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लिटरेचर फेस्टिवल के अपराधी प्रायोजकों पर सवाल

लिटरेचर फेस्टिवल के अपराधी प्रायोजकों पर सवाल

जयपुर. 21 जनवरी 2012

सलमान रुश्दी


जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में सलमान रुश्दी के आगमन को लेकर खड़ा हुआ विवाद भी शांत भी नहीं हुआ है कि कई नागरिक संगठनों ने भी पूरे आयोजन को कटघरे में खड़ा करते हुये आम जनता से इस कारपोरेट आयोजन में भाग नहीं लेने की अपील की है.

सिटिज़न फोरम फॉर सिविल लिबर्टीज़, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय शोध-छात्र संगठन, अवाम का सिनेमा के अलावा पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव ने जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल होने का विचार रखने वाले लेखकों, कवियों और कलाकारों से आग्रह किया है कि वे कॉरपोरेट अपराध, जनमत बनाने के षड्यंत्रों, और मानवता के ख़िलाफ़ राज्य की हरकतों का विरोध करें तथा ऐसे दागी प्रायोजकों वाले आयोजन में हिस्सा न लें.

एक बयान में कहा गया है कि फेस्टिवल के प्रायोजकों में से एक, बैंक ऑफ अमेरिका ने दिसंबर 2010 में घोषणा की थी कि वह विकिलीक्स को दान देने में अपनी सुविधाओं का उपयोग नहीं करने देगा. बैंक का बयान था कि 'बैंक मास्टरकार्ड, पेपाल, वीसा और अन्य के निर्णय को समर्थन करता है और वह विकिलीक्स की मदद के लिये किसी भी लेन-देन को रोकेगा'. क्या यह बस संयोग है कि रिलायंस उद्योग के मुकेश अम्बानी इस बैंक के निदेशकों में से हैं? फेस्टिवल में शामिल हो रहे लेखक और कवि क्या ऐसी हरकतों का समर्थन करते हैं? यह दुख की बात है कि विकिलीक्स की प्रशंसा करने वाले कुछ प्रतिष्ठित प्रकाशन और समाचार-पत्र भी इस बैंक के साथ इस आयोजन के सह-प्रायोजक हैं.

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का विरोध करते हुये कहा गया है कि 27 जनवरी 1948 को पारित अमेरिकी सूचना और शैक्षणिक आदान-प्रदान कानून में कहा गया है कि 'सत्य एक शक्तिशाली हथियार हो सकता है'. जुलाई 2010 में अमेरिकी विदेशी सम्बन्ध सत्यापन कानून 1972 में किये गए संशोधन में अमेरिका ने अमेरिका, उसके लोगों और उसकी नीतियों से संबंधित वैसी किसी भी सूचना के अमेरिका की सीमा के अन्दर वितरित किए जाने पर पाबंदी लगा दी गयी है, जिसे अमेरिका ने अपने राजनीतिक और रणनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये विदेश में बांटने के लिये तैयार किया हो. इस संशोधन से हमें सीखने की ज़रूरत है और इससे यह भी पता चलता है कि अमेरिकी सरकार के गैर-अमेरिकी नागरिकों से स्वस्थ सम्बन्ध नहीं हैं.

आयोजन में अमरीकन संस्थानों की भागीदारी पर सवाल खड़े करते हुये कहा गया है कि इस आयोजन को अमेरिकी सरकार की संस्था अमेरिकन सेंटर का सहयोग प्राप्त है. फिर दुनिया के 132 देशों में 8000 से अधिक परमाणु हथियारों से लैस 702 अमेरिकी सैनिक ठिकाने क्यों बने हुए हैं?

विरोध करने वालों का कहना है कि हम कोका कोला द्वारा इस आयोजन के प्रायोजित होने के विरुद्ध इसलिए हैं क्योंकि इस कंपनी ने केरल के प्लाचीमाड़ा और राजस्थान के कला डेरा सहित 52 सयंत्रों द्वारा भूजल का भयानक दोहन किया है जिस कारण इन संयंत्रों के आसपास रहने वाले लोगों को पानी के लिये अपने क्षेत्र से बाहर के साधनों पर आश्रित होना पड़ा है.

बयान में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के एक और प्रायोजक पर सवाल खड़े करते हुये कहा गया है कि इस फेस्टिवल की एक प्रायोजक रिओ टिंटो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी खनन कंपनी है, जिसका इतिहास फासीवादी और नस्लभेदी सरकारों से गठजोड़ का रहा है और इसके विरुद्ध मानवीय, श्रमिक और पर्यावरण से संबंधित अधिकारों के हनन के असंख्य मामले हैं.

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की मुख्य प्रायोजक को लेकर बयान में कहा गया है कि केन्द्रीय सतर्कता आयोग की जांच के अनुसार इस आयोजन की मुख्य प्रायोजक डीएससी लिमिटेड को घोटालों से भरे कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन के दौरान 23 प्रतिशत अधिक दर पर ठेके दिए गए.

बयान में आशंका व्यक्त की गई कि ऐसी ताकतें साहित्यकारों को अपने साथ जोड़कर एक आभासी सच गढ़ना चाहती हैं ताकि उनकी ताकत बनी रहे. ऐसे प्रायोजकों की मिलीभगत से वह वर्तमान स्थिति बरकरार रहती है जिसमें लेखकों, कवियों और कलाकारों की रचनात्मक स्वतंत्रता पर अंकुश होता है. ऐसे अनैतिक और बेईमान धंधेबाजों द्वारा प्रायोजित साहित्यिक आयोजन एक फील गुड तमाशे के द्वारा 'सम्मोहन की कोशिश' है. हम संवेदनात्मक और बौद्धिक तौर पर वर्तमान और भावी पीढ़ी पर पूर्ण रूप से हावी होने के षड्यंत्र को लेकर चिंतित हैं. बयान जारी करने वालों में पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव, सिटिज़न फोरम फॉर सिविल लिबर्टीज़ के गोपाल कृष्ण, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय शोध-छात्र संगठन के प्रकाश के रे, अवाम का सिनेमा की ओर से शाह आलम शामिल हैं.


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