नाटकीय वार्ता का नाटक
बात पते की
नाटकीय वार्ता
का नाटक
अजय प्रकाश
देशी-विदेशी कंपनियों को
आदिवासियों का जल, जंगल, जमीन बेचकर सरकार ने विकास का जो असामाजिक और आपराधिक
सांचा तैयार किया है, उससे वह पीछे हटेगी, फिलहाल इसकी संभावना दूर तक नहीं दिखती.
इसी तरह माओवादियों ने पिछले तीन-चार दशकों में दंडकारण्य के जंगलों में अपनी
राजनीतिक लाइन के हिसाब से पार्टी का जो ढांचा खड़ा किया है, उसे छोड़कर वे वार्ता के
लिए सरकार के आगे झुकेंगे, यह उनके अंतिम समय से पहले संभव नहीं लगता. फिर भी दोनों
ही ओर से दो नेता लगातार वार्ता के शगुफे छोड़ रहे हैं, आखिर कारण क्या है?
माओवादी पार्टी के पोलित ब्यूरो सदस्य कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी की सरकार से वार्ता
की पहल को 'अजीब' करार देने वाले केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने फिर वार्ता का
पासा फेंक यह जता दिया है कि सांप-छुछंदर के इस खेल के वह कम बड़े खिलाड़ी नहीं हैं.
पहले चिदंबरम फिर किशनजी, पहले 72 घंटे फिर 72 दिन, पहले बगैर शर्त फिर शर्त, पहले
फैक्स फिर एसएमएस- इस हल्के अंदाज में दोनों नेताओं ने जो वार्ता-वार्ता खेला है,
इसके कुछ तो मायने हैं. खासकर तब, जबकि यूपीए सरकार माओवादियों को देश का दुश्मन
मानती है और माओवादी सरकार की नीतियों को जनता और जनाधार के लिए सबसे बड़ी मुश्किल.
तो सवाल है कि क्या सांप-छछूंदर का यह खेल बीच के लोगों के लिए रचा जा रहा है.
हालिया घटनाक्रमों पर नजर डालें तो यही सवाल, जवाब की शक्ल लेता नजर आ रहा है.
जनवादी केंद्रीयता और अनुशासन के साथ जनता को सर्वोच्च मानने की बात करने वाली
माओवादी पार्टी के मोबाइलधारी नेता और मीडिया की सनसनी बन चुके किशनजी ने सीपीआई
(माओवादी) के महासचिव गणपति की राय के उलट भारत सरकार से वार्ता की पहल कर जो धुंध
फैलायी है, आखिर माओवादियों के पास इसका क्या जवाब है.
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युद्ध के मोर्चे पर सांसत झेल रही सरकार को फिर एक बार शहरी जनता के
बीच मनोवैज्ञानिक युद्ध में जीत मिली है, जबकि माओवादियों ने अपना
विश्वास खोया है. |
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के लालगढ़ में आदिवासी विद्रोह के बाद पिछले साल जून से
चर्चा में आये किशनजी माओवादी आंदोलन के पहले नेता हैं, जिन्हें इतने व्यापक स्तर
पर देश और दुनिया में जाना गया. नहीं तो नारायण सान्याल, सब्यसाची पांडा जैसे
दर्जनों नेता हैं या रहे थे जिन्होंने माओवादी आंदोलन को मजबूती दी लेकिन कभी चर्चा
के केंद्र में नहीं आये. हालांकि इस स्थिति से न तो माओवादी नेतृत्व को कभी अफसोस
रहा होगा और न ही हीरो बनने से वंचित रहे गये उन नेताओं को ही.
ऐसे में सवाल है कि किशनजी को मीडिया प्रिय बनाने के पीछे माओवादियों की कोई रणनीति
है या उनका नायक बनने का भाव हिलारें ले रहा है. सीपीआई (माओवादी) के महासचिव गणपति
ने एक वृहत साक्षात्कार में सरकार के सामने वार्ता की असंभव सी कुछ शर्तें रख दीं,
जिसमें पार्टी से प्रतिबंध हटाना प्राथमिक मांगों में शामिल था. गणपति ने यह मांग
तब रखी है, जब सरकार ने माओवादियों को आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मान
माओवाद प्रभावित क्षेत्रों में एक लाख से उपर अर्धसैनिक बल तैनात कर दिये हैं.
सरकार और माओवादियों के इस रवैये से इतना तो जाहिर है कि दोनों पक्षों का आकलन अपनी
जगह स्थिर है और दोनों आमने-सामने के मूड में हैं.
हालांकि गृहयुद्ध की स्थिति से देश उबरे, इसकी चाहत रखने वाले दर्जनों
बुध्दिजीवियों, मानवाधिकार संगठनों ने किशनजी की वार्ता की पहल का स्वागत करते हुए
सरकार से शांतिप्रक्रिया में आगे बढ़ने की अपील की थी. वैसे में प्रश्न उठता है कि
भविष्य में अगर माओवादी सही मायने में किसी मौके पर बुध्दिजीवियों और मानवाधिकार
कार्यकर्ताओं को शामिल होने की अपील करें तो लोग क्या उतने ही विश्वास और उत्साह के
साथ बयान जारी करेंगे जैसा इस बार हुआ था.
बावजूद इसके किशनजी का लगातार मीडिया माध्यमों से सरकार को बातचीत की नयी शर्तें और
तरकीबें सुझाते रहना समझ से परे है. यह माओवादी सोचें कि शगुफे से उन्हें क्या
फायदा हुआ है. लेकिन युद्ध के मोर्चे पर सांसत झेल रही सरकार को फिर एक बार शहरी
जनता के बीच मनोवैज्ञानिक युद्ध में जीत मिली है, जबकि माओवादियों ने अपना विश्वास
खोया है.
साथ ही किशनजी टाइप स्वयंभू नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि जो मीडिया ऑपरेशन
ग्रीन हंट, सलवा-जूडुम के हत्यारों और अपराधियों के बारे में लिखने से कोताही बरतती
है, वह यूं ही उन्हें बाजार का हीरो नहीं बनाये हुए है. इतनी समझदारी तो है ही कि
वही बाजार में है, जो बिकता है. हाबड़-ताबड़ का यही रवैया रहा तो आधुनिकतम संचार
माध्यमों से लैश सरकार, कल को किशनजी का इस्तेमाल कर मीडिया के माध्यम से,
माओवादियों को सांसत में डाल सकती है.
15.03.2010,
01.40 (GMT+05:30) पर
प्रकाशित