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विदेशियों के सामने आदिवासी लड़कियों को नंगा नचाया

विदेशियों के सामने आदिवासी लड़कियों को नंगा नचाया

नई दिल्ली. 11 जनवरी 2012

आदिवासी लड़कियां


विदेशी पर्यटकों के सामने अंडमान निकोबार द्वीप समूह की जारवा आदिवासी लड़कियों को अधनंगा करके नचाने का मामला सामने आने के बाद अब राज्य का पुलिस महकमा पूरे मामले की लीपापोती में लगा हुआ है. राज्य के पुलिस महानिदेशक ने आदिवासी लड़कियों के नाचने वाले वीडियो की शूटिंग किये जाने पर मामला दर्ज करने की जानकारी देते हुये कहा है कि यह वीडियो आधारहीन और अविश्वसनीय है.

गौरतलब है कि ब्रिटिश मीडिया में यह सनसनीखेज रहस्योद्घाटन किया गया है कि अंडमान की लुप्तप्राय जारवा आदिवासियों को थोड़े से पैसे और बिस्किट का लालच दे कर उन्हें लगभग अधनंगी हालत में नचाया जाता है. द ऑब्जार्वर और गार्जियन ने दावा किया है कि जिन पुलिस वालों को इन जारवा आदिवासियों को पर्यटकों से दूर रखने का जिम्मा दिया गया था, उन्हीं पुलिस वालों ने 15 हजार रुपये की रिश्वत लेकर विदेशी पर्यटकों को जारवा आदिवासियों से मिलवाया. इसके बाद पुलिस वाले ने पैसे और बिस्किट का लालच देकर जारवा लड़कियों को नाचने पर मजबूर किया.

पत्रकारों ने इस पूरे मामले की वीडियो की भी शूटिंग की. गार्जियन अखबार ने तो अपनी वेबसाइट पर एक ऐसी वीडियो जारी भी की है, जिसमें पुलिसवाला जारवा लड़कियों को नंगे बदन नाचने के लिये प्रलोभन दे रहा है. इधर मीडिया में खबर आने के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अंडमान निकोबार प्रशासन से पूरे मामले की 24 घंटे के अंदर रिपोर्ट मांगी है.

कवि लीलाधर मंडलोई ने अपनी किताब काला पानी में जारवा समुदाय पर विस्तार से लिखा है. मंडलोई के अनुसार अंडमान द्वीप समूह में नीग्रो मूल की चार दुर्लभ जनजातियाँ हैं, जारवा इनमें से एक है. इनकी जीवन शैली पाषाण युग के मनुष्य की तरह है. अंदमान-निकोबार के द्वीपों के सर्वेक्षण के दौरान अंग्रेज अफसरों ने पहले-पहल इन्हें 1790 में देखा. दक्षिणी अंदमान से निर्वासन के बाद 1863 से 1915 के बीच हुए छिटपुट संपर्क के समय इनके जीवन के संबंध में मामूली जानकारियाँ मिलीं. 1991 में ‘पाप-लुंगटा-जिग’ नामक जगह की एक पहाड़ी पर इनकी झोपड़ी देखने में आई जिसका आकार 45’×30’×15’ फुट था. यह मचान शैली की थी.

मंडलोई का दावा है कि इनसे प्रथम आत्मीय संपर्क 1974 में हुआ, जब उन्होंने समुद्री किनारे पर रखे गए उपहार स्वीकार किए. किन्तु उन्होंने किसी को अपने इलाक़े में उतरने की अनुमति नहीं दी. और आज लगभग 31 वर्ष हो गए, वे अभी तक सिर्फ़ उपहार स्वीकार करते हैं जिसमें फल, बर्तन और चावल आदि दिया जाता है. वे अब भोजन को पकाने के नाम पर मछली, केंकड़े, सूअर, कछुआ, जैसे जीवों को आग में भूनकर खाते हैं. नमक, तेल-मिर्च-मसाला का इस्तेमाल उन्हें नहीं आता. शराब, बीड़ी, सिगरेट और तम्बाकू के सेवन से भी दूर हैं.

एकाधिकार और सुरक्षा की भावना से वे किसी को भी अपने द्वीप में ठहरने की अनुमति नहीं देते. आज़ादी के बाद आए लोगों में, जो अंदमान में बसे, उसमें सिर्फ़ एक व्यक्ति था बख्तावर सिंह, जिन्हें जारवा आदिवासियों ने मित्र रूप में स्वीकार किया. संपर्क समिति में बख्तावर सिंह की उपस्थिति अनिवार्य थी. उनके साथ जाने पर ही आप जारवा आदिवासियों को नज़दीक से देखने का अवसर पा सकते थे.

जारवा आदिवासियों की औसत ऊँचाई 5 फुट है. रंग नीग्रो जनजाति की तरह गहरा काला है. बाल घुँघराले और शरीर एकदम स्वस्थ है. जारवा बेहद चुस्त और गजब के फुर्तीले हैं. उनकी अनुमानित संख्या 225 से 250 के बीच है. जिसमें लगभग 40 बच्चे हैं. वे समूह में रहते हैं. कपड़े नहीं पहनते और पूरी तरह शिकार और वनोपज पर आश्रित हैं. सूअर, कछुआ, मछली और गोह का शिकार उन्हें प्रिय है. शिकार के लिए कई दिनों तक जंगलों में निकल जाते हैं. जगह-जगह अस्थायी ठिकाने बनाते हैं और पर्याप्त भोज सामग्री मिलते ही पक्के ठिकानों पर लौट आते हैं. चूँकि अलग-अलग समूह का शिकार स्थान पूर्व-निर्धारित होता है, इसलिए इनमें झगड़े नहीं होते. जारवा आदिवासियों में अद्भुत एकता है. समय आने पर सभी एक साथ उठ खड़े होते हैं और मुसीबतों का मुक़ाबला करते हैं. इस जनजाति में महिला का प्रभुत्व है. समाज मातृसत्तात्मक है. पुरुष सिर्फ़ एक पत्नी रख सकता है.

हालांकि पिछले कुछ सालों में सरकारी प्रयासों के बाद जारवा समुदाय के कुछ लोगों ने कपड़े पहनना शुरु किया है लेकिन ये आदिवासी अभी भी कथित विकास की मुख्यधारा से दूर हैं और अपनी तरह से जीते हैं.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

suraj kumar das [dassurajkumar@rediffmail.com] delhi - 2012-01-13 10:35:24

 
  शर्म हया वाले हमारे भारत देश की ये नवीनतम घटना भले ही बुरी है मगर इसके लिए हम सभ भी जिम्मेवार हैं. आखिर चांद पर जाने वाले 21सी सदी में भी आदिवासियों को मुख्यघारा से क्यों नहीं जोड़ा जा सका और फिर एक बिस्कुट के लिए कोई क्यों अपनी इज्जत लुटाएगी. साहब ये पापी पेट है जो सब करवाता है. जब भूख लगी हो तो कुछ नहीं नज़र आता है. लाखों टन अनाज बरबाद हो रहा है, लाखों करोड़ों रुपए सड़ रहे हैं. अमीर देश होने के बाद भी लोग भूखे और नंगे क्यों ह. जब कमजोरी हमारी है तो दूसरे को क्यों दोष दें.  
   
 

S.P. VERMA [spv1809@gmail.com] DAMEHARI- ANUPPUR - 2012-01-12 12:10:34

 
  हमारी संस्कृति, सभ्यता और विरासत अमूल्य है. Jarawa Tribe is one of the integral part of our social/cultural inheritance. we condemn this act & demand that strong action must be taken against those who have committed this crime. 
   
 

praveen [praveen.suryavansh@gmail.com] varanasi - 2012-01-11 22:17:29

 
  विदेशियों को जूते मारना चाहिये और जो अधिकारी इसमें शामिल है, उनकी मुंछ और सिर मुड़वा दो. 
   
 

Ashok singh [] ara bihar - 2012-01-11 14:48:24

 
  Its shameful for our country. We want complete action against them who involved that crime.  
   
 

sikandar [] shivpuri - 2012-01-11 13:40:35

 
  यदि विदेशियों के सामने लड़कियों ने अर्धनग्न हो कर नाचा है तो यह हमारी संस्कृति का अपमान है और शर्म आनी चाहिये ऐसे लोगों को, जिन्होंने यह काम किया है. ऐसा काम करवाने वाले और ऐसा दृश्य देखने वालों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिये. 
   
 

AJAY SHARMA [ajay.triport@gmail.com] NOIDA - 2012-01-11 12:15:11

 
  जब तक बाज़ार का वर्चस्व कायम रहेगा और मानवीयता के हर पक्ष को अर्थतंत्र से जोड़ा जाता रहेगा ऐसी शर्मसार घटनाएँ घटती रहेंगी। क्यों-कि हर चीज़ का परम नियंत्रक अब बाज़ार है। समाज और सामाजिक मूल्यों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया है।  
   
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