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तालिबान और करजई सरकार के बीच होगी बातचीत

तालिबान और करजई सरकार के बीच होगी बातचीत

लंदन. 29 जनवरी 2012

हामिद करजई


बीबीसी का कहना है कि अफगानिस्तान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत सऊदी अरब में बातचीत हो सकती है. अपने संवाददाताओं क्वेन्टिन सॉमरविले और बिलाल सरवरी के हवाले से बीबीसी ने दावा किया है कि कतर में तालिबान का कार्यालय स्थापित होने से पहले ये महत्वपूर्ण बैठक आने वाले सप्ताहों में हो सकती है.

बीबीसी के अनुसार तालिबान ने इससे पहले राष्ट्रपति हामिद करज़ई की सरकार को मान्यता देने से इनकार कर दिया था. उनका कहना है कि वो सिर्फ़ अमरीका और काबुल के दूसरे सहयोगी देशों से बात करेंगें.

अफ़ग़ानिस्तान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी को बताया, “अगर कतर में तालिबान का कार्यालय स्थापित हो भी जाता है, तब भी हम सऊदी अरब और तुर्की में अपनी दूसरी कोशिशें जारी रखेंगें. सऊदी अरब ने पहले भी एक महत्तवपूर्ण भूमिका अदा की है. हम उसकी कद्र करते हैं और आने वाले दिनों में भी शांति प्रक्रिया में उनके सहयोग की उम्मीद रखते हैं.” हालांकि जब बीबीसी ने तालिबान से संपर्क साधने की कोशिश की, तो उन्होंने प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया.

इससे पहले अमरीका और कतर ने राष्ट्रपति करज़ई की सरकार से सलाह लिए बिना शांति प्रक्रिया की शुरुआत कर दी थी, जिससे कि करज़ई काफ़ी नाराज़ हुए थे.गत दिसंबर में उन्होंने दोहा से अफ़ग़ानिस्तान के राजदूत को वापस बुला लिया था. इस बाबत बातचीत करने के लिए कतर से एक प्रतिनिधिमंडल के काबुल आने की संभावना है.

ब्रिटेन के अख़बार टेलीग्राफ़ के मुताबिक़ तालिबान के बहुत से अधिकारी कतर पहुंच चुके हैं. इनमें तालिबान के पूर्व उप विदेश मंत्री शेर मोहम्मद स्तानाकज़ई, सउदी अरब में पूर्व राजदूत शाहबुद्दीन दिलावारी और तालिबान के नेता मुल्लाह उमर के नज़दीकी सहायक तैय्यब आघा शामिल हैं. हालांकि तालिबान के स्थाई कार्यालय के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं मिल पाई है.

चिंता जताई जा रही है कि 2014 के अंत में विदेशी सैनिकों के अफ़ग़ानिस्तान से जाने से पहले तालिबान के सदस्य राजनीतिक कार्यालय का इस्तेमाल पैसे जुटाने के लिए कर रहे हैं.काबुल में राष्ट्रपति भवन में ऐसी भी चिंता जताई जा रही है कि इस बातचीत का अहम फ़ोकस अमरीका और तालिबान के बीच क़ैदियों की अदला-बदली पर होगा. तालिबान के पांच वरिष्ठ विद्रोही ग्वांतानामो बे में क़ैद हैं. अमरीका चाहता है कि उनके बदले में तालिबान तीन अमरीकी नागरिकों को रिहा करे.

तालिबान के नेतृत्व में बहुत से गुट बने हुए हैं जिनमें से एक का कहना है कि किसी भी प्रकार की शांति वार्ता से पहले विदेशी सैनिकों को अफ़ग़ानिस्तान छोड़ कर चले जाना चाहिए.तालिबान में पड़ती फूट को लेकर क्वेटा शूरा में तालिबान के कमांडरों को संदेश भेजे गए हैं. दूसरी ओर राष्ट्रपति करज़ई की सरकार पड़ोसी देश पाकिस्तान से भी रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रही है. अफ़ग़ानिस्तान में विरोधी गतिविधियां करने वाले विद्रोही गुटों में से कुछ गुट पाकिस्तान में केंद्रित हैं, जिसके कारण इस्लामाबाद का सहयोग शांति प्रक्रिया के लिए ज़रूरी बताया जा रहा है.


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