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लोकपाल पर मनमोहन सिंह धृतराष्ट्र जैसे चुप थे

लोकपाल पर मनमोहन सिंह धृतराष्ट्र जैसे चुप थे

नई दिल्ली. 30 दिसंबर 2011

अन्ना हजारे


राज्यसभा में लोकपाल बिल पर मतदान नहीं कराये जाने के कांग्रेस के निर्णय और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भूमिका पर सवाल उठाते हुये अन्ना हजारे की टीम ने कहा है कि द्रौपदी का चीरहरण होता रहा और धृतराष्ट्र बैठे रहे. टीम अन्ना ने कहा कि सरकार जानती थी कि उसके पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है, इसलिये वह मतदान से भाग गई.

टीम अन्ना के सदस्य शांति भूषण ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भूमिका पर सवाल उठाते हुये कहा कि गुरुवार की रात जितने लोग भी टीवी देख रहे थे, उन्होंने देखा कि द्रौपदी का चीरहरण होता रहा और धृतराष्ट्र बैठे रहे.

इधर टीम अन्ना की कोर कमेटी के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने कहा कि राज्यसभा में जो कुछ हुआ है, वह लोकतंत्र की हत्या है. उन्होंने कहा कि सरकार का मजबूत लोकपाल लाने का दावा खोखला साबित हुआ. लोकसभा के अंदर जो कानून आया, वह बहुत कमजोर था. उसका कोई फायदा नहीं था. बहुमत का गलत इस्तेमाल करके गलत बिल पास करवा लिया गया. लेकिन सरकार का राज्यसभा में बहुमत नहीं है.

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि विपक्ष ने187 संशोधन दिए. लेकिन मोटे तौर पर 3 संशोधनों पर आम राय थी. इसमें सीबीआई को लोकपाल के दायरे में लाना, लोकपाल का चयन और हटाना और लोकायुक्त को इस कानून से बाहर रखा जाए. अगर गुरुवार को वोटिंग होती तो तीनों पास हो जाते. अगर ऐसा होता तो एक ऐसा लोकपाल निकल सकता था, जो शुरुआत करने लायक लोकपाल होता. लेकिन सरकार की मंशा कुछ और थी. लालू प्रसाद यादव और आरजेडी को सामने किया गया.

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि शाम से ही टीवी चैनलों पर आने लगा कि सदन की कार्यवाही बाधित की जाएगी. बयानों को लंबा खींचा गया और सदन की कार्यवाही होते-होते 12 बज गए. संसदीय प्रावधानों का गलत इस्तेमाल करके संसद की कार्यवाही बाधित की. यह पूरी तरह से सरकार की साजिश थी. यह संसद और इस देश की जनता के साथ साजिश है.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Bhartiya [bhartiya@bharatvarsh.com] Bharat - 2011-12-31 08:09:33

 
  कांग्रेस के द्वारा संविधान के प्रावधानों का अपने पक्ष में इस्तेमाल करने का ये कोई पहला वाक्या नहीं है | इमरजेंसी इसका एक उदहारण थी | दुःख तो इस बात का है की सबसे बड़े लोकतंत्र के सत्ताधीशों को अब सेमिकोलोन और कॉमाँ के सहारे अपनी गलती छुपाने का प्रयास करते हुए देखा जा रहा है | कितने सांसद ऐसे होंगे जिन्हें खुद नहीं पता की वो एक सेमीकोलोन में उलझे \"सेन्स ऑफ हॉउस\" के पक्ष में खड़े हो रहे हैं | सरकार के तर्क अब जनता के गले नहीं उतर रहे हैं और सरकार \"ऑल इज वेळ\" करते हुए गर्त में समाती चली जा रही है |  
   
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