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जगजीत सिंह का निधन

जगजीत सिंह का निधन

मुंबई. 10 अक्टूबर 2011


सुप्रसिद्ध गजल गायक और गजल के बादशाह कहे जानेवाले जगजीत सिंह का सोमवार की सुबह 8 बजे मुंबई में देहांत हो गया. वे 70 बरस के थे और मुंबई के लीलावती अस्पताल में पिछले कई दिनों से भर्ती थे. उन्हें ब्रेन हैमरेज होने के कारण 23 सितम्बर को अस्पताल में भर्ती करवाया गया था. ब्रेन हैमरेज होने के बाद जगजीत सिंह की सर्जरी की गई, जिसके बाद से ही उनकी हालत गंभीर बनी हुई थी. वे तबसे आईसीयू वॉर्ड में ही भर्ती रहे.

जगजीत सिंह


हिन्दुस्तान और पाकिस्तान और पूरे उपमहाद्वीप के गजल गायकों में जगजीत सिंह का नाम बहुत ही सम्मान से लिया जाता है. आम लोगों में गजलों को लोकप्रिय बनाने में उनका अहम योगदान है. अब तक सैकड़ों की संख्या में उनके अलबम जारी हुए थे.

जगजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी 1941 को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था. पिता सरदार अमर सिंह धमानी भारत सरकार के कर्मचारी थे. जगजीत सिंह का बचपन का नाम जीत था. उनकी शुरूआती शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद पढ़ने के लिए जालंधर आ गए. डीएवी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी किया.

सुनें चिट्ठी न कोई संदेश और माईं नी माई


वे 1965 में मुंबई आ गए. यहां से संघर्ष का दौर शुरू हुआ. वे पेइंग गेस्ट के तौर पर रहा करते थे और विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर या शादी-समारोह वगैरह में गाकर रोज़ी रोटी का जुगाड़ करते रहे. 1967 में जगजीत सिंह की मुलाक़ात चित्रा सिंह से हुई. दो साल बाद दोनों 1969 में परिणय सूत्र में बंध गए.

जगजीत सिंह का पहला अलबम ‘द अनफ़ॉरगेटेबल्स 1976 में जारी हुआ, जिसे भारी लोकप्रियता मिली. जगजीत सिंह सालों तक अपने पत्नी चित्रा सिंह के साथ जोड़ी बना कर गाते रहे. दोनों पति पत्नी ने मिल कर कई बेमिसाल प्रस्तुतियां दीं हैं. 1990 में एक हादसे इस दंपत्ति ने अपने पुत्र विवेक को खो दिया. चित्रा सिंह इस हादसे से कभी नहीं उबर पाईं और उन्होंने गाना बंद कर दिया. इस दंपत्ति ने अपना आखिरी संयुक्त एल्बम 'समवन समवेयर' पेश किया उसके बाद से जगजीत केवल अकेले गा रहे थे.

हिंदी, उर्दू, पंजाबी, भोजपुरी सहित कई जबानों में गाने वाले जगजीत सिंह को साल 2003 में भारत सरकार के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्मभूषण से नवाज़ा गया था. जगजीत सिंह उन कुछ चुनिंदा लोगों में से हैं, जिन्होंने 1857 में भारत में अंग्रेजों के खिलाफ़ हुए ग़दर की 150 वीं वर्षगाँठ पर आखिरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की ग़ज़ल संसद में प्रस्तुत की थी.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Dewanand Avachar [] India - 2012-02-09 11:01:18

 
  Jagjitsinhji was a national asset. He and his velvet voice could never and never be forgettable. Whatever he sung was fabulous and heart touching. He poured out his heart when he sung punjabi song \"mitty da baba....\"in Mumbai concert \"the unforgettable\". Also the \"mukharas\" he sung in zee tv\'s saregama before the legendary music directors is simply a masterpiece (both available on youtube).any person who will listen these two masterpieces will no doubt go just mad. 
   
 

sumit sharma [sumit.yaas@gmail.com] bilaspur - 2011-10-10 15:57:14

 
  हमको याद आती है बातें उनकी, दिन को रोज़गार और रातें उसकी. 
   
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