तालिबानी कुएं और सेना की खाई
बहस
तालिबानी कुएं और
सेना की खाई
राम पुनियानी
भारतीय मीडिया में ऐसी खबरें आईं हैं कि पाकिस्तान में पेशावर के नजदीक खैबर और
ओराकज़ी इलाके में तालिबानी अतिवादियों ने दो सिक्खों की हत्या कर दी है. कत्ल किए
गए लोग, सिक्खों के एक जत्थे का हिस्सा थे. इन सभी को लगभग एक माह पहले, तालिबानियों
ने अपह्त कर लिया था. इन्हें छोड़ने के लिए तीन करोड़ रूपये की फिरौती की मांग की गई
थी और फिरौती चुकाने की अंतिम तारीख निकल जाने के बाद इनमें से दो की हत्या कर दी
गई. समूह के दो अन्य सदस्य, गुरविन्दर सिंह और गुरजीत सिंह अभी भी तालिबानियों की
गिरफ्त में बताए जाते हैं.
ऐसी भी खबरें हैं कि इन दो सिक्खों को इसलिए मार डाला गया क्योंकि उन्होंने मुसलमान
बनने से इंकार कर दिया था. भारत सरकार ने तालिबानियों की इस क्रूरतापूर्ण कार्यवाही
पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. भारत के कई राजनैतिक दलों और अनेक मुस्लिम
बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी तालिबानियों की इस निर्मम हरकत की
जमकर आलोचना की है.
मुस्लिम बुद्धिजीवियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा जारी एक संयुक्त बयान में कहा
गया है, ''निर्दोष नागरिकों को मारने की इस अमानवीय और गैर-इस्लामिक कार्यवाही ने
एक बार फिर आतंकवादियों के असली चेहरे को बेनकाब कर दिया है. उनका एकमात्र उद्धेश्य,
शांति और दया के धर्म इस्लाम के नाम का दुरूपयोग कर अपने कुत्सित इरादों और लक्ष्यों
को पूरा करना है. वे भौतिक सुखों की अपनी लिप्सा को पूरा करने के लिए मासूम नागरिकों
का खून बहा रहे हैं.
ये वे लोग हैं जो इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं और दुनिया के सभी मुसलमानों को कटघरे
में खड़ा कर रहे हैं. कोई भी सभ्य और सच्चा मुसलमान, धर्म के नाम पर निर्दोषों को
मारने को उचित नहीं ठहराएगा. हर इस्लामिक राज्य का यह पवित्र कर्तव्य है कि वो अपने
देश में रहने वाले अल्पसंख्यकों के जीवन और संपत्ति की रक्षा करे और उन्हें
अत्याचारों और अन्याय से बचाए. पाकिस्तान में रह रहे सिक्खों पर लगातार हो रहे हमलों
और अत्याचारों की खबरें गंभीर चिंता का विषय है और हम यह मांग करते हैं कि
पाकिस्तान का नागरिक समाज, धार्मिक नेतृत्व और शासन इस समस्या की ओर जल्दी से जल्दी
ध्यान दे.
इस दुखद घटना का एक पहलू यह भी है कि ये हत्याएं भारत और पाकिस्तान के बीच, 25 फरवरी
से शुरू होने जा रही सचिव स्तर की वार्ताओं के ठीक पहले हुईं. पाक-भारत रिश्तों को
बेहतर बनाने के प्रयासों और इस तरह की पागलपन की हरकतों के बीच हमेशा से अंतरसंबंध
रहा है. इससे भारत सरकार पर यह दबाव बनता है कि वो वार्ता करने से इंकार कर दे. इस
तरह के दुर्योग कई बार सामने आए हैं. अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा के
तुरंत बाद, परवेज़ मुशर्रफ के नेतृत्व वाली पाकिस्तान की सेना ने कारगिल इलाके में
घुसपैठ की थी. सेना की इस कार्यवाही की जानकारी तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ को
भी थी.
इसी तरह, आसिफ अली ज़रदारी द्वारा भारत के साथ रिश्ते सौहार्दपूर्ण बनाने के इरादे
को व्यक्त करने के कुछ ही दिन बाद, मुंबई में 26.11.2008 का आतंकी हमला हुआ था.
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वियतनाम में अपनी हार से अपमानित
अमरीका छाछ भी फूंक-फूंक कर पी रहा था. और सीधे अफगानिस्तान में
हस्तक्षेप नहीं करना चाहता था. इसलिए उसने मुस्लिम युवकों को आतंकवादी
बनाने का कार्यक्रम चलाया. |
यह साफ है कि पाकिस्तान में सत्ता के कई केन्द्र हैं. वहां की प्रजातांत्रिक सरकार
देश पर अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश कर रही है परंतु वहां की सेना और तालिबान
इस बात पर उतारू हैं कि पाकिस्तान में प्रजातंत्र की वापसी न हो, पाकिस्तान के समाज
के प्रजातंत्रीकरण की प्रक्रिया आगे न बढ़ सके और भारत-पाक रिश्ते न सुधरें. हमें
भारत सरकार की इस बात के लिए सराहना करनी होगी कि तालिबानियों की इस जानबूझकर की गई
भड़काने वाली कार्यवाही के बावजूद उसने संयम बनाए रखा. हमें अगर आज के पाकिस्तान को
समझना है तो हमें वहां की नागरिक सरकार और सेना-मुल्ला-तालिबान गठबंधन को अलग-अलग
करके देखना होगा.
सन् 1980 के दशक से ही पाकिस्तान में कई अलग-अलग शक्तियां सक्रिय हैं और इस स्थिति
का कुप्रभाव पूरे दक्षिण एशिया, विशेषकर भारत पर पड़ा है. हम सबको याद है कि किस तरह
अमरीका और मौलाना मौदूदी के गुट के मौलानाओं ने ज़िया-उल-हक को पाकिस्तान की राजनीति
में आगे बढ़ने में मदद की थी. मौलाना मौदूदी समय-समय पर पाकिस्तान के सैनिक तानाशाही
को मजबूत करने के लिए फतवे जारी करते रहते थे. इसके साथ ही अमरीका, पाकिस्तान में
स्थापित मदरसों को पूरी मदद दे रहा था.
इन मदरसों में मुसलमान युवकों के दिमागों में ज़हर भरकर उन्हें अफगानिस्तान पर काबिज
सोवियत सेनाओं से लड़ते हुए अपनी जान देने के लिए तैयार किया जाता था. वियतनाम में
अपनी हार से अपमानित अमरीका छाछ भी फूंक-फूंक कर पी रहा था. और सीधे अफगानिस्तान
में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता था. इसलिए उसने मुस्लिम युवकों को आतंकवादी बनाने का
कार्यक्रम चलाया.
यही वे आतंक थे, जिन्होंने अफगानिस्तान में रूसी सेना के खिलाफ लड़े गए युद्ध में
मदद की और बाद में अल्-कायदा के झंडे तले, दक्षिण एशिया में आतंक के पर्याय बन गए.
उन्होंने भारत ही नहीं पाकिस्तान के नागरिकों का भी जीना हराम कर रखा है. वहां
नियमित रूप से आतंकी हमले होते रहते हैं और इन्हीं में से एक में वहां की भूतपूर्व
प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो मारी गईं थीं.
तालिबान और अल्-कायदा पाकिस्तान को कैंसर की तरह खा रहे हैं और इसका असर भारत पर भी
पड़ रहा है. पाकिस्तान आज अल कायदा-तालिबान द्वारा मचाए जा रहे आतंक और सेना की सत्ता
का प्रमुख केन्द्र बने रहने की महत्वाकांक्षा के बीच बुरी तरह फंस गया है. दुनिया
के इस क्षेत्र में फैली इस अराजकता के बीच भारत को शांत रहना चाहिए और उत्तेजक
कार्यवाही करने वालों के बुने जाल में नहीं फंसना चाहिए.
हमें यह साफ-साफ समझ लेना चाहिए कि वर्तमान स्थिति में भारत के हित में यही है कि
वो पाकिस्तान की नागरिक सरकार के हाथ मजबूत करे ताकि वो सेना की मनमानी और आतंकियों
की हिंसा से मुकाबला कर सके. यहां यह भी साफ कर देना उचित होगा कि तालिबान का
इस्लाम या उसकी शिक्षाओं से कोई लेना-देना नहीं है. इस्लाम, धार्मिक मामलों में
बलप्रयोग या जबरदस्ती की इजाजत नहीं देता. किसी भी व्यक्ति को जोर-जबरदस्ती से
मुसलमान बनाना इस्लाम को स्वीकार्य नहीं है. निर्दोष लोगों का खून बहाने को कुरान
घोर अनुचित ठहराती है.
जहां तक जज़िया का सवाल है, वह मुस्लिम-शासित इलाकों की गैर-मुस्लिम आबादी पर उन्हें
अनिवार्य सैनिक सेवा से मुक्त करने के बदले लगाया जाता था. यह टैक्स सामान्यत: लोगों
की आय का बहुत छोटा हिस्सा होता था और ज़कात से तो काफी कम होता था. ज़कात, मुसलमानों
के लिए अनिवार्य थी. आज जज़िया की बात करना बेमानी है और इस टैक्स के लिए
प्रजातांत्रिक समाज में कोई जगह नहीं है.
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या पाकिस्तान की नागरिक सरकार वहां के
प्रतिक्रियावादी और विघटनकारी तत्वों पर विजय हासिल कर सकेगी? भारत सरकार को बिना
किसी संकोच के पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की जानोमाल की रक्षा का मुद्दा पाकिस्तान
के समक्ष उठाना चाहिए.
27.02.2010,
01.35 (GMT+05:30) पर प्रकाशित