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गिलानी की पेशी से पहले का सस्पेंस

गिलानी की पेशी से पहले का सस्पेंस

इस्लामाबाद. 19 जनवरी 2012

युसूफ रजा गिलानी


प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी रहेंगे या जाएंगे, इन्हीं सवालों के साथ आज दुनिया भर की निगाहें पाकिस्तान उच्च न्यायालय पर लगी रहीं. युसूफ रजा गिलानी के वकीलों का दावा था कि गिलानी ने कोई भी गलत काम नहीं किया है और उनके खिलाफ अवमानना का मामला नहीं बनता. वहीं विपक्षी दल उनकी विदाई की घोषणा कर रहा था. गिलानी की पेशी से पहले रहमान मलिक ने कहा कि गिलानी की पेशी को ज्यादा तूल नहीं दिया जाना चाहिये.

गौरतलब है कि पाकिस्तान उच्चतम न्यायालय की 17 सदस्यीय पूर्ण पीठ ने प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी को अदालत की अवमानना के लिये जिम्मेवार ठहराते हुये उन्हें 19 जनवरी को स्वयं अदालत के सामने पेश होने का आदेश दिया था.

गौरतलब है कि जनरल परवेज मुशर्रफ ने राष्ट्रपति रहते हुये अक्टूबर 2007 में नेशनल रिकंसिलिएशन आर्डिनेंस यानी एनआरओ के तहत हत्या और भ्रष्टाचार का मामला झेल रहे राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों को आम माफी दे दी थी. इस माफी का लाभ वर्तमान राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और गृह मंत्री रहमान मलिक समेत कम से कम 8 हजार लोगों को मिला था.

इसके बाद पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता डॉ. मुबासर हसन और वरिष्ठ वकील एम. असलम खाकी ने पाकिस्तान उच्च न्यायालय में याचिका दायर करते हुये कहा कि राष्ट्रीय सुलह अध्यादेश पूरी तरह से गैर कानूनी है. इसके बाद 2009 में उच्चतम न्यायालय ने एनआरओ को असंवैधानिक करार दिया. इसके बाद से ही आसिफ अली जरदारी के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव अदालत ने बनाया लेकिन प्रधानमंत्री युसूफ रजा गिलानी ने जरदारी समेत दूसरे राजनेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की. उच्चतम न्यायालय का कहना था कि गिलानी स्विस अधिकारियों को राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के खिलाफ मनी लांड्रिंग के मामले फिर से खोलने के लिए पत्र लिखें लेकिन गिलानी ने इसका भी पालन नहीं किया. इस पर अदालत ने गिलानी को कड़ी चेतावनी दी थी.

इसके अलावा पिछले साल पाकिस्तान की आर्मी छावनी एबटाबाद में ओसामा बिन लादेन के अमरीकी सैनिकों के हाथों मारे जाने के बाद पाक राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने अपना तख्ता पलट किये जाने के डर से अमरीका को चिट्ठी लिख कर वादा किया था कि अमरीका जो-जो कहेगा, वे उसके अनुसार करने के लिये तैयार हैं. मेमोगेट कांड के नाम से यह मामला सामने आने के बाद जरदारी को काफी शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी.

अमरीका में पाकिस्तान के राजदूत हुसैन हक्कानी के खिलाफ एक पाकिस्तानी मूल के एक अमरीकी व्यापारी मंसूर ऐजाज ने एक लेख में आरोप लगाया था कि उन्होंने पाकिस्तान में ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी ने सेना की कमान बदलने और चरमपंथी संगठनों से नाता तोड़ने की बात कही थी. इसके लिये उन्होंने एक ज्ञापन बनाया था, जिसे ऐजाज ने अमरीका के वरिष्ठ सैन्य अधिकारी एडमिरल माइक मलेन को सौंपा था. ऐजाज के अनुसार जरदारी को शक था कि सेना उनका तख्ता पलट सकती है, इसलिये उन्होंने अमरीका से गुहार लगाई थी. माइक मलेन ने भी इस तरह का एक गुप्त ज्ञापन सौंपे जाने की पुष्टि की थी. लेकिन उनका कहना था कि इस ज्ञापन को उन्होंने गंभीरता से नहीं लिया था, इसलिये इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई थी. इस मेमोगेट कांड को लेकर भी उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक आयोग का गठन किया था, जिसने सोमवार को मामले की सुनवाई की थी.


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