और भी गम हैं
बात पते की
और भी गम
हैं...
आनंद मिश्रा
ताज़ा बजट में बढ़ी हुई
महंगाई को लेकर विरोध के स्वर शुरु ही हुए थे कि महिला आरक्षण विधेयक ने सारी बहसों
को पूरी तरह से बदल दिया है. गेहूं, आटा, शक्कर, दाल को लेकर सड़क पर उतरे और उतरने
की तैयारी करने वाले अब महिला विधेयक की पेंच उलझाने-सुलझाने में जुटे हुए हैं. कल
तक मनमोहन सरकार के खिलाफ मुखर आवाज़ बनी आम मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग की महिलायें
भी घर के खाली कनस्तरों का सूनापन भूल कर विधेयक से होने वाले नफा-नुकसान में उलझ
गई हैं.
महंगाई, लगातार बढ़ती बेरोजगारी, बेटियों की शादी के लिये पाई-पाई जोड़ने की मशक्कत
और ऐसी ही परेशानियों से मुठभेड़ कर रहे लोगों को एक ऐसा झुनझुना थमा दिया गया है,
जिसके शोर में दूसरी तमाम आवाज़े गुम गई हैं. जिस तरह से देश का एक बहुत बड़ा
हिस्सा महिला आरक्षण को लेकर व्यस्त है, उसमें आश्चर्य होता है कि क्या अब महंगाई
कोई मुद्दा नहीं रह गया है?
मूल्य की तरह गढ़ दिये गये मैनेजमेंट के इस दौर में पूंजी और बाज़ार की यह सामान्य
प्रवृत्ति बन गई है कि जब भी जनता के अंदर सवाल उभरने लगे, उसके अंदर व्यवस्था को
लेकर कोई उकताहट पैदा होने लग जाये, वह अपनी मुक्ति के रास्ते तलाशने लग जाये तो
समाज के अंदर एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी जाती है, जिसमें मूल मुद्दा सिरे से तिरोहित
हो जाये. इतिहास में अब तक की सबसे भीषण महंगाई झेल रही भारतीय जनता के साथ भी ऐसा
ही हुआ है. महिला आरक्षण किस हद कर महिलाओं की स्थिति सुधार पाने में सफल होगा,
इसके बारे में कुछ भी कहना जल्दीबाजी होगी. लेकिन इस विधेयक के सहारे महंगाई के
मुद्दे से जनता का ध्यान हटाने में सरकार सफल हो गई है.
हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने महंगाई से निपटने के लिये यह सुझाव दिया था
कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी खुदरा बाज़ार में प्रवेश दिया जाये. पिछले दो दशकों
में सरकारें लगातार इस कोशिश में हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिये अधिक से
अधिक दरवाज़े खोले जायें. यह सब कुछ एक ऐसी जानी-समझी रणनीति के तहत हो रहा है,
जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कारगुजारियों की अनदेखी की जा रही है और उन्हें
जनता के हित के खिलाफ जाकर लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है.
इस साल भी विदिशा से लेकर पंजाब और जम्मू तक पूरे देश में प्रकृति की मेहरबानी से
किसानों ने गेहूं, चना और सरसों की भरपूर पैदावार ली है. यह चौथा साल है, जब देश
में गेहूं की बंफर पैदावार हुई है. आने वाले सप्ताह में ये फसलें बाज़ार तक पहुंचने
भी लग जाएंगी. लेकिन सरकार के पास इस बात की फुर्सत नहीं है कि वह इन अनाजों की
रख-रखाव और खरीद-बिक्री की बात करे. सरकारी खरीद को लेकर अब तक कोई सुगबुगाहट भी
नहीं है. महंगाई का आह्वान करने वाले देश के कृषि मंत्री शरद पवार क्रिकेट मैच की
रंगिनियों में डूबे हुए हैं. दूसरी ओर सरकारी गोदामों में पिछले साल के अनाज अंटे
पड़े हैं. 31 जनवरी तक सरकारी गोदामों में 2 करोड़ टन से अधिक गेहूं पड़ा हुआ है.
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बाज़ार में जब गेहूं, चना और सरसों के भाव गिरेंगे तो प्रधानमंत्री और
वित्तमंत्री से लेकर कृषि मंत्री तक महंगाई कम होने और सेंसेक्स की
उछल-कूद का श्रेय लेने के लिये अपनी-अपनी पीठ थपथपाने लग जायेंगे. |
जाहिर है, ऐसी हालत में तरह-तरह की भविष्यवाणी करने वाले कृषि मंत्री अनिवार्य रुप
से यह सुझाव देने वाले हैं कि इन अनाजों को कम कीमत पर ही सही, विदेशों को निर्यात
कर दिया जाये, जिससे कि नई फसल के लिये गोदामों में जगह बनायी जा सके. सरकारी
कंपनियों को पहले ही श्रीलंका और नेपाल को गेहूं और चावल की सामान्य किस्मों को
निर्यात करने की छूट मिली हुई है.
ताज़ा खबरों के अनुसार कृषि मंत्री शरद पवार ने
देश के वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता में जल्दी ही एक बैठक बुलाने का
आह्वान किया है, जिसमें दुनिया के दूसरे देशों को भी गेहूं और चावल निर्यात के
फैसले को मंजूरी दी जा सके. लेकिन यह सब कुछ होने पर भी जिस तरह से सरकार की तैयारी
है, उससे तो यही लगता है कि सरकार गोदामों में पड़ा अनाज भले दूसरे देशों को
निर्यात करने में सफल हो जाये, कम से कम किसानों से उनका अनाज खरीदने की न तो सरकार
की तैयारी नज़र आती है और ना ही उसकी इच्छा शक्ति.
अंतरारष्ट्रीय बाज़ार में गेहूं की कीमत साजिशाना तरीके से गिरायी जा रही है और देश
पर भी इसका असर पड़ा है. देश में गेहूं का वायदा भाव लगातार गिर रहा है. पिछले
पखवाड़े भर में ही गेहूं की कीमतों में 150 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक की गिरावट
दर्ज की गई है. गेहूं की कीमत 1400 रुपये प्रति क्विंटल से गिर कर 1260-1270 रुपये
तक पहुंच गई है. आने वाले दिनों में गेहूं की कीमतों में और गिरावट तय है. इसके उलट
आस्ट्रेलिया, अमरीका, टर्की और चीन जैसे देशों में इस बार गेहूं की खराब फसल हुई
है. दुनिया भर में गेहूं उत्पादन में 2.37 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है और कुल
उत्पादन 65.9 करोड़ टन के आसपास रहने का अनुमान लगाया जा रहा है, जो पिछले साल की
तुलना में लगभग 1.6 करोड़ टन कम है.
अंतराष्ट्रीय एजेंसियों की नजर भारत पर टिकी हुई है, जहां गेहूं उत्पादन के पिछले
कई रिकार्ड ध्वस्त हो गये हैं. ऐसे में सरकार की असफलता औऱ अकर्मण्यता से बाज़ार
में जब गेहूं, चना और सरसों के भाव गिरेंगे तो प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री से लेकर
कृषि मंत्री तक महंगाई कम होने और सेंसेक्स की उछल-कूद का श्रेय लेने के लिये
अपनी-अपनी पीठ थपथपाने लग जायेंगे.
यही अनाज जब जून-जुलाई में आढ़तियों के माध्यम से निजी गोदामों में जमा हो जाएगा तो
सितंबर के आसपास एक बार फिर अनाजों के दाम बढ़ेंगे और महंगाई भी बढ़ती चली जाएगी.
लब्बो-लुवाब ये कि किसान एक बार फिर छले जाने के लिये तैयार रहे और जनता महंगाई का
एक और थपेड़ा.
12.03.2010,
00.50 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित