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छत्तीसगढ़ में सुप्रीम कोर्ट का आदेश ठेंगे पर

छत्तीसगढ़ में सुप्रीम कोर्ट का आदेश ठेंगे पर

रायपुर. 16 जनवरी 2012 छत्तीसगढ़ संवाददाता

सुप्रीम कोर्ट


सुप्रीम कोर्ट ने देश भर के सरकारी स्कूलों में पेयजल और शौचालय की व्यवस्था पर राज्यों के मुख्य सचिवों से शपथ पत्र के साथ जानकारी मांगी थी. सभी राज्यों से पीने के पानी और शौचालय की व्यवस्था 31 दिसंबर तक करने के निर्देश दिए गए थे. लेकिन छत्तीसगढ़ में अभी भी हजारों प्राथमिक और मिडिल स्कूल ऐसे हैं, जहां न तो पीने के पानी की व्यवस्था है न शौचालय और न ही बिजली.

पिछले सालों के दौरान प्रदेश में हजारों की संख्या में प्रायमरी और मिडिल स्कूल खुले हैं. लेकिन इन स्कूलों में विद्यार्थियों के लिए सुविधाओं का भारी अभाव है. राज्य में स्कूल शिक्षा विभाग के प्रायमरी स्कूलों की संख्या 12 हजार 8 सौ 69 और मिडिल स्कूलों की संख्या 33 सौ 41 है. पिछले कई सालों से स्कूलों में पेयजल उपलब्ध कराने के लिए बजट प्रावधान किया जा रहा है. लेकिन एजेंसियां समय पर काम नहीं कर पातीं, इसलिए अभी भी हजारों की संख्या में स्कूलों में पेयजल और दूसरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं.

प्रदेश के 1404 प्राथमिक स्कूल ऐसे हैं, जहां पर पीने के पानी के लिए हैंडपंप नहीं है. सात सौ 41 मिडिल स्कूलों में भी पेयजल की सुविधा नहीं है. इसी तरह 66 सौ 48 प्रायमरी और 19 सौ 39 मिडिल स्कूलों में शौचालय की सुविधा नहीं है. जिन स्कूलों में शौचालय बने भी हैं, वहां पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने के कारण विद्यार्थी उनका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं.

11 हजार 318 प्राथमिक और 801 माध्यमिक स्कूलों में तो बिजली की सुविधा तक नहीं है. गर्मी के दिनों में छात्रों का स्कूल के कमरों में बैठना मुश्किल हो जाता है. राज्य सरकार ने स्कूलों में पेयजल और शौचालय की व्यवस्था के लिए पिछले बजट में 90 करोड़ रुपए का प्रावधान किया था. जबकि सभी स्कूलों में यह सुविधा उपलब्ध कराने के लिए 700 करोड़ से भी ज्यादा की जरूरत है.

स्कूल शिक्षा विभाग ने इसके लिए 702 करोड़ रुपए की मांग की थी पर एजेंसियों की क्षमता को देखते हुए बजट में सिर्फ 90 करोड़ रुपए रखे गए. यह राशि भी खर्च नहीं हुई है.

स्कूलों में पेयजल की सुविधा के लिए प्रति स्कूल 1 लाख रुपए और शौचालय के लिए 50 हजार रुपए का प्रावधान किया गया है. इसी तरह अहाता निर्माण के लिए 5 लाख रुपए और बिजली के लिए 15 हजार रुपए स्वीकृत किए गए हैं. प्रदेश में अभी हजारों स्कूल ऐसे भी हैं, जहां पर अहाता नहीं है. इसी तरह सैकड़ों स्कूलों के खुद के भवन नहीं है. हजारों स्कूलों के भवन तो जर्जर हो गए हैं.

जिन स्कूलों के लिए इस साल बजट प्रावधान किया गया था, उनमें से ज्यादातर का काम अभी लंबित ही है. पांच लाख रुपए तक के भवन निर्माण का अधिकार पंचायतों को है. जिन पंचायतों को स्कूल निर्माण के लिए राशि जारी की गई थी उनमें से कई ने तो राशि खर्च कर दी और भवन का काम भी अधूरा पड़ा है. पांच लाख से अधिक के कार्य लोक निर्माण विभाग के माध्यम से कराए जा रहे हैं. लेकिन विभाग के पास भी पर्याप्त स्टाफ और क्षमता नहीं होने के कारण ज्यादातर कार्य पूरे नहीं हुये हैं.


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