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तमाशबीनों का यह दौर

विचार

 

तमाशबीनों का यह दौर

प्रीतीश नंदी


हमें मनोरंजन बहुत अच्छा लगता है. जितने मूर्खतापूर्ण तमाशे और लटके-झटके होते हैं, हम उतने ही उसके इर्द-गिर्द जमा हो जाते हैं. लक्ष्मी मित्तल से लेकर लॉर्ड मेघनाद देसाई तक सभी बॉलीवुड के दीवाने हैं. बॉलीवुड की दुनिया और-और ज्यादा बड़ी, चमकदार और मूर्खतापूर्ण होती जा रही है. लेकिन कौन परवाह करता है? हम बॉलीवुड के आकार, पैमाने, ऊंचाई और लहीम-शहीम बजट के बारे में बढ़-चढ़कर बातें बनाने में लगे हुए हैं क्योंकि हमारी फिल्मों की जिंदगी कट-छंटकर सिर्फ एक-डेढ़ हफ्ते रह गई है और हाउसफुल होना तो उतना ही मुश्किल है, जितना कि एक सींग का जानवर.

हमारे त्योहार भी तमाशा बनते जा रहे हैं. आस्था और धर्म से उनका कुछ खास लेना-देना नहीं रह गया है. अब वे सिर्फ हुड़दंग, तमाशों और मौज-मजे के गिर्द ही घूमते हैं. ईश्वर के साथ किसी अंतरंग, आत्मीय वार्तालाप के लिए कोई स्थान नहीं रह गया है. कुछ है तो बस सजावटी-बनावटी परंपराएं और शोरगुल वाले पूजा-पाठ. राजनीति का भी यही सच है. आज पूरे राष्ट्र का सबसे बड़ा तमाशा हैं चुनाव. चुनावों के हफ्तों पहले से फिल्मी सितारे, गायक, तिरछी नजरों वाले हास्य कलाकार, कवि, संगीतकार और करिश्माई अपराधी भारत की विचारधारा को बेचने और उम्मीदवार दर्शकों को अपने मोहपाश में बांधने में जुट जाते हैं. हम कतई मुद्दों और सवालों पर वोट नहीं देते हैं. हम तमाशों के आधार पर वोट देते हैं. अगर आप अपने प्रचार में किसी सितारे को नहीं ला सकते तो आप चुनावी दौड़ से ही बाहर हो जाएंगे.

इन दिनों हम हर चीज को खेल और मनोरंजन में बदल रहे हैं. खेलों को ही ले लीजिए. क्रिकेट अब कतई एक शानदार आकर्षण से भरा, लेकिन शालीन वीरानी वाला खेल नहीं रह गया है, जैसाकि पहले कभी हुआ करता था. आज क्रिकेट किसी उत्सव या तमाशे की तरह है, जिसमें चीयरलीडर्स के सारे तड़क-भड़क और तमाम रंग घुले हुए हैं. क्रिकेट चौबीसों घंटे टीवी पर छाया हुआ है, ब्रांडिंग हो रही है, सौदे हो रहे हैं, लाखों डॉलर निवेश किए जा रहे हैं और (बेशक) गैरकानूनी जुआ भी चल रहा है. यहां तक कि गांव के मूढ़मति भी जानते हैं कि कहां सबसे ज्यादा पैसा बनाया जा सकता है.

इस सारे खेल के जो कर्ता-धर्ता हैं, वो महान फिल्मी सितारे, बिजनेसमैन और राजनेता हैं. खेल से जुड़ी जिस थोड़ी भी गतिविधि या भावना का दावा क्रिकेट करता है, आईपीएल ने उसे भी हमेशा के लिए खत्म कर दिया है. अब उसमें सिर्फ तमाशा ही तमाशा है और बड़ी चीजें दांव पर लगी हुई हैं. मेरा अनुमान है कि जल्द ही हम और भी बहुत से खेलों को लाभ की इसी राह का अनुकरण करते देखेंगे. इसका अगला चरण ये होगा कि जुए को वैधानिक बनाया जाएगा. बीसीसीआई के भयानक वारों को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि इसमें कोई दिक्कत होने वाली है.

हमारे यहां अर्थहीन घटनाएं सनसनीखेज तमाशा बना दी जाती हैं. यह तमाशा गंभीर मुद्दों और सवालों पर पर्दा डाल कर सबकुछ को बहुत प्रचलित, सतही, बुद्धिहीन मनोरंजन के स्तर पर ले आता है..

लेकिन इस समय पर्दे पर नया सबसे बड़ा तमाशा है बजट. बजट के हफ्तों पहले से मीडिया ने ऐसी हवा बनाई कि मानो यह पूरे वर्ष की सबसे बड़ी नाटकीय घटना है. बावजूद इसके बजट वाले दिन ऐसा कुछ भी नहीं होता, जिसने हमारी जिंदगियों को बेहतर बनाने के लिए उस पर कुछ असर डाला हो. हां, कई बार वह हमें बुरी तरह से तकलीफ जरूर पहुंचाता है, लेकिन फिर हम ये मान लेते हैं कि ये सब तो गंदी राजनीति का हिस्सा है और अपना जीवन बदस्तूर जीते रहते हैं. आप जितने चाहें उतने पत्थर फेंक सकते हैं, जितनी चाहें उतनी बसें जला सकते हैं. लेकिन उससे एक तिनके के बराबर भी बदलाव होने वाला नहीं है. बजट में लिए गए हर निर्णय के पीछे किसी को लाभ पहुंचाने का मकसद है.

कॉरपोरेट दुनिया के बड़े खिलाड़ी इस खेल को या तो सीधे खेलते हैं या फिर अगर ये मुमकिन न हो तो अपने सियासी मित्रों के माध्यम से खेलते हैं. ये मित्र अपने निर्णयों के लिए सभी जरूरी वैचारिक और सैद्धांतिक तर्क गढ़ लेते हैं. कोई कुंदजेहन ही इस बात पर विश्वास करेगा कि ये बजट आपके और हमारे लिए है. यह बजट उन लोगों के लिए है, जो सत्तारूढ़ पार्टी को सत्ता में बनाए रखने का काम करते हैं.

यह देखना बड़ा रोचक है कि कैसे एक घटना, जिसका कोई अर्थ ही नहीं है, वह इतना बड़ा सनसनीखेज तमाशा बन जाती है. सरकार की बड़ी पीआर मशीनरी अपने चमचे पत्रकारों के साथ मिलकर जो भी निर्णय लिया जा रहा है, उसके पक्ष में माहौल बनाने के लिए दिन-रात काम करती है. बजट के हफ्तों पहले आपको जोशोखरोश के साथ ऐसी बहसें खड़ी करते लेख दिख जाएंगे कि मुश्किल निर्णय देश के लिए कितने महत्वपूर्ण और निर्णायक हैं और सरकार को ऐसे निर्णय लेने से पीछे नहीं हटना चाहिए. जैसे-जैसे बजट का समय नजदीक आता है, इन कहानियों का सुर और-और ऊंचा होने लगता है.

इन चीजों पर बारीक नजर रखिए और आपको ठीक-ठीक पता चल जाएगा कि क्या हो सकता है. बजट के शुरुआती हफ्तों में ही सारे संकेत छिपे होते हैं. आखिरकार दूध की कीमतों से लेकर गुब्बारे पर टैक्स कम करने तक सबसे मूढ़ निर्णय ले लिए गए. ऐसा प्रतीत होता है मानो यही राष्ट्रीय हित की सबसे बड़ी बातें हैं. आप अपनी अंतरात्मा से चीख सकते हैं, लेकिन मीडिया के माध्यम से पूरा राष्ट्र उस बजट का स्वागत करने के लिए पहले से ही तैयार हो गया है. अगर बजट पर कुछ ज्यादा ही हो-हल्ला होता है या शेयर मार्केट अचानक धराशायी हो जाता है, तो प्लान बी को अमल में लाया जाता है. तत्काल कुछ चीजों के दाम कम हो जाएंगे, जिससे ऐसा प्रतीत होगा कि सरकार जनता की राय के प्रति कितनी सजग है. सबकुछ पहले से ही निर्धारित होता है.

इसीलिए ये सबकुछ एक तमाशा है. यह तमाशा गंभीर मुद्दों और सवालों पर पर्दा डाल देता है और सबकुछ को बहुत प्रचलित, सतही, बुद्धिहीन मनोरंजन के स्तर पर लाकर खड़ा कर देता है और हम उसका आनंद लेते हैं. हमारी फिल्में भी उसी राह पर जा रही हैं. रंगमंच भी. टीवी भी, खेल और राजनीति भी. फिर बजट क्यों नहीं? फिर पर्यावरण से जुड़े मुद्दे क्यों नहीं? फिर विदेश मामलों को भी तमाशा क्यों न बना दें? सबकुछ को मूर्खता में क्यों न बदल दें? इससे यह सुनिश्चित हो जाएगा कि सरकार सबकुछ को अंजाम दे सकती है. विदर्भ में किसान आत्महत्या कर रहे हैं? चलो, मुंबई में अरब सागर के बीचोंबीच शिवाजी की बड़ी सी मूर्ति बनवाते हैं. और कुछ लाख परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन जीने को अभिशप्त हैं? चलो, हिंदुस्तान में थ्रीजी लेकर आते हैं.

बहुत बुनियादी जरूरत की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं? कोई बात नहीं. चलो, हम मोबाइल फोन को और भी सस्ता कर देते हैं. स्वास्थ्य सेवाएं इतनी महंगी हो गई हैं कि वह इंसान की सीमा से बाहर जा रही हैं. अस्पतालों की स्थिति बहुत बुरी है? गुब्बारों को करमुक्त कर दो. नौकरियां खत्म हो रही हैं? कोई दिक्कत नहीं है. बजट में 3000 करोड़ रुपए सबके लिए पहचान पत्र बनाने के लिए आवंटित कर दो. हर समस्या का उतना ही गहरा और अप्रासंगिक जवाब हमारे समय में मौजूद है.

04.03.2010, 18.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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