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गद्दाफी को अमरीका की दुश्मनी ले डूबी

गद्दाफी को अमरीका की दुश्मनी ले डूबी

नई दिल्ली. 20 अक्टूबर 2011


लीबिया के अपदस्थ नेता कर्नल मुअम्मर गद्दाफी की तानाशाही भले लिबिया के लिये बड़ा मुद्दा रहा हो, विश्व राजनीति पर नजर रखने वाले मानते हैं कि अमरीका के साथ उनकी दुश्मनी के कारण भी उन्हें मुश्किलें झेलनी पड़ीं. कहा जाता है कि लिबिया के विद्रोहियों को भी अमरीका ने मदद की, जिसके बाद कर्नल गद्दाफी को मार डाला गया. अमरीका की दिलचस्पी लिबिया के अकूत तेल भंडारों पर भी है.

गद्दाफी


दुनिया का दारोगा कहे जाने वाले अमरीका ने शुरु से ही कर्नल ग़द्दाफ़ी को एक शत्रु के रुप में प्रचारित किया. यहां तक कि कर्नल गद्दाफी के खिलाफ पिछले आठ महीनों में सुनियोजित तरीके से अमरीका ने तरह-तरह की बातें प्रचारित कीं, जिनमें से अधिकांश के पक्ष में अमरीका के पास कोई आधार नहीं था.

गद्दाफी के खिलाफ अमरीकी दुश्मनी का एक बड़ा मामला 1986 में सामने आया, जब बर्लिन में एक नाईट क्लब में हुये हमले के लिये गद्दाफी को जिम्मेवार ठहराया गया और अमरीका ने राष्ट्रपति रोनल्ड रीगन के आदेश पर कर्नल गद्दाफी के देश पर अंधाधुंध हवाई हमले किये, जिसमें गद्दाफी के कई रिश्तेदार मारे गये.

इसके उलट लॉकरबी में एक जहाज में हुये बम विस्फोट में जब 270 लोग मारे गये तो कर्नल गद्दाफी ने उसके दो अपराधियों को स्कॉटलैंड को सौंपने से मना कर दिया. इस घटना से नाराज अमरीका मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गया और संयुक्त राष्ट्र संघ ने लिबिया पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया गया. इन दोनों को छोड़ने के बाद ही यह आर्थिक प्रतिबंध हटाया गया. हालांकि इन दोनों में से एक अपराधी को उम्रकैद की सजा दी गई.

कम्युनिस्ट गदर पार्टी ऑफ इंडिया के अनुसार अमरीका और नाटो के उसके सहयोगी लिबिया के तेल संस्थानों पर आपस में होड़ लगा रहे हैं. लिबिया में हस्तक्षेप करने वाली साम्राज्यवादी ताकतें और उनकी बड़ी-बड़ी ऊर्जा कंपनियां लिबिया के विशाल तेल संसाधनों पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रही हैं. ”मानवीय हस्तक्षेप“ के पर्दे के पीछे पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतें और उत्तरी अफ्रीका की भूतपूर्व उपनिवेशवादी ताकतें उस इलाके पर फिर से अपना नियंत्रण जमाने के लिये लिबिया में जंग चलाये हुये हैं.

लिबिया के तेल आदि के संसाधन तथा संबंधित प्रतिष्ठान दुनिया के सबसे वैभव संपन्नों में आते हैं. उनमें बहुत बढि़या तरीके से विकसित की गयी तेल रिफायनरीज़, पंपिंग स्टेशन्स, गैस लाइन्स, बंदरगाह तथा सीधे यूरोप में पहुंचने वाली पाइप लाइन्स का समावेश है. नाटो की बमबारी से छिन्न-विछिन्न किये गये लिबिया के “पुनर्निर्माण” के बहुत बड़े ठेकों की तरफ भी विदेशी इज़ारेदार लालची नज़र से देख रहे हैं. विकसित पूंजीवादी देशों में गहरी आर्थिक मंदी की आज की परिस्थिति में ऐसे ठेके बहुत ही महत्वपूर्ण बन जाते हैं. एन.टी.सी. ने घोषित किया है कि सर्व प्रथम ये ठेके उन राज्यों को मिलेंगे, जिन्होंने उनकी मदद की है- इसका मतलब होता है खास करके अमरीका, बर्तानिया और फ्रांस को मिलेंगे.