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जारवा लड़कियों को नंगा नचाने वाले दो गिरफ्तार

जारवा लड़कियों को नंगा नचाने वाले दो गिरफ्तार

पोर्ट ब्लेयर. 19 जनवरी 2012

जारवा लड़कियां


अंडमान निकोबार की लुप्तप्राय जारवा जनजाति की महिलाओं को बिस्कुट के लिये अर्धनग्न नृत्य करवाने के मामले में पुलिस ने पहली बार दो लोगों को गिरफ्तार किया है. गिरफ्तार किये गये लोगों में एक गिफ्ट सेंटर का मालिक राजेश व्यास और टैक्सी ड्राइवर गुड्डू शामिल है. पुलिस का आरोप है कि जारवा लोगों के इलाके में ले जाने और उनकी रिकार्डिंग का पूरा इंतजाम इन्हीं लोगों ने किया था.

पुलिस का कहना है कि राजेश व्यास और गुड्डू पर्यटकों को प्रतिबंधित अंडमान टंक रोड में उस इलाके में ले जाते थे, जहां जारवा रहते हैं. इसके बदले ये पर्यटकों से भारी वसूली करते थे. इनके पास से इसके सबूत भी मिले हैं.

गौरतलब है कि ब्रिटिश मीडिया में यह सनसनीखेज रहस्योद्घाटन किया गया था कि अंडमान की लुप्तप्राय जारवा आदिवासियों को थोड़े से पैसे और बिस्किट का लालच दे कर उन्हें लगभग अधनंगी हालत में नचाया जाता है. द ऑब्जार्वर और गार्जियन ने दावा किया था कि जिन पुलिस वालों को इन जारवा आदिवासियों को पर्यटकों से दूर रखने का जिम्मा दिया गया था, उन्हीं पुलिस वालों ने 15 हजार रुपये की रिश्वत लेकर विदेशी पर्यटकों को जारवा आदिवासियों से मिलवाया. इसके बाद पुलिस वाले ने पैसे और बिस्किट का लालच देकर जारवा लड़कियों को नाचने पर मजबूर किया.

पत्रकारों ने इस पूरे मामले की वीडियो की भी शूटिंग की. गार्जियन अखबार ने तो अपनी वेबसाइट पर एक ऐसी वीडियो जारी भी की, जिसमें पुलिसवाला जारवा लड़कियों को नंगे बदन नाचने के लिये प्रलोभन दे रहा है.

कवि लीलाधर मंडलोई ने अपनी किताब काला पानी में जारवा समुदाय पर विस्तार से लिखा है. मंडलोई के अनुसार अंडमान द्वीप समूह में नीग्रो मूल की चार दुर्लभ जनजातियाँ हैं, जारवा इनमें से एक है. इनकी जीवन शैली पाषाण युग के मनुष्य की तरह है. अंदमान-निकोबार के द्वीपों के सर्वेक्षण के दौरान अंग्रेज अफसरों ने पहले-पहल इन्हें 1790 में देखा. दक्षिणी अंदमान से निर्वासन के बाद 1863 से 1915 के बीच हुए छिटपुट संपर्क के समय इनके जीवन के संबंध में मामूली जानकारियाँ मिलीं. 1991 में ‘पाप-लुंगटा-जिग’ नामक जगह की एक पहाड़ी पर इनकी झोपड़ी देखने में आई जिसका आकार 45’×30’×15’ फुट था. यह मचान शैली की थी.

मंडलोई का दावा है कि इनसे प्रथम आत्मीय संपर्क 1974 में हुआ, जब उन्होंने समुद्री किनारे पर रखे गए उपहार स्वीकार किए. किन्तु उन्होंने किसी को अपने इलाक़े में उतरने की अनुमति नहीं दी. और आज लगभग 31 वर्ष हो गए, वे अभी तक सिर्फ़ उपहार स्वीकार करते हैं जिसमें फल, बर्तन और चावल आदि दिया जाता है. वे अब भोजन को पकाने के नाम पर मछली, केंकड़े, सूअर, कछुआ, जैसे जीवों को आग में भूनकर खाते हैं. नमक, तेल-मिर्च-मसाला का इस्तेमाल उन्हें नहीं आता. शराब, बीड़ी, सिगरेट और तम्बाकू के सेवन से भी दूर हैं.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

rajinder chauhan [rajenderchauhan@gmail.com] rajgarh himachal - 2012-01-20 10:24:55

 
  ......this is the country where people have not speared even their close relatives.....leave these innocent girls aside.....in our education system we are never taught about our old values and culture.....just to feel proud..look towards west...we are running down our culture....who are dancing in restaurants and hotels......who are offered to whom.... 
   
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