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नहीं रहे शहरयार

नहीं रहे शहरयार

अलीगढ़. 14 फरवरी 2012

शहरयार


उर्दू के लोकप्रिय शायर शहरयार का सोमवार की शाम निधन हो गया. पिछले कुछ समय से वे अस्वस्थ चल रहे थे. फेफड़े में कैंसर की शिकायत के बाद से उनकी परेशानी बढ़ गई थी. सोमवार को उन्होंने अलीगढ़ स्थित अपने निवास पर ही अंतिम सांस ली.

16 जून 1936 को उत्तरप्रदेश के आँवला, बरेली में जन्मे शहरयार का पूरा नाम कुंवर अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान था लेकिन इनकी पहचान शहरयार के बतौर ही थी. 60 के दशक में शहरयार ने उर्दू में एमए किया और फिर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाने लगे. शहरयार ने उर्दू में कई महत्वपूर्ण रचनाएं दीं लेकिन हिंदुस्तान में एक बहुत बड़े वर्ग ने उन्हें उमराव जान जैसी फिल्मों के गीतकार के तौर पर ही जाना.

हिंदी फिल्मों को समृद्ध बनाने वाले शहरयार की अधिकांश रचनाओं ने इतिहास रच दिया. उमराव जान की दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए, ज़िंदगी जब भी तेरे बज़्म में लाती है हमें, सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यूं है, ये क्या जगह है दोस्तों, इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं, जुस्तजू जिस की थी उसको तो न पाया हमने, कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता जैसी दर्जनों नज़्म और ग़ज़लें अमर हो गईं.

शहरयार को लेखन के लिये 1987 में साहित्य अकादमी पुरस्कार और 2008 में ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया था. इसके अलावा दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में उनकी रचनाओं को सराहा गया था और शहरयार को सम्मानित किया गया.