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लोकसत्ता पर हमला

लोकसत्ता पर हमले का सच

 

राम पुनियानी

 


इस 5 जून को शिव संग्राम संगठन (एस.एस.एस.) के कार्यकर्ताओं के एक हुजूम ने जाने-माने मराठी दैनिक लोकसत्ता के संपादक श्री कुमार केतकर के मुंबई स्थित निवास पर हमला किया. हमलावरों का नेतृत्व नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के एक पूर्व एम.एल.सी. कर रहे थे. हमलावरों ने श्री केतकर के घर में जबरदस्ती घुसने की कोशिश की. उन्होंने खिड़कियों के कांच फोडे, घर को और जो नुकसान पहुंचा सकते थे वह पहुंचाया और वहां से भाग निकलने के पहले घर के बाहरी हिस्सों को कोलतार से रंग दिया. उनके नेता के अनुसार हमलावर श्री केतकर के विरूध्द अपने ''रोष'' का इजहार कर रहे थे. उनके रोष का कारण था, श्री केतकर द्वारा अपने एक संपादकीय में शिवाजी का ''अपमान'' किया जाना.


कथित संपादकीय में महाराष्ट्र सरकार के एक हालिया निर्णय की व्यंग्यात्मक शैली में आलोचना की गई थी. महाराष्ट्र सरकार अरब सागर में एक कृत्रिम निर्मित कर उसमें शिवाजी की मूर्ति लगाने जा रही है. यह मूर्ति अमरीका की प्रसिध्द स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से भी उंची होगी. योजना में द्वीप एवं उस तक पहुंचने के रास्ते का निर्माण शामिल है. इस पूरी योजना पर भारी भरकम राशि खर्च की जानी है.


श्री केतकर एक प्रतिबध्द पत्रकार हैं और अपने संपादकीय में उन्होंने सरकार के इस अत्यधिक खर्चीले निर्णय पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए कहा कि जहां एक ओर महाराष्ट्र में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है और गरीबों का जीवन बद से बदतर हो रहा है, वहीं सरकार अरबों रूपए इस योजना पर खर्च करने जा रही है. श्री केतकर ने कहीं भी शिवाजी के सम्मान को चोट पहुंचाने की कोशिश नहीं की.

शिवाजी को मुस्लिम विरोधी भी बताया जाता रहा है जबकि तथ्य यह है कि उनकी प्रशासनिक मशीनरी, थल सेना और जल सेना में बड़ी संख्या में मुसलमान थे. शिवाजी सूफी संत हजरत बाबा बहुथोरवाले के अनुयायी थे.

 

सबसे मजे की बात यह है कि कुछ लोग, जो स्वयं को शिवाजी का प्रशंसक बताते हैं, का यह दावा है कि महाराष्ट्र सरकार द्वार प्रस्तावित यह ''प्रेरणादायक योजना'' राज्य की समस्याओं को हल करेगी. यह आश्चर्यजनक परंतु सच है कि उदारवादी और प्रगतिशील मूल्यों के लिए जाने जाने वाले महाराष्ट्र जैसे राज्य में एस.एस.एस. का हमला पहली इस तरह की घटना नहीं है. इसके पहले, पुणे के भंडारकर इंस्टीटयूट पर हमला हुआ था. भंडारकर इंस्टीटयूट का दोष यह था कि वहां जेम्स लेन ने शिवाजी पर अपनी पुस्तक के लिए अनुसंधान किया था और इस पुस्तक में शिवाजी के बारे में कुछ तथाकथित अपमानजनक टिप्पणियां की गई थी. इसी तरह, शिवसेना ने धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ता सुश्री तीस्ता सीतलवाड़ द्वारा स्कूली छात्रों के लिए तैयार की गई एक पुस्तिका पर भी हंगामा खड़ा किया था क्योंकि इस पुस्तिक में शिवाजी को शूद्र बताया गया था. शिवाजी निश्चय ही उस जाति के थे जिन्हें शूद्र कहा जाता है परंतु शिवसेना की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि इन दिनों शूद्र शब्द अपमानजनक अर्थो में प्रयुक्त होता है.


शिवाजी का इस्तेमाल कई दशकों से एक विशेष प्रकार की पहचान का निर्माण करने के लिए किया जाता रहा है. बाल ठाकरे ने शिवाजी का इस्तेमाल अपने गैर-महाराष्ट्रीयन विरोधी आंदोलनों के लिए किया. शिवाजी को मुस्लिम विरोधी भी बताया जाता रहा है जबकि तथ्य यह है कि उनकी प्रशासनिक मशीनरी, थल सेना और जल सेना में बड़ी संख्या में मुसलमान थे. शिवाजी सूफी संत हजरत बाबा बहुथोरवाले के अनुयायी थे. इन सब तथ्यों के बावजूद शिवसेना ने सफलतापूर्वक शिवाजी के नाम का इस्तेमाल मुसलमानों का कत्लेआम करने और हिंदुओं का ध्रुवीकरण करने के लिए किया. हालत यह हो गई है कि आज केवल शिवाजी महाराष्ट्रीयन अस्मिता के प्रतीक बन गए हैं. संत तुकाराम की महान विरासत, ज्योतिबा फूले और बी.आर. अंबेडकर जैसे सामाजिक क्रांति के प्रणेताओं, महाराष्ट्र के अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों और चिंतकों व लेखकों को मानो हाशिए पर पटक दिया गया है.


सांप्रदायिक ताकतों ने बहुत सोच समझकर अपनी राजनीति में इस्तेमाल के लिए शिवाजी को चुना है. शिवाजी को आसानी से मुस्लिम विरोधी दिखाया जा सकता है. शिवाजी के जीवन के चंद हिस्सों को चुनकर सिर्फ उन्हें ही प्रचारित किया जाता है. यह भी सही है कि सांप्रदायिक शक्तियां शिवाजी के नाम का घोर दुरूपयोग कर वोटों की फसल काटने में काफी हद तक सफल रहीं हैं.

पिछले कुछ वर्षो से सामाजिक मुद्दों को दरकिनार करने के लिए पहचान की राजनीति का इस्तेमाल जमकर हो रहा है. शिवसेना के अलावा अन्य राजनैतिक दल भी शिवाजी के नाम का इस्तेमाल अपने राजनैतिक स्वार्थो की पूर्ति के लिए कर रहे हैं. जाहिर है, ये दल शिवाजी की किसी भी आलोचना को- चाहे वह उचित हो या अनुचित- सुनना ही नहीं चाहते. जो भी शिवाजी के बारे में ऐसी कोई बात कहता है जो इन दलों को पसंद नहीं है वो उनका दुश्मन बन जाता है.


असहिष्णुता इतनी अधिक बढ़ गई है कि अधिकांश हमलावर यह तक नहीं जानते कि असल में क्या लिखा या कहा गया है. वे तो सिर्फ सुनी सुनाई बातों के आधार पर कानून को अपने हाथों में ले लेते हैं. इस तरह की हरकतें बाल ठाकरे करते रहे हैं और अब अन्य दल भी यही कर रहे हैं. पहचान की राजनीति का खेल खेलने वालों का उद्देश्य यह रहता है कि आमजन भावनात्मक मुद्दों में उलझे रहें और मूल सामाजिक-आर्थिक समस्याओं की ओर जनता का ध्यान न जाए. मूलत: श्री केतकर यही कह रहे थे कि सरकार को प्रतीकात्मक राजनीति करने की बजाय जनता की मूल समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए.


देश में इस समय पहचान की राजनीति का जो बोलबाला है उसकी शुरूआत करने का श्रेय आर.एस.एस. और उसके सहयोगी संगठनों भाजपा, विहिप, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम आदि को जाता है. सबसे पहले संघ परिवार ने राममंदिर का मुद्दा उठाया. राम को भारतीय अस्मिता के प्रतीक के रूप में स्थापित करके गरीबों की समस्याओं को दरकिनार करने की कोशिश की गई. अब राम सेतु के मुद्दे को इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है मानो वह देश के सामने सबसे बड़ी समस्या है. भावनात्मक मुद्दों के जरिए जनता में भावनाओं का ज्वार इस तरह पैदा किया जाता है कि गरीब आदमी के लिए अपने मकान से ज्यादा महत्वपूर्ण भगवान राम का मकान बन जाता है.


हम सभी को याद है कि बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद किस तरह पत्रकारों पर हमले हुए थे. अब उन लोगों पर हमले हो रहे हैं जो समाज को बांटने वाली राजनीति का विरोध कर रहे हैं. इस तरह के हमले करने वालों को तो सजा मिलनी ही चाहिए, साथ ही हम सबको यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि पहचान की राजनीति करने वालों की हार हो और इस देश के करोड़ों गरीबों की समस्याएं देश के एजेंडा में सबसे ऊपर आएं.

 

15.06.2008, 04.52 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sagar

 
 kumar ketkar maharshtra ke ek faaltu patrkar hai....we khud bramhin hain...aur unpar bramhin sammelan me bhi hamla hua tha...jems laine prakaran mein unhone jems-laine ko support kiya tha aur abhi shivaji statue ke khilaf...

 
   
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