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छत्तीसगढ़ में एसपीओ बनेंगे आरक्षक

छत्तीसगढ़ में एसपीओ बनेंगे आरक्षक

 

रायपुर. 22 जुलाई 2011

छत्तीसगढ़ सरकार ने एसपीओ को आरक्षक पद पर भर्ती करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. इसके लिए निर्धारित न्यूनतम मापदंडों में भी छूट दी गई है. मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित कैबिनेट की बैठक में कई अहम फैसले लिए गए. इसमें बस्तर और सरगुजा संभाग में तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी के पदों पर स्थानीय लोगों को ही भर्ती किए जाने के प्रस्ताव पर भी मुहर लगाई गई है. इसके अलावा सरगुजा के तैमुर सिंगला, सेमरसो और जशपुर के बादरखोल अभ्यारण्य को हाथी रिजर्व बनाने के प्रस्ताव को कैबिनेट ने मंजूरी दी है.

शुक्रवार को आयोजित कैबिनेट की बैठक में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अब तक एसपीओ के तौर पर सेवाएं दे रहे युवाओं को आरक्षक बनाने का फैसला हुआ है. इस भर्ती के लिए न्यूनतम मापदंडों में भी छूट देने का निर्णय लिया गया है. इसके तहत न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता सामान्य वर्ग के लिए 10वीं और अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए 8वीं में संशोधन कर पांचवीं कक्षा उत्तीर्ण होना कर दिया गया है. न्यूनतम शारीरिक मापदंड में भी छूट दी जाएगी.

आरक्षकों की भर्ती के लिए तय मापदंड में पुरुषों के लिए 166 सेंटीमीटर से कम कर 163 सेंटीमीटर, आदिवासी पुरुषों के लिए 153 सेंटीमीटर से कम कर 150 सेंटीमीटर और महिलाओं के लिए 153 सेंटीमीटर से कम कर 148 सेंटीमीटर करना तय हुआ है. इसी तरह आयु सीमा में छूट दी गई है.

प्रदेश में लगभग 5 हजार एसपीओ कार्यरत थे. अनुमान लगाया जा रहा है कि इस तरह एसपीओ के तौर पर काम कर रहे लगभग 80 फीसदी लोगों को आरक्षक बनाया जा सकेगा. जबकि बाकी 20 प्रतिशत शैक्षणिक योग्यता के मापदंड को पूरा नहीं पाएंगे, जिसके लिए उन्हें ओपन स्कूल परीक्षा में शामिल कराकर उनकी भर्ती बाद में की जा सकती है.

एसपीओ भर्ती को लेकर हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी. छत्तीसगढ़ सरकार ने कहा था कि एसपीओ की भर्ती छत्तीसगढ़ पुलिस अधिनियम, 2007 की धारा 9 (1) के तहत की जाती है तथा धारा 9 (2) के तहत नियमित पुलिस बल की तरह सुविधाओं, अधिकारों और कर्तव्यों के पालन का उल्लेख है. सेवा शर्तों पर जिला पुलिस अधीक्षक का पूरा नियंत्रण होता है. उनकी सेवाएं कभी भी बिना कारण बताए समाप्त की जा सकती हैं.

राज्य शासन के इस कदम को उच्चतम न्यायालय ने असंवैधानिक बताया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि एसपीओ के ऊपर नियमित पुलिस बल के सभी उत्तरदायित्वों का भार है तो उन्हें 3000 रुपए मासिक मानदेय की मामूली राशि क्यों दी जा रही है. यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का सीधा उल्लंघन है, जिनमें बराबरी और जीवन की गरिमा की गारंटियां दी गई हैं.

अदालत ने पाया कि शासन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 355 के अनुसार राज्यों में आंतरिक खतरों को नियंत्रित करने की अपनी जवाबदारियों से बचते हुए गोल मटोल उत्तर दे रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ पुलिस अधिनियम 2007 में जिम्मेदारी संबंधी धारा 23 (1) में पाया कि कानून व्यवस्था बनाने, लोकजीवन, नागरिक आज़ादी, संपत्ति अधिकारों और गरिमा की रक्षा करने, अपराधों और पब्लिक न्यूसेंस को रोकने, आंतरिक सुरक्षा बनाए रखने, आतंकवादी गतिविधियों को रोकने तथा नियंत्रित करने, अपराधियों की धरपकड़ और गिरफ्तारी करने, आपदा परिस्थितियों में लोगों की मदद करने, यातायात नियंत्रण करने, गोपनीय सूचनाएं एकत्रित करने, लोकसेवकों की सुरक्षा करने वगैरह की जिम्मेदारियों का पहाड़ एसपीओ के कंधों पर डाल दिया गया है.

अदालत की फटकार के बाद राज्य सरकार ने एसपीओ को आरक्षक के बतौर भरती करने की बात कही थी, जिसपर कैबिनेट ने शुकवार को मुहर लगा दी.


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