमी स्त्री को ठगकर कंगाल ही हुआ है.पर मैं ही अपने कठिन श्रम के क्षणों में स्त्री को सोचकर स्थगित होने से बचता हूँ.यह सच इस युग के पुरुष तक चला आ रहा है जब किसी भी संबंध-रिश्ते को जीवन मरण का सवाल नहीं माना जाता .

कबीर के साधना-मार्ग में स्त्री-विरोध को इस नाजुक सिरे से भी देखा जाए. उदारता,त्याग,समर्पण बड़े गुण हैं सब स्त्री पुरुषों में न पाए जाते हैं न पाए जाएँगे.जिसका जो हक़ है मिले.पुरुषोत्तम जी को प्रसिद्धि मिले.मैं तो कबीर का सीना चाहता हूँ.
 
   
 

krishnabihari (krishnatbihari@yahoo.com) abudhabi

 
 गीताश्री जी,

एक व्यक्ति के जीवन दर्शन को 2-4 दोहों की मदद से नहीं समझा जा सकता. कबीर जितना बड़ा सामाजिक चिंदक अब तक तो नहीं हुआ. उतना साहसी भी नहीं हुआ कोई दूसरा. कबीर होने के लिए कबीर होना होगा. ज़रा धीरे बोलिए - चींटी के पग नूपुर बाजे वह भी साहब सुनता है. ना तो परुष गुणों की खान है ना स्त्री सर्वगुण संपन्न. चर्चा को कुचर्चा मत बनाएं.

कृष्णबिहारी
 
   
 

अशोक कुमार पाण्डेय (ashokk34@gmail.com)

 
 ओह तो क्या कबीर ने अपने पाठ पर गैर मार्क्सवादियों (या सीधे संघियों कह लूं) को कोई कापीराईट दे रखा है जिसे समझने के लिये सर पर मुसोलिनी की टोपी पहनना ज़रूरी हो!
बेहतर हो कि जार्गनबाजी की जगह वैकल्पिक पाठ या अपनी व्याख्या प्रस्तुत कर प्रतिवाद करें!
 
   
 

amit (amittyagee@gmail.com) delhi

 
 ऐसा लगता है कि दोष कबीर का नहीं उन्हें समझने की कोशिश करने वाले का है. कबीर ने अगर वाकई ऐसा कुछ कहा है तो वाकई कबीर भी उसी जमात में खड़े हो गए जहां ये पुरुष मानसिकता प्रधआन समाज है. और कम से कम कबीर जैसे सुधारक से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती.  
   
 

सुनयन नई दिल्ली

 
 आपका लेख बहुत चौंकाने वाला है और सच में पहली बार कबीर को पढ़ते हुए मुझे भी लगा कि ...तो अब कबीर भी !... जैसे-जैसे पढ़ती गई, आपकी धारणा को लेकर आश्वस्त होती गई. आपसे इसी तरह के आलेख की उम्मीद करता हूं. 
   
 

sarvapashyami मुंबई

 
 अकथ कहानी प्रेम की, कुछ कही न जाये, गूंगे केरी सर्करा, बैठे मुस्काए...
Just as someone who cannot speak eats sweets but sits and smiles enjoying the feeling without being able to express it, the story of love (between seer and seen)cannot be told.

It is a matter of deep inner experience which cannot be understood by someone telling or someone listening,; it can only be experienced.It cannot be known or told by the gross five senses and human faculties.Kabir also distinguishes Bhakti Marg from the Gyana marg here .
 
   
 

सुधीर कुमार सिंह (sk_singh2008@yahoo.co.in) नई दिल्ली

 
 कबीरदास की उल्टी बानी, बरसे कंबल भीगे पानी.... गीताश्री और पुरुषोत्तम अग्रवाल दोनों को ही इसका अर्थ बताना चाहिए.

आप दोनों ही कबीर का घटिया मार्क्सवादी पाठ कर रहे हैं. कबीर ने दोहों को उस अर्थ में नहीं कहा है, जैसी व्याख्या आप दोनों ने की है. यह कबीर का सबसे घटिया पाठ है. कबीर को समझना हो तो पहले भारतीय मनीषा, उसकी चेतना, उसका स्व... इन सबको समझना होगा. कबीर को गोलगप्पा खाते हुये और सिर पर रुसी टोपी पहने कर नहीं समझा जा सकता.

आश्चर्य की बात है कि लेखिका इस किताब को एक प्रस्थान बिंदू मान रही हैं, जबकि इस आलेख को पढ़ते हुए समझ में आ रहा है कि यह किताब एक कथित मार्क्सवादी प्रगतिशील लेखक का एक खराब मार्क्सवादी पाठ है.
 
   
 

Ramadhar Tiwari फ्रेजर रोड, पटना.

 
 पता नहीं पुरुषोत्तम अग्रवाल जी ने क्या लिखा-पढ़ा है. लेकिन आपके आलेख को पढ़ते हुए जो समझ में आता है, उससे तो लगता है कि पुरुषोत्तम जी को फिर से कबीर पढ़ना होगा.कबीर को पुरुषोत्तम जी बड़े रुढ़ अर्थ में देख पढ़ रहे हैं या रुढ़ अर्थों में पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. उनके स्त्रीवादी तर्क पश्चिम के उन अपढ़ लोगों को तो जंच जाएंगे, लेकिन भारतीय दर्शन परंपरा में इसे गंभीरता से तो नहीं ही लिया जायेगा. 
   

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