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विनायक सेन नहीं लेंगे गांधी फाउंडेशन अवार्ड

विनायक सेन नहीं लेंगे गांधी फाउंडेशन अवार्ड

रायपुर. 31 अक्टूबर 2011


डाक्टर विनायक सेन ने आदिवासियों के भारी विरोध के बाद कहा है कि वे गांधी फाउंडेशन द्वारा दिये जाने वाले गांधी अंतर्राष्ट्रीय शांति पुरस्कार के हकदार नहीं हैं. उन्होंने कहा है कि भारत के आदिवासी के लिये घोषित यह शांति पुरस्कार वर्तमान परिस्थिति में मेरे लिये लेना उचित नहीं है.

विनायक सेन


ज्ञात रहे कि विनायक सेन और बुलु इमाम को संयुक्त रुप से 9 नवंबर को लंदन के एमनेस्टी इंटरनेशनल में गांधी अंतर्राष्ट्रीय शांति पुरस्कार दिये जाने की घोषणा की गई है. भारत के आदिवासी के नाम पर विनायक सेन को पुरस्कार दिये जाने का देश के विभिन्न आदिवासी संगठनों ने कड़ा विरोध किया है. विभिन्न आदिवासी नेताओं ने कहा है कि विनायक सेन भारत के आदिवासियों का प्रतिनिधित्व नहीं करते और यह पुरुस्कार उन्हें यही कहते हुये दिया जा रहा है कि वे ‘भारत के आदिवासी लोग’ हैं. इस विरोध के बाद विनायक सेन ने भी माना था कि वे भारत के आदिवासियों का प्रतिनिधित्व नहीं करते और पुरुस्कार के लिये की गई घोषणा के शब्द बदले जाने चाहिये.

झारखण्ड ह्यूमन राइट्स मूवमेंट और झारखण्ड इन्डिजनस पीपुल्स फोरम ने शनिवार को गांधी फाउंडेशन के अध्यक्ष रिचर्ड एटनबरो को पत्र लिख कर इस बात को लेकर विरोध जताया है कि विनायक सेन जैसे गैर आदिवासी को जनजातियों का पुरस्कार दिया जा रहा है.

संगठन ने गांधी फाउंडेशन से अनुरोध किया है कि या तो वे पुरस्कार का नाम बदलें या फिर अगर यह पुरस्कार आदिवासियों को दिया जाना है तो इसे किसी आदिवासी प्रतिनिधि को ही दिया जाये, जिसने आदिवासियों के मुद्दे पर संघर्ष किया हो.

पत्र में कहा गया है कि यह गहरी पीड़ा का विषय है कि डॉक्टर विनायक सेन और बुलु इमाम को आदिवासियों के नाम पर यह अवार्ड दिया जा रहा है. इनके प्रति गहरे सम्मान का भाव होने पर भी हमें यह मंजूर नहीं होगा कि आदिवासियों के नाम पर इन्हें यह अवार्ड दिया जाये. यह विडंबनापूर्ण है कि गांधी फाउंडेशन का यह अवार्ड आदिवासी को दिया जाना है लेकिन अनार्ड पाने वाले आदिवासी नहीं हैं. हम मानते हैं कि यह साफ तौर पर अनादर, अपमान और संस्कृति, पहचान, अस्मिता, लोकाचार व गरिमा पर सीधा आक्रमण का मामला है. यह मामला इस बात का भी प्रमाण है कि आदिवासी आज भी उपेक्षित हैं.

बुलु इमाम और डॉक्टर विनायक सेन के नाम को इस अवार्ड के लिये द्वितीयक प्रस्तावक की भूमिका निभाने वाले पत्रकार रॉबर्ट वेल्स ने कहा है कि अब जबकि दोनों का नाम सार्वजनिक किया जा चुका है, तब विजेताओं को बदलना मुश्किल है. ऐसे में ‘भारत की जनजाति के प्रतिनिधि को पुरस्कार’ दिये जाने की अपनी घोषणा बदलने पर फाउंडेशन विचार कर रहा है. रॉबर्ट ने माना कि उन्होंने बुलु इमाम के साथ तो बजाप्ता काम किया है लेकिन वे व्यक्तिगत रुप से डॉक्टर विनायक सेन को नहीं जानते. गांधी फाउंडेशन ने भी दोनों के काम की प्रकृति को देखते हुये उन्हें आदिवासियों की ओर से इस अवार्ड के लिये चुन लिया.

अब विनायक सेन ने लंदन की गांधी फाउंडेशन को पत्र लिख कर कहा है कि भारत के आदिवासी के नाम पर दिये जा रहे इस पुरस्कार के वे हकदार नहीं हैं. उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थिति में यह पुरस्कार लेना उचित नहीं है.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

AJIT KUMAR PANDA [ayusajit@rediffmail.com] KHARIAR - 2011-11-01 12:23:12

 
  Dr. Vinayak Sen has taken a great & perfect decision.  
   
 

Rajni Kant Mudgal [mudgalrajnikant@yahoo.in] Shahdara, Delhi - 2011-11-01 06:50:49

 
  It is a great decision taken by Dr. Vinayak Sen. But I still feel that Adivasi leaders have done too much personal propaganda against Dr. Sen. 
   
 

Samit Kumar Carr [samitcarr@gmail.com] Jamshedpur - 2011-11-01 06:49:48

 
  आदिवासी के लिये घोषित पुरस्कार के लिये किसी गैर आदिवासी को चुना जाना सही नहीं है और ना ही किसी गैर आदिवासी को उस पुरस्कार को स्वीकार करना चाहिये. आदिवासी समाज के लिये काम करने वाले कीसी गैर आदिवासी को भी चुना जा सकता है, यह और बात होगी. लेकिन जो पुरस्कार सीधे-सीधे आदिवासी के लिये है, उसे किसी गैर आदिवासी को नहीं दिया जा सकता. यह आदिवासियों के सम्मान पर एक धक्का है. आज से सौ साल पहले रवींद्रनाथ ठाकुर ने -अपमानित- कविता लिखी थी, जो आज भी प्रासंगिक है. यह कविता जातपात एवं सामाजिक शोषण पर आधारित है, जो आज भी आदिवासी और दलित के साथ हो रहा है. 
   
 

Saurav [] Delhi - 2011-10-31 10:46:49

 
  Binayaks tale is completely intellectual dishonesty and false bravado. Can Binayak and/or his campaigner tell what Binayak has done for adivasis?  
   
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