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तसलीमा नसरीन की किताब नहीं बिकेगी

तसलीमा नसरीन की किताब नहीं बिकेगी

कोलकाता. 4 फरवरी 2012

तसलीमा नसरीन


विवादास्पद लेखिका तसलीमा नसरीन की न तो किताब बिकेगी और ना ही उनकी किताबों पर फिल्म बनेगी. पिछले कुछ दिनों से लगातार चल रहे विरोध प्रदर्शनों के कारण कोलकाता किताब मेला के आयोजक पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स गिल्ड ने यहां तसलीमा की कोई भी किताब नहीं बेचने का निर्णय लिया है. पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स गिल्ड ने सभी बुक स्टालों को निर्देश दिया है कि वे तसलीमा नसरीन की किताब न बेंचें.

गौरतलब है कि बुकसेलर ऐंड पब्लिशर्स गिल्ड ने कोलकाता किताब मेला में तसलीमा की किताब निर्वासन का कार्यक्रम रखा था. लेकिन कट्टपरंथियों ने इस किताब का विरोध किया और कहा जाता है कि पुलिस की सलाह के बाद आयोजकों ने तसलीमा की किताब के विमोचन का कार्यक्रम रद्द कर दिया. इसके बाद प्रकाशक ने किताब का विमोचन आडिटोरियम से बाहर करते हुये विरोध प्रदर्शित किया. लेकिन विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला जारी रहा. इसके बाद शुक्रवार को आयोजकों ने तसलीमा नसरीन की किताब नहीं बेचने का निर्णय लिया.

तस्लीमा नसरीन 1993 में अपनी पहली और सबसे विवादास्पद पुस्तक 'लज्जा' के कारण सुर्खियों में आईं थीं. इस किताब के प्रकाशन के बाद इस्लामी कट्टरवादियों ने उन पर ईश निंदा का आरोप लगाकर उनके ख़िलाफ़ मौत का फ़तवा जारी कर दिया था. उसके बाद से ही तस्लीमा विस्थापन की जिंदगी गुजार रही हैं.

उन्हें बाद में स्वीडन ने अपने देश की नागरिकता दी. पिछले कुछ सालों से वे भारत में स्थायी नागरिकता की कोशिश कर रही हैं लेकिन भारत सरकार उनके आवेदन पर विचार नहीं कर रही है. यहां तक कि उनके बंगाल में रहने पर भी बंगाल सरकार ने सुरक्षा और राज्य में अशांति का हवाला देते हुये उनके कोलकाता में रहने पर आपत्ति दर्ज की थी. बंगाल में कट्टरपंथियों के विरोध-प्रदर्शन के बाद उन्हें दिल्ली में लगभग नजरबंद करके रखा गया था. इसके बाद वे मार्च 2008 में यूरोप चली गई थीं.

भारत से पलायन की कहानी ही उनकी नई किताब निर्वासन का कथानक है. अभ किताब के विरोध के बाद तसलीमा के दो उपन्यासों पर फिल्म बनाने की घोषणा करने वाले निर्देशकों ने भी अपने हाथ पीछे कर लिये हैं. तसलीमा का कहना है कि निर्देशकों ने उनकी फिल्म को लेकर चुप्पी साध ली है.

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sunder lohia [] mandi himachal pradesh - 2012-02-05 04:21:04

 
  कोलकाता किताब मेले के आयोजक Publishers, Booksellers और Booksellers Association का फैसला कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेकने समान है. इससे लोकतंत्र कमज़ोर हुआ है.  
   
 

raghav sharma [raghdfc@rediff.com] agra - 2012-02-04 14:39:05

 
  ये भारत सरकार के तुष्टीकरण का एक नायाब नमूना है. इस धर्मनिरपेक्ष देश में धर्म के ना पर ही सारे निर्णय होते हैं.  
   
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