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नए टेलीविजन की ताकत

बात पते की

 

नए टेलीविजन की ताकत

प्रीतीश नंदी


टेलीविजन ने बरसों पहले से ही मुझमें कोई उत्साह जगाना बंद कर दिया था. उसे मैं तकनीकी रूप से पिछड़ी और गुजरे जमाने की चीज मानता था. टीवी का हर संप्रेषण बस एकतरफा था. आप बैठकर अपने ऊपर उड़ेली जा रही चीजों पर नजरें गड़ाए रहते, कोई बातचीत नहीं होती. टीवी की स्क्रीन जीवित नहीं हो सकती थी. चैनल अपनी सुविधा से कार्यक्रम दिखाते, रोमांचक क्षणों में विज्ञापन आने लगता और मजा किरकिरा हो जाता. इंटरनेट के इस युग में टेलीविजन मुझे वैसे ही पुरातनपंथी और इतिहास की चीज मालूम देता, जैसे कि ट्विटर के इस युग में पिंजड़े में बंद कबूतर.

टीवी के कार्यक्रम इतने बोझिल और उबाऊ होते थे कि वे अनिद्रा के रोगियों को भी सुला दें. चटर-पटर सीरियलों की अतिशय दुखदायी खुराक और पागलपन की हद तक खिंचने वाले समाचारों ने आखिरकर मुझे उससे दूर कर दिया. मैं फिल्मों और इंटरनेट की ओर मुड़ गया. कोई और विकल्प ही नहीं था. टीवी उतना ही बड़ा बुद्धूबक्सा था, जितना कि मुमकिन था. हर कोई आगे निकलने की दौड़ में दूसरे का पीछा कर रहा था और कोई भी कार्यक्रम बनाते समय जो एकमात्र कोशिश होती, वो यही कि कैसे हम भी उतना ही मूर्खतापूर्ण कार्यक्रम तैयार करें और बुद्धूबक्से की बुद्धिहीनता को और-और मजबूत करते जाएं.

ये सभी कार्यक्रम एक-दूसरे की भूतहा नकल थे और इनकी असहनीय मूर्खताएं बीमार करने वाली थीं. लेकिन कुछ लोगों का कहना था कि हर घर में ऐसे पर्याप्त कुंदजेहन लोग थे, जो उस बुद्धूबक्से से चिपककर बैठने के लिए तैयार रहते थे और टीवी के हर दृश्य और बोले जा रहे हर वाक्य को अपने भीतर जज्ब करते जाते थे. इसलिए इस विचार से सहमति न रखने वाले लोग, इसके बावजूद कि वे संख्या में काफी ज्यादा थे, अपना मुंह बंद किए रखते.

उसके बाद कुछ साल पहले चीजें अचानक बदलने लगीं. इस बदलाव की शुरुआत हुई रिएलिटी शोज के साथ. उनमें से ज्यादातर विदेशी कार्यक्रमों की नकल थे. लेकिन कौन परवाह करता है कि मूल कार्यक्रमों का स्वरूप कैसा था? लगभग हर कार्यक्रम ने दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया, क्योंकि उन्होंने वही पिटे-पिटाए, उबाऊ, जरूरत से ज्यादा सजे-धजे, तड़क-भड़क वाले टीवी सितारों की भीड़ नहीं दिखाई और न ही विद्रोही, इंकलाबी पत्रकारों का तामझाम. बल्कि इन कार्यक्रमों में ऐसे सामान्य लोग थे, जो अपनी पहचान तलाश रहे थे.

उनमें से बहुत से युवा लड़के-लड़कियां भारत के छोटे शहरों से आए थे. वे गायक, नर्तक, खतरों के खिलाड़ी, हास्य कलाकार और फिल्मी सितारे होना चाहते थे. वे चाहते थे कि हम और आप उन्हें स्वीकारें और अपना समर्थन दें. यद्यपि वहां भी वही पुराने उबाऊ सेलिब्रिटी जज होते थे, लेकिन आप अपनी पसंद के अनुसार वोट दे सकते थे. हममें से लाखों लोगों ने ऐसा किया और अचानक हम और ज्यादा से ज्यादा आम लोगों और चेहरों को हमारे लिए अनोखे करतब और कलाकारी दिखाते टेलीविजन के पर्दे पर देखने लगे.

यही चीज है, जिसने टेलीविजन को एक बार फिर से परिभाषित किया. कई बार आप टेलीविजन के सामने बैठे देखते कि कुछ युवा अपना ही मजाक बना रहे हैं. कई बार आप ऐसी आश्चर्यजनक प्रतिभाओं को देखकर अभिभूत हो जाते, जिनके पीछे कोई पृष्ठभूमि नहीं थी और जो यूं ही कहीं से नमूदार होकर लाखों दर्शकों के सामने समूचे आत्मविश्वास से अपना झंडा गाड़ देते. बिलकुल अचानक उन लोगों के लिए अवसरों के असंख्य द्वार खुल गए, जिनके भीतर प्रतिभा थी, जो उसे देश के सामने लाना चाहते थे, लेकिन कभी नहीं जानते थे कि ये कैसे मुमकिन होगा.

टेलीविजन के बगैर बहुत से लोग उन लोगों के द्वारा चुपचाप दबा और खत्म कर दिए जाते, जो सत्ता और ताकत के आसनों पर विराजमान हैं. लेकिन अब ऐसा करना आसान नहीं.

आज वे अपनी उन्हीं प्रतिभाओं के बलबूते अपना कॅरियर बनाने के सपने देख रहे थे. सैकड़ों डांस स्कूल खुल गए. उसी तर्ज पर अभिनय, गायन और व्यक्तित्व विकास की कक्षाएं. नौजवान भारतीयों की नई पीढ़ी यह विश्वास करने लगी कि अगर वे पूरी जान लगाकर बेहतर काम करें तो वे जो भी चाहें, उसे हासिल कर सकते हैं. यह आस्था, भरोसे और आत्मविश्वास का नवीनीकरण था.

मेरे अनुसार यह हमारे टेलीविजन का सबसे ज्यादा स्थाई और प्रबल योगदान है. टीवी ने अब संगीत, पत्रकारिता और ललित कलाओं को एक नई चमक दी है, नई राह खोली है. राखी सावंत या राहुल महाजन को भूल जाइए. वे ऐसे गड्ढे हैं, जहां धूर्त और मूर्ख झूठी जीत के लिए एक-दूसरे को पूरा करते रहते हैं. लेकिन आज की तारीख में ऐसे ढेर सारे टैलेंट शो हैं, जो हमें बिलकुल भौचक और नि:शब्द कर देते हैं. उनमें से अधिकांश शो में बिलकुल अनजाने चेहरे हैं. जैसाकि होता ही है कि सभी चैनलों में सबसे ऊपर पहुंचने के लिए होड़ मची रहती है और कोई शो एक हफ्ते से ज्यादा नहीं चल पाता, इसलिए सभी शो ज्यादा से ज्यादा तीखे, मजेदार और रोचक होते हैं. ये शो उनको भी टीवी तक वापस लेकर आ रहे हैं, जो बहुत समय पहले ही टीवी देखना छोड़ चुके हैं.

मैं महसूस करता हूं कि न्यूज चैनलों पर भी अब ज्यादा रोचक कार्यक्रम आते हैं. पुरानी उबाऊ चीजें भी जारी हैं, लेकिन धीरे-धीरे नई चीजों के लिए भी जगह बन रही है, जहां पुरानी कहानियों को भी नई जिंदगी मिल रही है. टेलीविजन के बगैर बहुत से लोग उन लोगों के द्वारा चुपचाप दबा और खत्म कर दिए जाते, जो सत्ता और ताकत के आसनों पर विराजमान हैं. अब ऐसा करना आसान नहीं. यहां तक कि 26/11 के हमले ने भी टीवी का जबर्दस्त प्रभाव दिखाया. यद्यपि कानूनों को बलपूर्वक लागू करने वाले लोग शिकायत करते रहते हैं कि कैसे टीवी कवरेज ने षड्यंत्रकारियों को हमारे हर कदम की जानकारी और उस पर निगाह रखने का मौका दिया, लेकिन उसी टीवी ने एक बेचैन, उत्सुक राष्ट्र को ठीक-ठीक यह जानकारी भी दी कि जमीनी स्तर पर क्या हो रहा था. उन्होंने अपनी आंखों से यह सब देखा. अफवाहें फैलाने वाले बेदखल हो गए. इसके पीछे षड़यंत्र का कोई सिद्धांत नहीं चल रहा था.

अब सबसे बेहतरीन कार्यक्रमों और समय को हथियाने नए-नए चैनल आए हैं. पुराने चैनल अधर में हैं, पिछड़ रहे हैं और हाशिए पर जा रहे हैं. इस उलटफेर ने टीवी को ज्यादा रोचक और मजेदार बना दिया है, जितना रोचक वह पहले कभी नहीं था. लेकिन मुझे जो बात सबसे ज्यादा पसंद है, वह यह कि अब हमें अपने युवाओं के लिए एक वास्तविक और स्थाई मंच मिल गया है, जहां वे पूरे देश के सामने अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं.

यह आगे चलकर हमारे मनोरंजन उद्योग का चेहरा बदलेगा. उसे ज्यादा प्रतिस्पर्धात्मक और व्यापक बनाएगा. पिछली रात जब म्यूजिक का महा मुकाबला कार्यक्रम में शंकर महादेवन ने 15 साल की अन्वेषा को श्रेया घोषाल के बाद सर्वश्रेष्ठ गायिका कहा तो यह भी एक बंधन को तोड़ना था. वही अन्वेषा दत्त गुप्ता छोटे उस्ताद के फाइनल में हार गई थी, लेकिन जीवन (एक दूसरे रिएलिटी शो में) ने उसे फिर से वहां पहुंचाया, जिसकी वह हकदार थी.

26.02.2010, 11.25 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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