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सलमान रुश्दी ने कहा-नहीं चाहिये वीजा

सलमान रुश्दी ने कहा-नहीं चाहिये वीजा

नई दिल्ली. 10 जनवरी 2012

रुश्दी सलमान


देवबंद द्वारा विवादास्पद लेखक सलमान रुश्दी का विरोध और भारत सरकार से उन्हें वीजा नहीं देने की मांग को लेकर सलमान रुश्दी ने कहा है कि भारत आने के लिए उन्हें वीजा लेने की जरुरत ही नहीं है. सलमान रुश्दी ने यह जानकारी ट्विटर पर पोस्ट की है.

सलमान रुश्दी इस महीने के अंत में जयपुर में आयोजित जयपुर साहित्य उत्सव में आमंत्रित किये गये हैं. सलमान रुश्दी के आगमन का दारुल उलूम देवबंद ने कड़ा विरोध किया है. देवबंद के कुलपति ने कहा है कि अगर सलमान रुश्दी का वीजा रद्द नहीं किया गया तो वे प्रधानमंत्री और विदेश मंत्रालय को पत्र लिख कर विरोध दर्ज कराएंगे. अगर सरकार ने कुछ नहीं किया तो वे खुद उचित कार्रवाई करेंगे.

गौरतलब है कि 65 साल के सलमान रुश्दी की किताब सैटेनिक वर्सेस भारत में प्रतिबंधित है. 1988 में आई उनकी किताब सैटेनिक वर्सेस ने उन्हें विवादों के घेरे में खड़ा कर दिया. कहा गया कि इस किताब से पैगंबर मोहम्मद का अपमान होता है. भारत के अलावा दुनिया के कई मुस्लिम देशों में इस किताब को प्रतिबंधित कर दिया गया. 14 फरवरी 1989 को ईरान के मुस्लिम धार्मिक नेता अयातुल्ला रूहोल्लाह खोमैनी ने सलमान रुश्दी के खिलाफ मौत का फतवा जारी कर दिया.

हालत ये हुई कि इस विवाद के कारण कई देशों में दंगे हुये, ईरान जैसे राष्ट्र के इंग्लैंड से राजनयिक संबंध खत्म हो गये. सलमान रुश्दी की हत्या के भी कई प्रयास किये गये. बाद में विश्व समुदाय के दबाव में ईरान ने यह कहते हुये सलमान रुश्दी की मौत का फतवा वापस लेने से इंकार कर दिया कि फतवा वही वापस ले सकता है, जिसने इसे जारी किया था और इसे जारी करने वाले अयातुल्ला रूहोल्लाह खोमैनी की मौत हो गई है. यानी सलमान रुश्दी अभी भी मौत के फतवे के साये में जी रहे हैं.

इसी फतवे को आधार बनाते हुये उनका विरोध होता रहा है. अब दारुल उलूम देवबंद के प्रमुख मौलाना अब्दुल कासिम नोमानी ने एक कहा है कि भारत सरकार को सलमान रुश्दी का वीज़ा रद्द कर देना चाहिए. रुश्दी ने मुसलमानों की भावनाओं को चोट पहुँचाई है.

अब्दुल कासिम नोमानी के मुताबिक यदि उनका दौरा होता है, तो यह मुसलमनों के जख्म पर नमक लगाने जैसा होगा. उन्होंने हमारी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई है. उन्होंने कहा कि यदि सरकार उनका वीजा रद्द नहीं करती है तो हम इस बारे में विदेश मंत्रालय, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखेंगे और सरकार ने फिर भी कोई कार्रवाई नहीं की तो हम खुद ही इस बारे में उचित कार्रवाई करेंगे.

भारत में 1947 में जन्में सलमान रुश्दी के 1975 में पहली बार प्रकाशित ग्राइमस उपन्यास को भले सफलता नहीं मिली हो लेकिन 1981 में उनके उपन्यास मिडनाइट्स चिल्ड्रन को उस साल बुकर अवार्ड से नवाजा गया. 1993 और 2008 में इसे सर्वश्रेष्ठ बुकर का अवार्ड मिला. इस किताब को दुनिया की सौ श्रेष्ठ कृतियों में से एक माना जाता है. 1983 में जुल्फ़िकार अली भुट्टो और जनरल जिया उल हक को आधार बना कर लिखा गया उपन्यास शेम भी चर्चित रहा. 1987 में निकारागुआ पर आधारित एक किताब द जगुआर स्माइल को भी लोगों की सराहना मिली. लेकिन सैटेनिक वर्सेस के विवाद की आंच ने इस लेखक को हमेशा के लिये एक निर्वासित जीवन का अभिशाप भी दे दिया, जिसके साथ वे धमकियों के साये में जीवन गुजार रहे हैं.

अब सलमान रुश्दी ने देवबंद के विरोध पर ट्विटर में टिप्पणी की है कि भारत आने के लिए उन्हें वीजा लेने की जरुरत ही नहीं है. माना जा रहा है कि सलमान रुश्दी भारत में पैदा हुये हैं. इस लिहाज से उन्हें भारत आने के लिये किसी वीजा की जरुरत नहीं होगी.


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