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संसद हमले की दसवीं बरसी में शहीदों के परिजन नहीं

संसद हमले की दसवीं बरसी में शहीदों के परिजन नहीं

नई दिल्ली. 13 दिसंबर 2011

संसद हमला


संसद पर हमले की दसवीं बरसी के अवसर पर संसद में आयोजित श्रद्धांजलि के कार्यक्रम में शहीदों का परिवार नहीं पहुंचा. दस साल पहले 13 दिसंबर 2001 को जैश-ए-मोहम्मद के पांच आतंकियों ने संसद पर हमला किया था. इस हमले का संसद परिसर में तैनात सुरक्षा बलों ने मुंहतोड़ जवाब दिया था और सभी पांच आतंकियों को मार गिराया था. इस हमले में नौ सुरक्षाकर्मी शहीद हुये थे.

मंगलवार को संसद में इस हमले की दसवीं बरसी पर श्रद्धांजलि का कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज समेत भारत सरकार के अधिकांश मंत्री और सांसद शामिल हुये और संसद पर हमले में मारे गये लोगों को श्रद्धांजलि दी. लेकिन इस पूरे आयोजन में शहीदों के परिजन शामिल नहीं हुये. हमले में मारे गये नौ सुरक्षाकर्मियों में भी किसी के भी परिजन आयोजनस्थल पर नहीं पहुंचे.

सरकार की वादाखिलाफी से नाराज परिजनों का आरोप है कि सरकार केवल 13 दिसंबर को शहीदों और उनके परिजनों को याद करती है, उसके बाद शहीदों के परिजनों की सुध लेने वाला कोई नहीं है.

इससे पहले भी सरकार ने दिल्ली पुलिस के असिस्टेंट सब−इंस्पेक्टर नानक चंद के परिवार को कीर्ति चक्र देने की बात कही थी लेकिन नानकचंद के परिजनों ने यह कहते हुये सम्मान लेने से इंकार कर दिया कि सरकार ने उनकी कोई सुध नहीं ली. इसके अलावा परिजन इस बात से भी नाराज थे कि हमले के आरोपी अफजल गुरु को फांसी नहीं दी गयी.

पिछले साल के आयोजन में कुछ शहीदों के परिजन संसद में आये थे लेकिन इस बार सभी शहीदों के परिजनों ने दसवीं बरसी का बहिष्कार कर दिया. एक शहीद के परिजन का कहना था कि अगर कोई नेता इस हमले में मारा जाता तो सरकार का रव्वैया कुछ और होता लेकिन गरीब सिपाही इस हमले में मारे गये तो कोई पूछने नहीं आया. कुछ शहीदों के परिजनों का कहना था कि अगर सरकार सुरक्षाकर्मियों को छठवां वेतन आयोग का लाभ दे दे तो शहीदों के परिजनों को मिलने वाली पेंशन की राशि में भी इजाफा हो जाएगा लेकिन बार-बार अनुरोध के बाद भी सरकार ने सुध नहीं ली.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

kuldeep sehdev [kuldeepsehdev@gmail.com] ludhiana - 2011-12-13 08:05:53

 
  अगर इस बेईमान सरकार का बस चलता तो इन शहीदों को दोषी बना देती और संसद पर हमला करने वालों को मासूम और बेगुनाह साबित करके उनके परिवार वालों को भारी भरकम मुआवज़ा भी अदा कर देती और मारे गये मासूम आतंकवादियों की तस्वीरें संसद परिसर में लगाकर उनपर फूलों के हार भी डालती. इन बेशर्म नेताओं की करतूतों को देख सुन कर दिल यही कहता है कि काश उन आतंकवादियों का मिशन सफल हो गया होता. 
   
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