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तसलीमा की किताब पर फिर विवाद

तसलीमा की किताब पर फिर विवाद

कोलकाता. 1 फरवरी 2012

तसलीमा नसरीन


पिछले कई सालों से निर्वासन झेल रही प्रसिद्ध लेखिका तसलीमा नसरीन एक बार फिर विवादों में आ गई हैं. चार साल पहले कोलकाता से पलायन के अनुभवों पर आधारित उनकी किताब निर्वासन का विमोचन कोलकाता पुस्तक मेले में होना था, जिसे कट्टरपंथियों के विरोध के बाद आयोजकों ने रद्द कर दिया. हालांकि बाद में प्रकाशक ने किताब को मेले से बाहर विमोचित करवाया.

गौरतलब है कि तस्लीमा नसरीन 1993 में अपनी पहली और सबसे विवादास्पद पुस्तक 'लज्जा' के कारण सुर्खियों में आईं थीं. इस किताब के प्रकाशन के बाद इस्लामी कट्टरवादियों ने उन पर ईश निंदा का आरोप लगाकर उनके ख़िलाफ़ मौत का फ़तवा जारी कर दिया था. उसके बाद से ही तस्लीमा विस्थापन की जिंदगी गुजार रही हैं.

उन्हें बाद में स्वीडन ने अपने देश की नागरिकता दी. पिछले कुछ सालों से वे भारत में स्थायी नागरिकता की कोशिश कर रही हैं लेकिन भारत सरकार उनके आवेदन पर विचार नहीं कर रही है. यहां तक कि उनके बंगाल में रहने पर भी बंगाल सरकार ने सुरक्षा और राज्य में अशांति का हवाला देते हुये उनके कोलकाता में रहने पर आपत्ति दर्ज की थी. बंगाल में कट्टरपंथियों के विरोध-प्रदर्शन के बाद उन्हें दिल्ली में लगभग नजरबंद करके रखा गया था. इसके बाद वे मार्च 2008 में यूरोप चली गई थीं.

अब कोलकाता किताब मेला में उनकी किताब निर्वासन को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है. बुकसेलर ऐंड पब्लिशर्स गिल्ड ने कोलकाता किताब मेला में तसलीमा की किताब निर्वासन का कार्यक्रम रखा था. लेकिन कट्टपरंथियों ने इस किताब का विरोध किया और कहा जाता है कि पुलिस की सलाह के बाद आयोजकों ने तसलीमा की किताब के विमोचन का कार्यक्रम रद्द कर दिया. इसके बाद प्रकाशन ने किताब का विमोचन आडिटोरियम से बाहर करते हुये विरोध प्रदर्शित किया.

पूरे प्रकरण पर अफसोस जताते हुये तसलीमा नसरीन ने कहा कि कोलकाता किताब मेला समिति ने मेरी किताब को जारी करने का कार्यक्रम रद्द कर दिया, क्यों? क्योंकि कुछ धार्मिक कट्टरपंथी ऐसा नहीं चाहते थे. ट्विटर पर अपनी राय जाहिर करते हुये तसलीमा नसरीन ने कहा कि पीबीएस प्रकाशक ने दोस्तों के साथ मिलकर कोलकाता किताब मेला में खुले आकाश के नीचे मेरी किताब जारी की. वातानुकूलित हॉल में किताब को जारी करने पर प्रतिबंध था.

तसलीमा ने कहा कि कोलकाता, एक प्रगतिशील शहर है लेकिन सभी राजनीतिक दल और सभी संगठन कट्टरपंथियों से डरे हुए हैं. लेकिन कब तक? उन्होने मुझे प्रतिबंधित कर दिया. उन्हें पुस्तक की विषय वस्तु जानने की जरूरत नहीं है.


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