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समलैंगिकता पर गुलाम नबी आज़ाद अदालत के खिलाफ

समलैंगिकता पर गुलाम नबी आज़ाद अदालत के खिलाफ

नई दिल्ली. 5 जुलाई 2011


भारत के स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आज़ाद के समलैंगिकता को 'रोग' और 'अप्राकृतिक' क़रार देने संबंधी बयान से उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं. आज़ाद का बयान ऐसे समय में आया है, जब उच्च न्यायालय ने समलैंगिकता को एक सामान्य संबंध बताया है.

विज्ञान भवन में एचआईवी एड्स पर हुए कार्यक्रम के दौरान आजाद ने कहा कि समैलिंगकता जैसी बीमारी विकसित देशों से निकल कर हमारे देश में भी प्रवेश कर चुकी है. आज़ाद का कहना था कि पुरुषों का पुरुषों के साथ सेक्स अप्राकृतिक है और देश के लिए ठीक नहीं. यह एक रोग है. हम यह पता नहीं लगा पाए हैं कि ऐसा क्यों होता है क्योंकि इसके बारे में जानकारी कम है.

उन्होंने कहा कि एचआईवी एड्स के मामले में समलैंगिक संबंध एक चुनौती है. महिला यौनकर्मियों के मामले में हम उनका पता लगा सकते हैं और उनकी मदद कर सकते हैं लेकिन पुरुषों का पुरुषों के साथ सेक्स के मामले में यह कठिन हो रहा है.

ज्ञात रहे कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2009 में ही भारतीय दंड की धारा 377 को अवैध ठहराते हुए समलैंगिक संबंधों को वैध करार दिया था. अदालत ने अपने फैसले में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के उस वक्तव्य का हवाला दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि संविधान समलैंगिकों को भी अन्य नागरिकों की भांति समान अधिकार देता है.

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अजीत प्रकाश शाह और न्यायमूर्ति एस मुरलीधर की खंडपीठ ने कहा था कि अगर आईपीसी की धारा 377 में संशोधन नहीं हुआ तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा, जो सभी नागरिकों को समान अवसर देने और कानून के समक्ष सभी के समान होने की बात कहता है. न्यायालय ने कहा था कि धारा 377 में संशोधन किया जाना चाहिए और वयस्कों में सहमति से बनने वाले यौन संबंधों को वैध माना जाना चाहिए.


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