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फेसबुक पर लिखने वाले बिहार सरकार के दो कर्मचारी निलंबित

फेसबुक पर लिखने वाले बिहार सरकार के दो कर्मचारी निलंबित

पटना. 17 सितंबर 2011 प्रमोद रंजन


फेसबुक पर सरकार के खिलाफ लिखने के कारण 16 सितंबर, 2011 को बिहार विधान परिषद ने अपने दो कर्मचारियों को निलंबित कर दिया. ये दो कर्मचारी हैं कवि मुसाफिर बैठा और युवा आलोचक अरूण नारायण.

मुसाफिर बैठा को दिया गया निलंबन पत्र इस प्रकार है - '' श्री मुसाफिर बैठा, सहायक, बिहार विधान परिषद सचिवालय को परिषद के अधिकारियों के विरूद्ध असंवैधानिक भाषा का प्रयोग करने तथा - 'दीपक तले अंधेरा, यह लोकोक्ति जो बहुत से व्यक्तियों, संस्थाओं और सत्ता प्रतिष्ठानों पर लागू होती है. बिहार विधान परिषद, जिसकी मैं नौकरी करता हूं, वहां विधानों की धज्जियां उडायी जाती हैं'- इस तरह की टिप्पणी करने के कारण तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है.''

अरूण नारायण को दिये गये निलंबन पत्र के पहले पैराग्राफ में उनके द्वारा कथित रूप से परिषद के पूर्व सभापति अरूण कुमार के नाम आए चेक की हेराफेरी करने का आरोप लगाया गया है, जबकि इसी पत्र के दूसरे पैराग्राफ में कहा गया है कि परिषद में सहायक पद पर कार्यरत अरूण कुमार (अरूण नारायण) को ''प्रेमकुमार मणि की सदस्यता समाप्त करने के संबंध में सरकार एवं सभापति के विरूद्ध असंवैधानिक टिप्पाणी देने के कारण तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाता है''. इन दोनों पत्रों को बिहार विधान परिषद के सभापति व भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता ताराकांत झा ''के आदेश से'' जारी किया गया है.

हिंदी फेसबुक की दुनिया में भी कवि मुसाफिर बैठा अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं. अरूण नारायण ने अभी लगभग एक महीने पहले ही फेसबुक पर एकांउट बनाया था. उपरोक्त जिन टिप्पणियों का जिक्र इन दोनों को निलंबित करते हुए किया गया है, वे फेसबुक पर ही की गयीं थीं. फेस बुक पर टिप्पणी करने के कारण सरकारी कर्मचारी को निलंबित करने का संभवत: यह कम से कम किसी हिंदी प्रदेश का पहला उदाहरण है और इसके पीछे के उद्देश्य गहरे हैं.

हिंदी साहित्य की दुनिया के लिए मुसाफिर और अरूण के नाम अपरिचित नहीं हैं. मुसाफिर बैठा का एक कविता संग्रह 'बीमार मानस का गेह' पिछले दिनों ही प्रकाशित हुआ है. मुसाफिर ने 'हिंदी की दलित कहानी' पर पीएचडी की है. अरूण नारायण लगातार पत्र पत्रिकाओं में लिखते रहते हैं, इसके अलावा बिहार की पत्रकारिता पर उनका एक महत्वपूर्ण शोध कार्य भी है.

मुसाफिर और अरूण को निलंबित करने के तीन-चार महीने पहले बिहार विधान परिषद ने उर्दू के कहानीकार सैयद जावेद हसन को नौकरी से निकाल दिया था. विधान परिषद में उर्दू रिपोर्टर के पद पर कार्यरत रहे जावेद का एक कहानी संग्रह (दोआतशा) तथा एक उपन्या्स प्रकाशित है. वे 'ये पल' नाम से एक छोटी से पत्रिका भी निकालते रहे हैं.

आखिर बिहार सरकार की इन कार्रवाइयों का उद्देश्य क्या है ? बिहार का मुख्यधारा का मीडिया अनेक निहित कारणों से राजग सरकार के चारण की भूमिका निभा रहा है. बिहार सरकार के विरोध में प्रिंट मीडिया में कोई खबर प्रकाशित नहीं होती, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में विरले कोई खबर चल जाती है, तो उनका मुंह विज्ञापन की थैली देकर या फिर विज्ञापन बंद करने की धमकी देकर बंद कर दिया जाता है. लेकिन समाचार के वैकल्पिक माध्यमों ने नीतीश सरकार की नाक में दम कर रखा है. कुछ छोटी पत्रिकाएं, पुस्तिकाएं आदि के माध्यम से सरकार की सच्चाईयां सामने आ जा रही हैं. पिछले कुछ समय से फेस बुक की भी इसमें बडी भूमिका हो गयी है. वे समाचार, जो मुख्यधारा के समाचार माध्यमों में से बडी मेहनत और काफी खर्च करके सुनियोजित तरीके से गायब कर दिये जा रहे हैं, उनका जिक्र, उनका विश्लेषण फेसबुक पर मौजूद लोग कर रहे हैं. नीतीश सरकार के खिलाफ लिखने वाले अधिकांश लोग फेसबुक पर हिंदी में काम कर रहे हैं, जिनमें हिंदी के युवा लेखक प्रमुख हैं.

वस्तुत: इन दो लेखक कर्मचारियों का निलंबन, पत्रकारों को खरीद लेने के बाद राज्य सरकार द्वारा अब लेखकों पर काबू करने के लिए की गयी कार्रवाई है. बडी पूंजी के सहारे चलने वाले अखबारों और चैनलों पर लगाम लगाना तो सरकार के लिए बहुत मुश्किल नहीं था लेकिन अपनी मर्जी के मालिक, बिंदास लेखकों पर नकेल कसना संभव नहीं हो रहा था. वह भी तब, जब मुसाफिर और अरूण जैसे लेखक सामाजिक परिवर्तन की लडाई में अपने योगादान के प्रति प्रतिबद्ध हों.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Mithilesh kumar [mithileshdtj@gmail.com] Daltoganj - 2011-09-18 01:39:00

 
  अच्छा नहीं हुआ क्योंकि, इस देश में सच बोलने की आज़ादी नहीं है, सच बोलोगे तो परिणाम भुगतना ही पड़ेगा.  
   
 

raghwendra sahu [raghwendrasahu@gmail.com] durg - 2011-09-17 15:23:22

 
  मतलब हमारे छत्तीसगढ़ की तरह ही सभी प्रदेशों का एक जैसा हाल है......जहाँ मीडिया के लिखने की आजादी छिनी जा रही है....चाहे विज्ञापन के नाम पर हो या फिर पैसों से मुह बंद कराकर या फिर धमकी देकर....बिहार में तो ये हद ही हो गई फसबुक में लिखने पर नौकरी से निकाल दिया गया.........वास्तव में सफलता लोगों के सर चढ़कर बोलती है......नितीश के साथ भी यही हो रहा है......अपनी जरा सी आलोचना इन राजनेताओं से बर्दास्त ही नहीं होती...... 
   
 

zulaikha jabeen [] Raipur - 2011-09-17 10:30:46

 
  बेहद शर्मनाक सरकारी कृत्य है. अरुण नारायण जी और मुसाफिर बैठा जी के हौसलों को सलाम. आप अपने को अकेले न मानें. इस कठीन वक्त में आपके साथ कई लोग हैं.ये दौर दमन का है. बकौल कवि राजेश जोशी- मार दिये जायेंगे, जो चारण नहीं होंगे, धर्म की ध्वजा उठाये नहीं चलेंगे पीछे, मार दिये जाएंगे.  
   
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