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छत्तीसगढ़ में कुत्ते की मौत मरते वनराज

छत्तीसगढ़ में कुत्ते की मौत मरते वनराज

मीतू गुप्ता रायपुर. 26 नवंबर 2011

बाघ


छत्तीसगढ़ के भोरमदेव में बाघिन के मारे जाने की घटना के बाद एक बार फिर से छत्तीसगढ़ के वन विभाग में जंगल राज चला रहे अफसर पूरे मामले की लिपा पोती में जुट गये हैं. बाघिन के शिकार के मामले की जांच में जंगल विभाग की गड़बड़ियां न उजागर हो जाएं, इसलिये बाघिन की मौत के लिये गठित जांच कमेटी की रिपोर्ट से पहले ही विभाग के अफसर नये-नये झूठ गढ़ने लग गये और आनन-फानन में वन विभाग के ही कुछ दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को बतौर शिकारी पेश कर उन्हें जेल भेज दिया गया. राज्य में पिछले कुछ दिनों में बाघ के मारे जाने की ये तीसरी घटना है

छत्तीसगढ़ में जब भी शिकार या जंगली जानवरों की मौत होती है, वन विभाग का अमला उसकी निष्पक्षता से जांच के बजाये नई-नई कहानियां गढ़ कर पूरे मामले को दफनाने में जुट जाता है.

कुछ समय पहले ही जब बिलासपुर में बाघ के दांत मिले थे तो वन विभाग के अफसर ने उसकी जांच से पहले ही उसे बाघ का दांत मानने से इनकार कर दिया था. पत्रकारों की उपस्थिति में तत्कालीन डीएफओ का बयान आया था कि यह पेंगोलिन का दांत मालूम होता है. वहीं उपस्थित एक चिकित्सक ने उस वन अधिकारी को टोका कि इस तरह का बयान न दें क्योंकि पेंगोलिन के दांत नहीं होते.

भोरमदेव की घटना से पहले राज्य के पंडरिया विकासखंड के अमनिया गांव में भी जब एक बाघ की सड़ी-गली लाश मिली तो तमाम सबूतों के बाद भी पूरा अमला उसे लकड़बग्घे की लाश बताने की कवायद करता रहा. बाद में एक वन्यप्राणियों से जुड़े संगठन के हस्तक्षेप के बाद विभाग ने माना कि सड़ी-गली लाश बाघ की है.

छत्तीसगढ़ के भोरमदेव अभ्यारण्य के जामुनपानी में मारी गई बाघिन को लेकर भी वन विभाग का अमला ऐसा ही लफ्फाजी वाला रव्वैया अपना रहा है. इलाके में बाघिन और उसके दो शावकों के मूवमेंट को लेकर वन विभाग को कई संस्थाओं ने पहले ही सूचना दी थी. नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथारिटी को तो बजाप्ता पत्र भी लिखा गया लेकिन बाघ बचाने के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने वाले वन विभाग की नींद नहीं टूटी.

बाघों को लेकर छत्तीसगढ़ के अफसरों का वन अमला कैसी कुंभकर्णी खर्राटे वाली नींद में डूबा है, इस बात का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि कान्हा वन क्षेत्र के अधिकारियों ने एनटीसीए और चीफ वाइल्ड लाईफ वार्डन, छत्तीसगढ़ को बजाप्ता पत्र लिख कर इस बात की सूचना दी थी कि कान्हा के इलाके की एक बाघिन (एस-4) के छत्तीसगढ़ के इलाके में देखे जाने की सूचना है. लेकिन अफसरों की नींद नहीं खुली.

जब बाघिन का शिकार हो गया और जंगल से निकल कर यह खबर शहर तक पहुंची तब कहीं जा कर वन विभाग के अफसरान बाघ की हालत जानने के लिये इलाके में पहली बार पहुंचे. यह जानना दिलचस्प है कि जब 15 नवंबर को राजधानी तक खबर पहुंची थी, उस दिन नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथारटी के डिप्टी डायरेक्टर भी राजधानी में थे लेकिन डिप्टी डायरेक्टर को घटना वाले इलाके के बजाये उन्हें पहले से निर्धारित मैनपुर और कांकेर के दौरे पर ले जाया गया.

अफसर की जुबानी, बाघिन के शिकार की कहानी
वन विभाग ने शुरुवाती दौर में दावा किया कि जामुनपानी में सबसे पहले वहां वन विभाग के दैनिक वेतनभोगी चौकीदार वीर सिंह ने 15 नवंबर की दोपहर 2.30 बजे के आसपास बाघिन की लाश देखी थी, जिसके बाद उसने विभाग को सूचना दी और आनन-फानन में यह खबर विभाग तक पहुंची.

वन विभाग के डीएफओ विश्वेश कुमार का कहना है कि घटना से केवल 24 घंटे पहले यानी 14 नवंबर की दोपहर 2.30 बजे के आसपास महाराजपुर के चरवाहे शिवकुमार यादव की गाय पर बाघिन ने हमला किया था. जिसके बाद शिवकुमार को आधी रात के आसपास यानी 15 नवंबर को जंगल में जाते देखा गया. विश्वेश कुमार ने आशंका जताई कि शिवकुमार ने गाय की लाश में जहर डाला होगा, जिसे खाने के बाद बाघिन की मौत हो गई. विश्वेश कुमार ने दावा किया था कि जहां बाघिन का शव मिला है, उससे 400 मीटर की दूरी पर मृत गाय मिली, जिसका शरीर संभवतः जहर के कारण काला पड़ गया था.

लब्बो लुबाब ये कि 14 नवंबर की दोपहर को हमला किया और बाद में शिवकुमार की गाय को खा कर बाघिन रात में मर गई और 15 नवंबर की दोपहर में चौकीदार ने उसे देखा.

दो दिन बाद कहानी में ट्विस्ट आई और विश्वेश कुमार के अनुसार शिवकुमार की गाय पर हमले के बाद वन विभाग के कर्मचारी वीरसिंह ने गाय के शव के गरदन वाले हिस्से में जहर मिलाया, जहां बाघिन ने हमला कर जख्म बना दिया था. कहा जा रहा है कि इसी गाय का शव खा कर बाघिन मर गई. वन विभाग के अमले ने बाघिन के 19 नग नाखून, मूछ के बाल, दो दांत समेत कुछ और सामान जप्त किये और वीर सिंह समेत 5 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. वीरसिंह समेत दूसरे अभियुक्तों के परिजनों का आरोप है कि उन्हें बलि का बकरा बनाया गया है.

सवाल दर सवाल
वन विभाग की इस पूरे किस्से को लेकर कई सवाल हैं, जिसका जवाब दिया जाना जरुरी है. जामुनपानी जैसे ठंढे इलाके में अगली सुबह यानी 16 नवंबर को जब बाघ का अंतिम संस्कार किया जा रहा था तो पूरा इलाका उसकी सड़ी हुई लाश की बदबू से भरा हुआ था. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर बड़ी मुश्किल से बाघिन की सड़ी हुई लाश से उसके शरीर के अंग तलाश कर पा रहे थे. घटनास्थल पर पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर ने स्वीकारा कि लाश इतनी सड़ चुकी है कि बाघिन के शरीर के आंतरिक हिस्सों को तलाश कर पाना मुश्किल था. क्या यह संभव है कि अधिकतम 30-35 घंटे में जामुनपानी जैसे ठंढे इलाके में बाघिन की लाश इस तरह से सड़ जाये ? मौके पर मौजूद अफसर उस समय मानते रहे कि बाघिन को मरे हुये कम से कम तीन दिन यानी 72 घंटे से अधिक हो चुके हैं.
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