पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >राजनीति >दिल्ली Print | Share This  

काटजू के बयान से नाराज हैं मीडिया संगठन

काटजू के बयान से नाराज हैं मीडिया संगठन

नई दिल्ली. 3 नवंबर 2011

पत्रकारों के संगठन एनबीए ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिख कर भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू के उन बयानों पर गहरी आपत्ति दर्ज कराई है, जिसमें उन्होंने मीडिया की आलोचना की थी. एनबीए ने कहा कि भारतीय मीडिया बेहतर काम कर रही है और प्रेस परिषद के अध्यक्ष का बयान आपत्तिजनक है.

पत्रकार


गौरतलब है कि जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने अपने निवास पर पत्रकारों से एक मुलाकात में कहा था कि मीडिया पर आरोप लगाया था कि मीडिया सनसनी फैलाने की कोशिश में तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करती है. उन्होंने पेड न्यूज पर भी पत्रकारों को कटघरे में खड़ा किया था.

जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने कहा था कि मीडिया महत्वहीन बातों को मुद्दा बना देता है, जबकि असली मुद्दे उपेक्षित रह जाता है. उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा था कि देश के असली मुद्दे आर्थिक हैं, जिसमें देश की 80 फीसदी जनता जी रही है. आवासीय भवनों, दवा-दारु का अभाव आदि जैसे मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय मीडिया महत्वहीन मुद्दों पर जनता का ध्यान मोड़ती है कि फलां अभिनेता की पत्नी गर्भवती है, वह एक बच्चे को जन्म देगी या जुड़वा बच्चों को.

जस्टिस काटजू ने मीडिया की स्थिति पर चिंता जताते हुये कहा था कि लैक्मे इंडिया के एक फैशन शो में, जिसमें सूती लिबासों का प्रदर्शन किया जा रहा था, 512 मान्यताप्राप्त पत्रकार उपस्थित थे, जबकि कपास उगाने वाले लोग नागपुर से घंटे भर की हवाई उड़ान की दूरी पर विदर्भ में आत्महत्या कर रहे थे. दो-चार स्थानीय पत्रकारों को छोड़ कर किसी ने उन अभागों की कथा नहीं लिखी. जस्टिस काटजू ने कहा था कि क्या यह फ्रांस की महारानी अन्तोत्वा जैसा नहीं है, जिसने कहा था कि जनता के पास रोटी नहीं है तो वह केक खाये.

हालांकि जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने माना कि मीडिया में अच्छी खबरें भी आती हैं लेकिन उन्होंने सवाल उठाया कि जनता से जुड़ी खबरें 5 या 10 प्रतिशत से अधिक जगहें नहीं घेरती. अधिकांश स्थानों पर तो फिल्मी सितारों की जिंदगी, पॉप-संगीत, फैशन परेड, क्रिकेट और ज्योतिष को समर्पित होती है.

अपने बयान में जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने मीडिया में आतंकवादी घटनाओं के बाद जारी किये जाने वाले ई मेल के शरारती होने और उसमें हमेशा मुसलमानों का नाम डाल कर उनको ही निशाना बनाने पर चिंता जताते हुये कहा था कि इससे देश के सभी मुसलमानों के प्रति गलत संदेश जाता है. जबकि देश की 99 फीसदी जनता अमनपसंद है. उन्होंने कहा कि अकेले मीडिया नहीं, न्यायपालिका समेत दूसरी संस्थाओं में भी गड़बड़ियां हैं.

जस्टिस मार्कंडेय काटजू के इन बयानों के बाद एनबीए ने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर कहा है कि इस तरह के बयान हतोत्साहित करना वाले हैं. भारतीय मीडिया बहुत बेहतर काम कर रहा है और जस्टिस मार्कंडेय काटजू द्वारा लगाये गये आरोप सही नहीं हैं.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sunderlohia [] mandi himachal pradesh - 2011-11-04 05:47:33

 
  Media should introspect. It is loosing it\'s credibility. Viewers are awed by its glamour but it is not going to last long.  
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in