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रालेगणसिद्धी की तरह 50 और गांवों का विकास

रालेगणसिद्धी की तरह 50 और गांवों का विकास

रालेगणसिद्धी. 23 नवंबर 2011

समाजसेवी अन्ना हजारे एक बार फिर से ब्लागिंग की दुनिया में लौट आये हैं. उन्होंने अपने गांव रालेगणसिद्धी का उदाहरण देते हुये आने वाले दिनों में उसी तर्ज पर 50 गांवों के विकास का दावा किया है. अपने नये ब्लॉग में अन्ना हजारे ने कहा है कि देश में पैदा होने वाले हर बच्चे के सर पर 22 से 25 हजार का कर्ज है.

अन्ना हजारे


समाजसेवी अन्ना हजारे ने कहा है कि आज़ादी के 65 साल के बाद सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत पर हिमालय जैसी कर्ज की पहाड़ी बन गई है. लिए हुए कर्ज का ब्याज भरने के लिए पैसा नहीं इसलिए फिर से कर्ज लेकर ब्याज भर रहे हैं. इस स्थिति से हमारा देश गुज़र रहा है. आज हर परिवार में बच्चा जन्म लेता है तो 22 से 25 हज़ार रूपए कर्ज की गड्डी सर पर लेकर जन्म ले रहा है. जन्म लेने में उस का क्या दोष था?

अपने ब्लॉग में अन्ना हजारे ने आरोप लगाया है कि आज़ादी के बाद इंडस्ट्री के साथ-साथ देश के हर गांव में जमीन और पानी का यदि सही नियोजन करके विकास होता और इंडस्ट्री पर जो खर्च हुआ, उसमें से कुछ पैसा गांव के सर्वांगीण विकास में लग जाता, तो आज देश की जो सामाजिक और आर्थिक हालत हुई है, वह नहीं होती.

उन्होंने विकास की प्राथमिकता के मुद्दे अपने गांव रालेगणसिद्धी का उदाहरण देते हुये कहा कि इस गांव में गरमी के दिनों में पीने का पानी नहीं था. 80 प्रतिशत लोगों को खाने को अनाज नहीं था. गांव में काम न होने से 5-6 किलोमीटर दूर तक मजदूरी के लिए जाते थे. हाथ के लिए काम नहीं था, पेट के लिए रोटी नहीं थी. इसलिए कई लोगों ने शराब की भट्टी चला रखी थी. 30-35 शराब की भट्टी हो गई थी. शराब निकालना, गांव-गांव में बेचना और अपने बाल-बच्चों को संभालना. शराब के कारण गांव में झगड़े टंटे भी ज्यादा होते थे. गांव में पढ़ाई की सुविधा नहीं थी. दो कमरे में चार क्लास तक की पढ़ाई होती थी. इंसान और जानवरों की आरोग्य की कोई सेवा नहीं थी. गांव में छूत अछूत का भेदभाव होता था. 12-13 साल में ही लड़की की शादी हो जाती थी.

अन्ना के अनुसार 1975 में रालेगण सिद्धी के विकास के लिए शुरूआत की गई. बारिश के पानी का एक-एक बूंद पानी गांव में ही रोकने का प्रयास किया. घास को बढ़ाया, तीन लाख से ज्यादा पेड़ लगाए. नाला बांध चेक डैम, समेंट डैम, सीसीटी, परक्युलेशन टैंक जैसे कई उपचार पद्धति बनाई और गिरने वाला बारिश का पानी गांव में ही रोक दिया. अकाल पीड़ित क्षेत्र होने के कारण हर साल बारिश सिर्फ 400-500 मि.ली. तक होती है. पानी गांव में रोकने के कारण पहले 300 एकड़ ज़मीन में एक फसल नहीं मिलती थी. आज 1500 एकड़ जमीन में दो फसलें मिलने लगी हैं. आज 35 साल के बाद वही गांव है, वही लोग हैं, वही जमीन है. कोई भी उद्योगपति का पैसा न लेते हुए आज गांव स्वावलंबी हो गया है.

अन्ना हजारे ने लिखा है कि जिस गांव में 80 प्रतिशत लोग भूखे पेट से सोते थे, आज उसी गांव से तरकारी विदेशों में निर्यात हो रही है. आज कोई भी परिवार बाहर से अनाज नहीं लेता है. पहले गांव से 300 लीटर दूध बाहर नहीं जाता था. आज हर दिन 4 से 5 हज़ार लीटर दूध बाहर जा रहा है. हर दिन 80-90 हज़ार रुपए दूध की बिक्री से गांव में आ रहे हैं.

दलितों की स्थिति पर अन्ना ने लिखा है कि दलित समाज को मंदिर में प्रवेश नहीं था. दलितों के पानी का कुआं अलग था. शादी के खाने पर दूर बिठाते थे. आज दलित समाज पर चढ़ा हुआ 60000 रुपयों का कर्ज जब उनसे पूरा नहीं हुआ तो गांव में ग्राम सभा ने निर्णय लिया कि दलितों का कर्ज हम गांव के दूसरे लोग पूरा करेंगे. सभी गांव के लोगों ने दलित समाज के जमीन पर दो साल श्रमदान किया. फसल उगाई और दलितो का कर्ज गांव वालों ने पूरा किया है. आज गांव में सार्वजनिक खाने का कार्यक्रम होने से खाना पकाने में और खाना बंटवाने में सभी जाति धर्मों के साथ दलित भी साथ में होते हैं. कोई छूत-अछूत नहीं रहा है. महाराष्ट्र में कई गांवों में ग्राम विकास का काम चल रहा है. इसके लिए 50 नए गांवों का चयन भी हो रहा है.


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