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मक़बूल फ़िदा हुसैन का निधन

मक़बूल फ़िदा हुसैन का निधन

लंदन. 9 जून 2011


भारत के सुप्रसिद्ध चित्रकार मक़बूल फ़िदा हुसैन का गुरुवार को 95 साल की उम्र में लंदन के रॉयल ब्राम्टन अस्पताल में निधन हो गया. अपनी पेंटिंग के लिये लोकप्रियता और विवाद अर्जित करने वाले एम एफ हुसैन को भारत का पिकासो कहा जाता था. 2006 के बाद से हिंदूवादी कट्टरपंथियों के कारण उन्होंने कतर की नागरिकता ले ली थी औऱ वे इन दिनों वहीं रह रहे थे. हालांकि उनका दावा था कि वे स्पांसर की तलाश व अपने प्रोजेक्ट के सिलसिले में कतर और लंदन में रह रहे थे.

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महाराष्ट्र के पंढ़रपुर में 17 सितंबर 1915 को जन्मे मकबूल फिदा हुसैन की मां बचपन में ही गुजर गई थीं. बाद में उनका परिवार इंदौर चला गया, जहां हुसैन की स्कूली शिक्षा हुई. 20 साल की उम्र में वे मुंबई पहुंचे, जहां जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स में उन्होंने पेंटिंग की शिक्षा ली. लंबे समय तक उन्होंने फ़िल्मों के पोस्टर बना कर अपना जीवन गुजारा. 1941 में हुसैन की शादी हुई और 1952 में ज्युरिख में उनकी पहली एकल प्रदर्शनी लगी.

1955 में भारत सरकार ने उनकी कला को पद्मश्री, 1973 में पद्मभूषण और 1991 में पद्मविभूषण से नवाजा. पेंटिग के अलावा उन्होंने कुछ फिल्में भी बनाईं. 1967 में मकबूल ने एक चित्रकार की नजर से अपनी पहली फिल्म बनाई। बाद में माधुरी दीक्षित को लेकर बनाई गई उनकी फ़िल्म गजगामिनी ने काफी लोकप्रियता अर्जित की. 1986 में उन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया गया था. क्रिस्टीज़ ऑक्शन में उनकी एक पेंटिंग 20 लाख अमरीकी डॉलर में बिकी. किसी भारतीय कलाकार को इससे पहले किसी पेंटिग के लिये इतनी कीमत नहीं मिली थी.

मकबूल फिदा हुसैन समाजवादी चिंतक और नेता डॉक्टर राम मनोहर लोहिया से बहुत प्रभावित थे. उनकी ही सलाह पर उन्होंने रामायण और महाभारत के पात्रों की तस्वीरें बनानी शुरु की थी. लेकिन बाद के दिनों में कथित रुप से देवी-देवताओं की तस्वीरों में अश्लीलता की वजह से हिंदू कट्टरपंथियों ने उन्हें अपने निशाने पर रखा था. इस मुद्दे को लेकर उन पर एकाधिक बार हमला भी हुआ. उनपर भारत में सैकड़ों की संख्या में मुकदमे किये गये.

उनके निधन पर राष्ट्रपति पाटिल ने अपने संदेश में कहा कि वह दुनिया भर में जाने जाने वाले कलाकार थे, जिनके असाधारण काम ने उन्हें बेहद लोकप्रिय बना दिया था. पाटिल ने कहा, "वह बहुआयामी व्यक्तित्व थे. उनके निधन से कला और सृजनात्मकता के क्षेत्र में बड़ी खाई पैदा होगी. वह सांसद भी थे और इस तरह से उन्होंने भारतीय संसद की भी शोभा बढ़ाई.

भारत में हुसैन के धुर विरोधी शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे ने भी उनकी मौत पर अफसोस जताया. ठाकरे ने कहा कि उनकी मौत से मॉर्डन आर्ट के क्षेत्र को नुकसान पहुंचा है. भगवान उनकी आत्मा को शांति दे. ठाकरे ने कहा कि मॉर्डन आर्ट के क्षेत्र में उन्हें महारत हासिल थी लेकिन हिंदु देवी देवातओं की तस्वीर बनाते हुए वह फिसल गए.

दूसरी तरफ महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राज ठाकरे ने कहा कि हुसैन के निधन के साथ ही उनकी पेंटिंगों से जुड़े विवाद भी खत्म हो जाएंगे. राज ठाकरे ने कहा कि हुसैन एक राष्ट्रीय अभिमान थे और उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है. उनके निधन के साथ उनसे जुड़े सारे विवाद खत्म हो जाने चाहिए और उनके परिवार को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे भारत में उनका अंतिम संस्कार करें.