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मैंने 46 साल पहले आपके पिता को मारा था

मैंने 46 साल पहले आपके पिता को मारा था

नई दिल्ली. 10 अगस्त 2011


1965 की जंग के दौरान भारतीय सिविलियन विमान को मार गिराने वाले पाकिस्तानी एयरफोर्स के पायलट ने भारतीय विमान के पायलट की बेटी को शोक संदेश भेजा है.

पाकिस्तानी अखबार ‘द न्यूज’ के अनुसार, पाकिस्तानी पायलट का नाम कैस हुसैन है. उसने भारतीय पायलट जहांगीर ‘जंगू’ इंजीनियर की बेटी फरीदा सिंह को ई-मेल के जरिए यह शोक संदेश भेजा. हुसैन ने इसमें उस पूरे घटनाक्रम का जिक्र किया जब उसने भारतीय सिविलियन विमान को मार गिराया था. हुसैन ने 5 अगस्त को भेजे इस ई-मेल की प्रति नौशाद पटेल और जगन पिल्लरीसेट्टी को भी भेजी है-

प्रिय श्रीमती सिंह

मुझे खुशी है कि नौशाद पटेल और जगन पिल्लरीसेट्टी की मेहरबानी से अब हम एक दूसरे के बारे में जानते हैं और इसमें ताज्जुब नहीं कि मैं आपको यह खत लिख रहा हूं.

यह वाकया 46 साल पहले हुआ लेकिन मेरे ज़ेहन में इतना ताज़ा है जैसे कल की ही बात हो. आपके पिता का जहाज अपनी मंजि़ल खोजते हुए कई मील भटक चुका था और वह कच्छ के रन की सीमा में बार बार ऊपर नीचे हो रहे थे, जो हमारे राडार कंट्रोलरों को परेशान कर रहा था.

मैं अपने जहाज पर एक और पायलट के साथ तैयार बैठा था लेकिन मुझे अकेले ही उड़ान भरनी पड़ी और अपने राडार कंट्रोलर की मदद से मैंने आपके पिता का जहाज ढूंढ निकाला. आपके पिता ने भी मेरी मौजूदगी फौरन देख ली और वह जहाज ऊपर उठाए हुए पंख फड़फड़ाने लगे जो कि छोड़ जाने का आग्रह था.

अपने राडार कंट्रोलर की मदद से मैने उन्हें 3 हजार फुट की ऊंचाई पर देखा. वह लड़ाई का एक नया मोर्चा खोलने के पहले रेकी करने आए थे और मैं उनके इतने करीब से गुजरा कि मैं उनकी पहचान और जहाज का नम्बर तक पढ़ सकता था. उन पर देखते ही निशाना साधने के बजाए मैंने कंट्रोलर से कहा कि मैंने 8 सीटों वाला (बाजू की चार खिड़कियो से लगाया अंदाज) ट्रांस्पोर्ट जहाज देख लिया है. मैंने उससे आगे का निर्देश मांगा लेकिन उस वक्त भी मैं सोच रहा था कि मुझे निशाना लगाए बिना वापस आने को कहा जाएगा. लेकिन 3-4 मिनट के बाद मुझे जहाज को मार गिराने का हुक्म मिला.

जहाज को गिरा कर मुझे इस बात की तसल्ली हुई कि मैंने अपना काम पूरा किया और नया मोर्चा खोलने के लिये कोई जानकारी अगर इकट्ठी की हुई होगी तो उसे भी खत्म कर दिया.

मैं कराची में मौरीपुर में अपने जहाज की ईंधन की खाली टंकियां लिए उतर गया. मेरे अफसरान और स्क्वाड्रन के साथियों ने मुझे बधाई दी. बाद में शाम को ऑल इंडिया रेडियो ने जहाज में मरने वालों के नाम बताए.

आप तक पहुंचने की मेरी कोशिश की वजह एयर कमांडर कैसर तुफैल का अप्रैल 2011 में लिखा आर्टिकल है, जिसमें उन्होंने पूरे मामले की दरयाफ्त की, और मुझे, राडार कंट्रोलर (एक फ्लाएंग ऑफिसर) और उनके अफसर (एक विंग कमांडर) जिन्होंने जहाज गिराने का हुक्म दिया; का इंटरव्यू कर के पूरे किस्से पर रौशनी डाली. मैंने हिंदुस्तानी मीडिया में उस वक्त आई बहुत से बातें भी पढ़ी हैं, जो कि मीठापुर के उन किसानों के बयान हैं जो इस हादसे के गवाह कहे जाते थे. बदकिस्मती से वह सुनी सुनाई बातों की बिना पर दिए गए. यहां तक कि भारत सरकार की बनाई जांच कमेटी की जांच के नतीजे भी सच के करीब भी नहीं थे.

मैं हादसे की जगह पर अकेला था और मेरे अफसर जो मुझसे 6-7 मिनट बाद उड़े थे (जहाज बदलने और नए पायलट के कारण) वह सीमा पर 20 हजार फुट पर मेरे और बदिन पर राडार कंट्रोलर के बीच एक एक रिले स्टेशन की तरह मौजूद थे. 3 हजार फुट की ऊंचाई पर नीचे आते वक्त मेरा सम्पर्क टूट गया था और अगर यह जहाज 20 हजार फुट की ऊंचाई पर ना रहता तो मैं आपके पिता का जहाज ना ढूंढ पाता और उनकी और दूसरों की जान ना जाती.

जो भी हुआ, इस वाकये का बदकिस्मत पहलू यह है कि मुझे अपमे कंट्रोलर का हुक्म बजाना ही था. श्रीमती सिंह, मैंने आपको यह ब्यौरा यह बताने के लिए देना जरूरी समझा कि जो कुछ भी हुआ, फर्ज बजाते हुए हुआ, और यह इस खयाल से नहीं किया गया कि इश्क और जंग में सब जायज है- जैसा कि हि.दुस्तानी मीडिया जानकारी ना होने की वजह से ऐसे बता रहा था. मैंने कोई बेईमानी नहीं की और कायदे के मुताबिक ही काम किया. लेकिन बेशकीमती जान के नुकसान का, चाहे जैसे भी हुआ हो, हर इंसान को अफसोस होता है, और मैं दूसरों से अलग नहीं हूं.

मैं आपके, आपके परिवार और मारे गए लोगों के उन सात परिवारों के लिए दिलगीर हूं जिन्होंने अपने करीबियों को खोया है. मुझे इस बात का बेहद अफसोस है कि आपके भाई नौशीर भी हाल में चल बसे.

अगर कभी आपके आमने सामने, आपके पिता की 46 साल पहले हुई मौत पर अफसोस जाहिर करने का मौका मिले, तो मैं उसे दोनों हाथों से झपटना चाहूंगा, अगर आप मेरी बात जंग के दूसरी दुनिया में चले जाने से अफसोसज़दा हुए अपने परिवार के दूसरे लोगों तक पहुंचा सके, तो मैं आपका शुक्रगुज़ार होऊंगा.

खुदा हाफिज़
कैस


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