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भोपाल में गैस पीड़ितों पर पुलिस फायरिंग

भोपाल में गैस पीड़ितों पर पुलिस फायरिंग

भोपाल. 3 दिसंबर 2011
 

भोपाल में फायरिंग

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हुई गैस त्रासदी की 27वीं बरसी पर प्रदर्शन कर रहे लोगों पर किये गये पुलिस फायरिंग में बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने की खबर है. हालांकि पुलिस ने दावा किया है कि फायरिंग हवा में की गई थी और लोग भगदड़ के कारण घायल हुये हैं.

घटनास्थल पर उपस्थित लोगों के अनुसार शनिवार को रेल चक्का जाम कर रहे पीड़ितों का प्रदर्शन तब उग्र हो गया जब उन पर पुलिस ने लाठी चार्ज की. पुलिस कार्रवाई से उग्र आंदोलनकारियों ने कई वाहनों में आग लगा दी और जमकर तोडफ़ोड़ की. पुलिस का कहना है कि हालात को देखते हुए पुलिस को हवाई फायरिंग करनी पड़ी.

गौरतलब है कि ठीक 27 वर्ष पहले दो-तीन दिसम्बर 1984 की रात यूनियन कार्बाइड से जहरीली गैस रिसी थी, जिसमें लाखों लोग प्रभावित हुये थे. इसी मुद्दे को लेकर आज हजारों की संख्या में प्रभावितों ने प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों के अनुसार गैस त्रासदी को झेल रहे हजारों लोगों को अभी तक इंसाफ नहीं मिला है. जबकि यूनियन कार्बाइड कंपनी यानी डाओ केमिकल का कहना है कि उनके पास कोई मुआवजा बाकी नहीं है.

हादसे की बरसी पर गैस पीड़ितों के हक की लड़ाई लडऩे वाले संगठनों ने अपनी-अपनी तरह से विरोध दर्ज कराने का ऐलान किया था. पांच संगठनों ने तीन दिसम्बर से बेमियादी रेल रोको आंदोलन का आह्वान किया था. इसी के तहत एशबाग स्टेडियम के पास स्थित रेलवे क्रासिंग पर सुबह गैस पीड़ित रेल लाइन पर लेट गए. उन्होंने एक मालगाड़ी को रोक दिया. लगभग दो घंटे तक मालगाड़ी रुके रहने के बाद पुलिस ने आंदोलनकारियों पर हल्का बल प्रयोग किया. इस पर आंदोलनकारी भड़क उठे. आंदोलनकारियों ने पथराव करने के साथ ही तोडफ़ोड़ शुरू कर दी और कई वाहनों में आग लगा दी. कई वाहन क्षतिग्रस्त हुए हैं. आंदोलन के उग्र होने पर दिल्ली- नागपुर मार्ग पर चलने वाली कई रेलगाड़ियों को भोपाल से पहले ही विभिन्न स्थानों पर रोकना पड़ा.

इससे पहले शुक्रवार को पांच संगठनों ने डाओ केमिकल्स को ओलंपिक- 2012 का प्रायोजक बनाए जाने के विरोध में एक रैली निकाली. उन्होंने ओलंपिक आयोजन समित के चेयरमैन सेबेस्टियन के पुतले जलाए. गौरतलब है कि इस मामले में 1989 में हुए एक समझौते के अनुसार डाओ केमिकल्स 750 करोड़ रूपए का मुआवजा देने को राजी हुआ था. लेकिन गैस पीड़ित इस राशि को अपर्याप्त मानते हैं. गैस पीड़ितों का कहना है कि 1989 में मुआवजे को लेकर जो समझौता हुआ था, वह सही नहीं था. उन्होंने कहा कि इसके बाद साल 2010 में इसके खिलाफ जो याचिका लगाई गई, उसमें मरने वालों की संख्या और पीड़ितों की संख्या बहुत ही कम बताई गई थी. उन्होंने कहा कि पीड़ितों की बीमारियों की गंभीरता को भी इस याचिका में अनदेखा कर दिया गया.


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