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इस पत्र के लिये खेद है अन्ना- दिग्विजय सिंह

इस पत्र के लिये खेद है अन्ना- दिग्विजय सिंह

 

नई दिल्ली. 11 अक्टूबर सितंबर 2011
 

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने अन्ना हजारे को एक पत्र लिख कर कहा है कि अन्ना हजारे को राजनीति में आना है तो जरुर आएं लेकिन वे ऐसे साथी और समर्थक ने चुनें, जिससे जनता का विश्वास टूटता हो. यहां पेश है दिग्विजय सिंह का मूल पत्र, अन्ना हजारे के नाम-

आदरणीय अन्ना,

अन्ना हजारे


मुझे आपको यह खुला पत्र लिखते हुए बड़ा खेद हो रहा है. मैं आपका बहुत सम्मान करता हूं. यह भावना आज से नहीं है किन्तु उस समय से है, जब मैं आपके गांव रालेगांव सिद्धि आया था. जल ग्रहण शिक्षा, पर्यावरण रक्षा और नशाबंदी के काम देख कर मैं बहुत प्रभावित हुआ था. मुझे आज भी आपके नशाबंदी, कुल्हाण बंदी, चराईबंदी तथा नसबंदी के नारे याद हैं.

आपके विषय में एक आदर और सम्मान का भाव बना था. इसी भावना और अनुभव के आधार पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में मैंने आपको राज्य योजना बोर्ड का सदस्य बनने के लिए आमंत्रित किया. आप मध्य प्रदेश आए और कई गांव जा कर आपने पानी रोको के काम का मार्गदर्शन भी किया. उस समय भी आदर पूर्वक आपके चरण स्पर्श कर मैं आशीर्वाद प्राप्त करता था और आज भी वही सम्मान यथावत है.

पर हाल की कुछ घटनाओं ने मुझे असमंजस में डाल दिया है. ऐसा लगता है कि आपको कुछ लोगों ने घेर लिया है. यह वो लोग हैं जो हमेशा से कांग्रेस की विचारधारा के विरोधी रहे हैं. फिर चाहे श्री शांति भूषण हों या उनके सुपुत्र प्रशांत या आपके साथी अरविंद केजरीवाल.

यह सभी लोग कांग्रेस विरोधी रहे हैं. यह अपना राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हुए हैं और इस काम के लिये आपके साफ सुथरे चरित्र का दोहन कर रहे हैं. इनके प्रभाव में ही आप कई एक तरफा निर्णय कर रहे हैं और इस का परिणाम यह हो रहा है कि आप कई ऐसे कदम उठा रहे हैं जो आज तक के आपके जीवन मूल्यों के विपरीत हैं.

आपने भ्रष्टाचार के मुद्दे को बड़े प्रभावी ढंग से उठाया है. और इस विषय पर पूरे देश में कोई विवाद नहीं है कि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए. आपका आंदोलन शुरू होने से पहले ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी जी ने पहल करके बुराड़ी के कांग्रेस अधिवेशन में भ्रष्टाचार के खिलाफ पांच सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा की थी. इसी को लागू करने के लिए उन्होंने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के दो सदस्यों- अरुणा रॉय और हर्ष मंदर को एक लोकपाल बिल का प्रारूप बनाने का काम सौंपा था.

यह दोनों उसी सिविल सोसाइटी के प्रमुख सदस्य हैं जिसका आप और आपके साथी समर्थन करते हैं. आपको और आपके साथियों को भ्रष्टाचार के विषय में कांग्रेस और अन्य दलों के भीतर फर्क करना चाहिए. आपको यह स्वीकार करना चाहिए कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की पहल पर ही इस देश में सूचना का अधिकार लागू हुआ है इसके बाद भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आए हैं.

इसके विपरीत आप भाजपा के शासनकाल को याद कीजिए. उनके अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण टीवी पर पैसे लेते हुए देखे गए, जब जेटली रक्षा मंत्री के घर रक्षा सौदे करते हुए देखे गए फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. भाजपा के सांसद टीवी पर पैसे लेते हुए देखे गए और उन पर कोई भी केस दर्ज नहीं हुआ. आपने स्वामी रामदेव के आंदोलन का समर्थन किया और वह भी बडे़ जोर-शोर से कालेधन के खिलाफ अभियान चला रहे थे. पर आज उन पर व उनके करीबी साथियों को प्रवर्तन निदेशालय ने काला धन अर्जित करने के नोटिस दिए हैं. क्या इन सब बातों से आपकी छवि धूमिल नहीं होती?

आज काले धन को लेकर बीजेपी के नेता बयानबाजी करते हैं. पर अपने शासनकाल में इन्होंने कुछ भी नहीं किया. उस समय आप भी खामोश रहे. आपने कभी भी भाजपा के नेताओं के खिलाफ आवाज नहीं उठाई. आप जितना जोश आज कांग्रेस के खिलाफ दिखाते हैं उसकी तुलना में भाजपा के नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हैं. जबकि गुजरात में नौ साल से लोकायुक्त नहीं है.

आप यह भी सोचिए कि जब आपने लोकपाल कानून के लिए आंदोलन किया तो सरकार ने जो पहल की वो हमारे देश के इतिहास में आज तक नहीं हुई. किसी भी कानून को तैयार करने के लिए गैरसरकारी सदस्यों के साथ मंत्रियों की कभी संयुक्त समिति नहीं बनाई गई है और इतना ही नहीं उसके अधिकांश सुझाव भी मान लिए गए हैं. आप भी जानते हैं कि विवाद केवल प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में रखने को लेकर और कुछ ऐसी बातों को लेकर था, जिनके लिए संविधान संशोधन भी जरूरी हो सकते हैं.

यदि सामान्य रूप से देखा जाए तो यह कोई इतना गंभीर विषय नहीं था कि इसके लिए आमरण अनशन किया जाए. क्योंकि आपकी मूल मांग तो सरकार ने मान ही ली थी. इसके बाद भी जब आप अनशन पर बैठे तो सरकार ने फिर पहल करके संसद के दोनों सदनों में चर्चा कराके आप के द्वारा रखे गए तीन मुद्दों पर आम सहमति बनाकर आपको संतुष्ट किया.
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