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संसदीय प्रणाली महज औपचारिक लोकतंत्र

संसदीय प्रणाली महज औपचारिक लोकतंत्र

पांचवीं कंचना स्मृति राष्ट्रीय व्याख्यानमाला

 

नई दिल्ली. 30 सितंबर 2008


विख्यात गांधीवादी नेता तथा दर्शनशास्त्री प्रो. रामजी सिंह ने कहा है कि भारत में दलगत राजनीति का दिया बुझ चुका है. दलगत राजनीति व सत्ता पर दलपतियों का कब्जा है और संसदीय प्रणाली महज औपचारिक लोकतंत्र बन गया है. उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनशक्ति ही सर्वोच्च है और अगर इस प्रणाली को जीवित रखना है तो फिर जनता के सवालो को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी.

कंचना स्मृति न्यास द्वारा राजेंद्र भवन में आयोजित पांचवीं कंचना स्मृति राष्ट्रीय व्याख्यानमाला भारतीय लोकतंत्र के सवाल विषय पर बोलते हुए प्रो. सिंह ने जनजागरण पर विशेष जोर दिया और कहा कि भ्रष्टाचार, बेईमानी, दलबदल सांसद निधि का दुरूपयोग, नोट के बदले वोट, राजनीति के अपराधीकरण जैसे मुद्दों के बीच सभी राजनीतिक दल अपनी तस्वीर देख लें. अगर चुना हुआ प्रतिनिधि कसौटियों पर खरा नहीं उतरता तो उसे वापस बुलाने का अधिकार जनता के पास होना चाहिए.

उन्होंने कहा कि जिस देश में 78 करोड़ लोगों की आय 1 या सवा डालर प्रतिदिन हो वहां गरीबी ,बेकारी तथा बदहाली का अंदाज लगाया जा सकता है. उन्होंने पूछा कि स्विस बैंकों में किन भारतीयों का 58 बिलियन डालर जमा है? उन्होंने कहा कि संसदीय लोकतंत्र या तो मरनेवाला है या मर चुका है और इसी लोकतंत्र ने इंदिरा गांधी और हिटलर दोनो को पैदा किया है.

पूर्व विधि एवं न्याय मंत्री शांति भूषण ने अपने संबोधन में कहा कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उसे सरकार और तमाम ताकतें मिल कर भी नहीं मिटा सकती है. 1977 की करवट ने इसे दिखा दिया, जब पूरे उत्तर भारत में कांग्रेस को केवल एक सीट मिली थी. उन्होंने कहा कि आज राजनीति में धनशक्ति प्रधान हो गयी है जबकि शुरू के चुनावों में धन नहीं चलता. लेकिन लोकतंत्र में धनशक्ति की बढ़ती भूमिका को रोकना असंभव नही है.

विभाजनकारी राजनीति की तीखी आलोचना करते हुए शांति भूषण ने कहा कि पोटा कानून लाने पर आतंकवाद की समस्या हल करने की बात महज ख्याली पुलाव है. उन्होंने भूअधिग्रहण को लेकर चल रहे आंदोलनो का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस किसान की जमीन विकास कार्यो के लिए ली जाये उस किसान को पार्टनर इन डेवलपमेंट बनाया जाये. उन्होंने कहा कि मीडिया को न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को उजागर करने से डरना नहीं चाहिए. मीडिया अदालतों के मामले में आम तौर पर मौन रहती है,पर अगर सभी मिल कर ऐसी गड़बड़ियों को उजागर करेंगे तो गलत लोगों में भय होगा.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद दिग्विजय सिंह ने कहा कि महात्मा गांधी का लोकतंत्र करूणा से भरा था पर भूमंडलीकरण का लोकतंत्र प्रतिस्पर्धा से होड़ ले रहा है. इसी का असर है कि ग्रेटर नोएडा में एक सीईओ की हत्या पर देश के प्रधानमंत्री को दुनिया से माफी मांगनी पड़ रही है. उन्होंने कहा कि आज संसद में फेरा, फेमा और पूंजी निवेश पर वाद विवाद होता रहता है पर गरीबों से जुड़े बुनियादी सवालों पर नहीं.

जानी-मानी पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी ने इसे चिंताजनक बताया कि आम आदमी की आवाज खत्म होती जा रही है. मीडिया की मौजूदा भूमिका को कटघरे में खडा करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें तमाम कमियां भले आ गयी हों, फिर भी कुछ जगह बची है जिसका अभी भी उपयोग किया जा सकता है. नीरजा चौधरी ने कहा कि भले ही सुश्री मायावती,लालू यादव और मुलायम सिंह इस लोकतंत्र की उपलब्धि हैं पर यह देखना भी जरूरी है कि इन दलों में कैसा लोकतंत्र है.


उन्होंने परिवारवाद पर भी उंगली उठायी और कहा कि उनको लगता है कि आधी संसद ही परिवारवाद का नमूना है. उन्होंने कहा कि परिवारवाद की जो दशा राजनीति में दिख रही है उनको लगता है कि आनेवाले 5-10 सालों में इस संसद पर 500 परिवारों का कब्जा होगा और उनका शासन होगा. उन्होंने कहा कि पहले राजनीति करने के लिए पैसा उद्योगपति देते थे पर अब तो पैसे के लिए ही राजनीति की जा रही है.

दैनिक हरिभूमि के स्थानीय संपादक अरविंद कुमार सिंह ने कंचना स्मृति न्यास के पांच आयोजनो के बारे में विस्तार से जानकारी दी और कहा कि पत्रकार कंचना की दर्दनाक मृत्यु के बाद उनकी जीवंत तथा बहुआयामी सक्रियता को सम्मान देने के इरादे से यह आयोजन हो रहा है. उन्होंने कहा कि इस बार कंचना स्मृति पुरस्कार के लिए कई नाम पर व्यापक विचार के बाद भी कोई मानकों पर खरा नहीं उतरा. इस नाते कंचना स्मृति न्यास के प्रबंध न्यासी अवधेश कुमार ने पुरस्कार की राशि को इस साल बिहार के बाढ़ पीड़ितो को मदद स्वरूप देने का फैसला लिया है.

पांचवीं कंचना स्मृति व्याख्यानमाला की अध्यक्षता प्रो. रामजी सिंह ने की जबकि संचालन वरिष्ठ पत्रकार शेष नारायण सिंह ने किया. धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ पत्रकार जयप्रकाश पांडेय ने किया. समारोह में बड़ी संख्या में लेखक, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद थे.


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